युद्ध, प्रतिबंध के खिलाफ ब्रिक्स

यह भारत की अध्यक्षता और मेजबानी में ब्रिक्स देशों की ऐतिहासिक और कूटनीतिक उपलब्धि है। बेशक प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व को शाबाश देनी चाहिए। साल भर में 350 के करीब बैठकों के बाद यह निष्कर्ष सामने आया है कि ब्रिक्स का साझा घोषणा-पत्र जारी किया जा सका है। बीते पांच साल में कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह साझापन गायब रहा है। ब्रिक्स भारत ने अमरीका को आईना दिखाया है कि वह ‘वैश्विक आक्रांता’ न बने। हालांकि ‘नई दिल्ली घोषणा-पत्र’ में अमरीका-इजरायल का नाम नहीं है, लेकिन संदेश साफ है कि एकतरफा युद्ध स्वीकार्य नहीं है। दुनिया में जंग रुकनी चाहिए। आपसी संवाद, कूटनीति से विवादों के समाधान निकाले जा सकते हैं। आश्चर्य है कि ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब के दरमियान युद्ध जारी है, लेकिन ब्रिक्स का घोषणा-पत्र सर्वसम्मति से पारित किया गया है। बेशक इन देशों की अपनी-अपनी आपत्तियां और आशंकाएं थीं, लेकिन नई दिल्ली में इनके राजदूतों, राजनयिकों को एक साथ बिठाया गया, बातचीत कराई गई, उनकी लाल रेखाओं को समझा गया और शनिवार सुबह 4 बजे तक ब्रिक्स प्रतिनिधियों ने गहन मंथन किया, नतीजतन साझा घोषणा-पत्र पर सर्वसम्मति तय हुई। सबसे महत्वपूर्ण खबर तो यह सामने आई कि ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान और अबूधाबी के ‘क्राउन प्रिंस’ शेख मुहम्मद बिन जायद और उनके प्रतिनिधिमंडल की मुलाकात हुई। दोनों ने 30 मिनट तक संवाद किया। कुछ सवाल और शिकायतें उभरी होंगी, लेकिन संवाद के बाद कुछ तो ‘बर्फ’ पिघली होगी! युद्ध के खिलाफ ब्रिक्स के घोषणा-पत्र का पहला प्रभाव भी सामने आया, जब युद्धरत यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की ने बयान दिया कि वह जी-20 में मियामी (अमरीका) में रूसी राष्ट्रपति पुतिन से मिलेंगे और बात करने को तैयार हैं। रूस-यूक्रेन में बीते साढ़े चार साल से युद्ध जारी है। दोनों पक्षों की तबाही, बर्बादी, मौतें सामने आ चुकी हैं। यकीनन यह भारत के शांति-प्रयासों और लगातार आग्रहों का ही नतीजा है कि एकतरफा युद्ध के खिलाफ किसी घोषणा-पत्र ने ‘बदलाव’ की संभावनाएं पैदा की हैं। सिर्फ युद्ध ही नहीं, घोषणा-पत्र में आर्थिक प्रतिबंधों को भी ‘मानवाधिकार का उल्लंघन’ करार दिया गया है। ऐसे प्रतिबंध विश्व व्यापार संगठन, यूएन चार्टर और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के खिलाफ भी हैं। राष्ट्रपति पुतिन ने ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान खुलासा किया कि रूस पर 30,000 से अधिक पाबंदियां थोपी गईं, उनके बावजूद रूस आगे बढ़ता रहा। ईरान के राष्ट्रपति पेजेश्कियान ने भी अमरीकी पाबंदियों और नाकेबंदी का जिक्र किया, लेकिन यह भी भरोसा दिलाया कि अमरीका के थोपे गए, एकतरफा युद्ध और पाबंदियों से ईरान टूटने वाला देश नहीं है। हम आज जिंदा हैं, लिहाजा लड़ेंगे भी।
ब्रिक्स घोषणा-पत्र में राष्ट्रपति टं्रप के एकतरफा टैरिफवाद की भी मुखालफत की गई, उसे खारिज किया गया। भारत, चीन सरीखी महाशक्तियों पर भी टं्रप ने टैरिफ थोपे, लेकिन उनकी अर्थव्यवस्थाओं को ठप नहीं कर सके। इन दोनों संदर्भों में भी अमरीका कठघरे में खड़ा है। घोषणा-पत्र में यह प्रस्ताव भी सर्वसम्मति से पारित किया गया कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और आईएमएफ, विश्व बैंक, विश्व व्यापार संगठन आदि में व्यापक सुधारों को अब टाला नहीं जा सकता है। ये संस्थान पुराने ढर्रे से काम नहीं कर सकते। ब्रिक्स ने रूस, चीन से अपील की है कि वे सुरक्षा परिषद में भारत और ब्राजील की स्थायी सदस्यता के लिए पैरवी करें। गौरतलब यह है कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने किसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर, इस संदर्भ में, सहमति जताई है। देखते हैं कि वह भारत की कितनी मदद करता है, क्योंकि वह अभी तक भारत के दावे का विरोध करता रहा है। हालांकि अमरीका, ब्रिटेन, फ्रांस और जापान के राष्ट्राध्यक्ष, शासनाध्यक्ष भारत का समर्थन करते रहे हैं। बहरहाल ब्रिक्स का दिल्ली आयोजन आतंकवाद की भत्र्सना करने और उसके पनाहगारों, आर्थिक मददगारों के खिलाफ संयुक्त कार्रवाई के फैसले के लिए भी याद किया जाएगा। पाकिस्तान बिलबिला रहा होगा, तो चिंतित राष्ट्रपति टं्रप भी अपने साथियों के साथ विमर्श कर रहे होंगे! ब्रिक्स भारत ने अगले कई सालों का एजेंडा भी तय किया है। वैश्विक स्तर पर विस्तार करने का विचार है। फिलहाल 41 अन्य देश ब्रिक्स से जुडऩा चाहते हैं। यह मंच शेष विश्व के लिए चुनौती बनता जा रहा है। ब्रिक्स देशों में आतंकवाद को लेकर बनी सहमति भी उल्लेखनीय है। आतंकवाद के खिलाफ अब ब्रिक्स देश मिलजुल कर लड़ेंगे। भारत में पाक प्रायोजित आतंकवाद को खत्म करने की दिशा में ब्रिक्स के संयुक्त प्रयास अच्छे परिणाम देंगे।



