संपादकीय

शायद ‘श्री’ की भी यही इच्छा

`सार्वजनिक गणेशोत्सव का स्वरूप पूरी तरह बदल गया है। उत्सव कम, व्यापार और भूकंप जैसे लाउडस्पीकर के झटके ज्यादा हो गए हैं। बड़े उद्योगपतियों की `कॉर्पोरेट’ प्रतिस्पर्धा गिरणगांव के गणपति उत्सव में शुरू हो चुकी है। मराठी मानुस हताश और मजबूर है। शायद ‘श्री’ की भी यही इच्छा लगती है।’

सार्वजनिक गणेशोत्सव का स्वरूप पूरी तरह बदल रहा है। इस बदलाव पर मुंबई और पुणे जैसे शहरों में बहस छिड़ी हुई है। जिन उद्देश्यों के लिए लोकमान्य तिलक ने यह `उत्सव’ शुरू किया था, वे उद्देश्य पीछे छूट गए हैं और अब उत्सव के बहाने एक अलग ही संस्कृति का प्रदर्शन हो रहा है। सन् १८९३ में लोकमान्य तिलक ने सार्वजनिक गणेशोत्सव की शुरुआत की थी। उस समय गणेशोत्सव का मुख्य उद्देश्य था जनजागृति और सामाजिक एकजुटता। बाद में उसकी जगह मनोरंजन ने ले ली। अब उत्सवों पर उद्योगपतियों, बिल्डरों और राजनीतिक दलों का कब्जा हो गया है। `शक्ति और पैसा’ सार्वजनिक उत्सवों का मुख्य साधन बन गए हैं। कोई भी उत्सव इसका अपवाद नहीं है। उत्सवों का पूरी तरह व्यावसायीकरण हो गया है। मुंबई के गणेशोत्सव `लालबागचा राजा’ को उद्योगपति अंबानी का समर्थन प्राप्त है, इस बात पर आलोचना हो रही थी। उस होड़ में अब गौतम अडानी ने भी अपना घोड़ा दौड़ा दिया है। चिंचपोकली के ९० वर्ष पुराने `चिंतामणि’ गणेशोत्सव पर अडानी ने नियंत्रण हासिल कर लिया है। `एक गणपति उनका और एक गणपति हमारा’, ऐसा सीधा बंटवारा हो गया है। मुंबई के गिरणगांव गणेशोत्सव में चारों तरफ जियो और अडानी के होर्डिंग्स, बैनर और विज्ञापन लग गए हैं। सार्वजनिक गणेशोत्सव आनंद का एक जन-उत्सव था, जो अब वैसा नहीं रहा। उद्योगपतियों की कॉर्पोरेट दुनिया इसमें घुस आई और इसके जरिए मार्केटिंग शुरू हो गई। लालबाग के राजा के दर्शन के लिए सिनेमा जगत की तमाम हस्तियां, केंद्र के मंत्री और राज्यों के मुख्यमंत्री हाजिरी लगाते हैं। अब `चिंतामणि’ पर अडानी समूह की मेहरबानी होने से पहले ही दिन से गृह मंत्री अमित शाह से लेकर तमाम सत्ताधारी वहां आएंगे। अडानी तो वहां डेरा ही डाल लेंगे। इस वजह से फिल्म उद्योग के नायक और महानायक भी पहुंचेंगे। उद्योगपतियों ने हिंदुओं के देवों को, महाराष्ट्र के पारंपरिक गणेशोत्सव को अपना ब्रांड एंबेसडर बना लिया है। पुणे में भी इससे अलग तस्वीर नहीं है।
बापट का भूकंप
पुणे का गणेशोत्सव इस बार विद्यानंद बापट नाम के युवक ने अपनी ओर आकर्षित किया। इसकी गूंज पूरे राज्य में सुनाई दी। सार्वजनिक उत्सवों की विसर्जन यात्राओं में कान के पर्दे फाड़ने वाले और दिल की धड़कनें रोक देने वाले `भूकंपी’ डीजे को बंद कराने के लिए बापट ने एक अभियान शुरू किया। उत्सवप्रेमी पुणेवासियों ने इस अभियान का समर्थन किया। बापट पर एक सिरफिरे ने हमला भी किया, फिर भी उनकी लड़ाई रुकी नहीं। बापट के समर्थन में पुणे के लोगों ने मोर्चा निकाला। जहां तिलक ने सार्वजनिक गणेशोत्सव की शुरुआत की थी, उसी पुणे का एक बड़ा वर्ग उत्सव के शोर-शराबे और भूकंप जैसे ध्वनि-झटकों से तंग आ चुका है। अनगिनत पुणेवासी भूकंप के इन ध्वनि-झटकों के डर से इस दौरान `पुणे’ छोड़कर दूसरी जगह चले जाते हैं। आज की पीढ़ी को लगता है कि भूकंप के ये झटके ही `हिंदुत्व’ हैं। उन्हें पैसा मुहैया कराने वाले छोटे-बड़े उद्योगपति हैं। इन सभी उत्सवों से जगह-जगह करोड़ों रुपए का कारोबार होता है। अडानी जैसे लोग घाटा सहकर धर्म-कार्य करेंगे या उत्सव मनाएंगे, ऐसा नहीं लगता। आज के गणेशोत्सव जन-चंदे और दान से नहीं मनाए जाते। जब तक उत्सव चंदे से मनाए जाते थे, तब तक उत्सवों की सांस्कृतिक पवित्रता बनी रही। अब उन-उन इलाकों के `एसआरए’ प्रोजेक्ट्स और बिल्डर उत्सव आयोजित करने वाले मंडलों को बड़ी रकम देते हैं। बदले में पुरानी-जर्जर चालों और इमारतों पर कब्जा कर लेते हैं तथा उसी जमीन पर उत्सव मनाकर खुद को दयावान और धर्माभिमानी साबित करते हैं। इस पूरे लेन-देन में मुंबई की संस्कृति मिटता जा रहा है। धनवानों की खैरात पर आज उत्सवों की होड़ और उनका बड़प्पन टिका हुआ है। सत्ताधारी दल के विधायक और सांसद भ्रष्टाचार से बेहिसाब पैसा कमाते हैं, ठेकेदारों का शोषण करते हैं और अपने-अपने इलाकों में `भूकंप’ जैसा डीजे बजाकर अपनी `जय-जयकार’ करवाते हैं। आज युवा बेरोजगार है, पेपर लीक से परेशान है, उसके मां-बाप महंगाई से त्रस्त हैं। गरीब और मध्यम वर्ग को मुंबई छोड़कर विरार-अंबरनाथ के पार आश्रय ढूंढ़ना पड़ रहा है, क्योंकि उनके मूल घरों पर बिल्डरों ने कब्जा कर लिया है। वहां फिलहाल दही-हांडी से लेकर गणेशोत्सव तक के बड़े-बड़े उत्सव चल रहे हैं। यह वर्तमान सार्वजनिक उत्सवों का दूसरा काला सच है।
व्यापार और रोजगार
`लालबागचा राजा’ जैसे मंडल साल भर सामाजिक कार्य करते हैं। शैक्षणिक और चिकित्सा उपक्रम चलाते हैं। अब अडानीr के संरक्षण में `चिंतामणि’ गणेश मंडल भी ये उपक्रम चलाएगा। महाराष्ट्र के कई गणेश मंडल साल भर विविध सामाजिक उपक्रम चलाते रहते हैं। लालबाग के राजा की संस्था का `डायलिसिस’ का काम बहुत बड़ा है। उत्सवों का महत्व यह है कि सजावट, रोशनी, संगीत, मनोरंजन और खान-पान पर बड़ा खर्च होता है, जिससे कई लोगों को काम मिलता है। यह रोजगार और आमदनी का एक साधन है। सार्वजनिक उत्सवों में अगर बड़े उद्योगपतियों का पैसा आ रहा है, तो उस पैसे को रोकें, उस पैसे को सही दिशा दें और सामाजिक कार्यों की ओर मोड़ें। उससे मराठी माणुस की संस्थाओं को ताकत दें।
मराठी माणुस के उत्थान के लिए उत्सव के `एक-एक पैसे’ का इस्तेमाल होने दें। शायद `श्री’ की भी यही इच्छा होगी। वरना धनवानों की सीनाजोरी के आगे `श्री’ भी क्या करेंगे?

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