Explainer: ISRO के ‘नॉटी बॉय’ से चीन-पाक क्यों बेचैन, भारत के लिए कैसे यह गेमचेंजर? EOS-05 की ताकत और काम समझिए

ISRO EOS-05 Satellite Explained: सौ बात की एक बात ये कि ‘नॉटी बॉय’ ने इस बार कोई शरारत नहीं की. ख़बर तो शायद आपको पता चल ही गई होगी कि भारत ने अपनी नई सैटेलाइट EOS-05 लॉन्च कर दी. और ये कोई छोटी-मोटी रूटीन बात नहीं है. ये मत समझना कि सैटेलाइट तो लॉन्च होती रहती हैं तो एक और हो गई होगी. ये उपलब्धि है क्या ये अच्छी तरह समझने की ज़रूरत है और सबको समझाने की ज़रूरत है. तो पहले तो क्लियर कर लेते हैं कि ये ‘नॉटी बॉय’ क्या है? ये जिसको ‘नॉटी बॉय’ कहा जा रहा है वो असल में सैटेलाइट को नहीं कह रहे हैं. उपग्रह को नहीं कह रहे हैं. सैटेलाइट तो जैसा आप जानते हो कि उसको कहते हैं जो पृथ्वी के चक्कर लगाती रहती है ऊपर अंतरिक्ष में. जैसे चांद. चांद भी एक सैटेलाइट है, उपग्रह है पृथ्वी का. पृथ्वी के चक्कर लगाता रहता है. वो प्रकृति की बनाई हुई सैटेलाइट है. और ऐसी ही सैटेलाइट इंसान बना कर अंतरिक्ष में छोड़ता रहता है और वो पृथ्वी के चक्कर काटती रहती हैं और कई काम करती रहती हैं अलग-अलग तरह के. और अंतरिक्ष में सैटेलाइट को छोड़कर आता है रॉकेट. पृथ्वी से जो जाता हुआ दिखता है धुआं छोड़ता हुआ वो होता है रॉकेट. रॉकेट के साथ भेजते हैं सैटेलाइट को.
रॉकेट वायुमंडल यानी ऐटमस्फ़ीयर को चीरता हुआ अंतरिक्ष में जाता है सैटेलाइट लेकर और सैटेलाइट एक ख़ास जगह पर ऐसी स्पीड से छोड़ देता है कि वो पृथ्वी के चक्कर काटना शुरू कर देती है. तो ये जो नई सैटेलाइट भारत ने भेजी है अंतरिक्ष में इसको जो रॉकेट लेकर गया है इसको वैज्ञानिक कहने लग गए थे ‘नॉटी बॉय’. शरारती लड़का. पहले ये कई बार ट्राय किया जा चुका लेकिन वो भटक जाता था ऊपर जा कर, उस गाने वाले ऋतिक रौशन की तरह, कि इधर चला मैं उधर चला. तो नाम दे दिया था वैज्ञानिकों ने ‘नॉटी बॉय’. इस बार सटीक जगह पहुंचा, जितनी ऊंचाई पर सैटेलाइट को पहुंचाना था वहां पहुंचाकर आया तो वैज्ञानिकों की जान में जान भी आई और संतुष्टि भी हुई कि तकनीक में जो बदलाव किये थे इस ‘नॉटी बॉय’ के वो कामयाब रहे, वो ना इधर गया ना उधर गया और सैटेलाइट अपनी कक्षा में पहुंच गई.
क्या है सैटेलाइट EOS-05 और इसका मतलब, क्या करेगी
अब आ जाइए असली कहानी पर. सैटेलाइट. EOS-05, EOS मतलब ‘अर्थ ऑब्ज़रवेशन सैटेलाइट’ और 05 का मतलब तो नंबर 5, यानी इससे पहले चार और ‘अर्थ ऑब्ज़रवेशन सैटेलाइट’ भेजी जा चुकी हैं ये EOS-05 है. अर्थ ऑब्ज़रवेशन सैटेलाइट मतलब ये ऊपर से अर्थ को ऑब्ज़र्व करेगी. नज़र रखेगी. नज़र रखेगी मतलब क्या? फ़ोटो खींचेगी? लाइव तस्वीरें भेजेगी? जैसे हम सुनते हैं कि ऊपर से सैटेलाइट ने देख लिया कि नीचे क्या हो रहा है? पाकिस्तान में क्या हो रहा है, चीन में क्या हो रहा है, वैसे? जी, कुछ-कुछ वैसा ही. लेकिन ये उससे भी ख़ास है. क्योंकि ये सैटेलाइट ‘जियोस्टेशनरी’ है. जियोस्टेशनरी मतलब ये ऊपर स्टेशनरी रहेगी, यानी एक ही जगह पर खड़ी रहेगी और लगातार तस्वीरें भेजती रहेगी. ये बहुत ही ऐडवांस्ड क़िस्म की सैटेलाइट होती है जो ऊपर एक ही जगह पर टिकी रहे. क्योंकि आपने सुना होगा कि सैटेलाइट ऊपर से चक्कर लगाती हुई गई और तस्वीर खींच कर भेज दी नीचे कंट्रोल सेंटर में. और फिर अगले चक्कर में आई और फिर तस्वीर खींचकर भेज दी. और ऐसे देख कर पता चलता था कि पहले क्या पोज़िशन थी और अब क्या पोज़िशन है किसी जगह की. जैसे अभी नेपाल की बाढ़ की तस्वीर आई कि पहले इस जगह पर एक बिल्डिंग खड़ी थी तिब्बत के बॉर्डर पर. और फिर अगली तस्वीर में दिखा कि बिल्डिंग बाढ़ के बाद ग़ायब हो गयी.’
भारत के लिए कैसे गेमचेंजर
यानी पहले सैटेलाइट ने की जो तस्वीर थी उसमें बिल्डिंग थी और फिर जब चक्कर लगा कर सैटेलाइट उसी जगह के ऊपर आई तो वो बिल्डिंग नहीं थी. लेकिन अगर जियोस्टेशनरी सैटेलाइट होती तो सैटेलाइट उसी जगह पर ऊपर टिकी रहती, हिलती नहीं, और लगातार तस्वीर आती रहती तो दिख जाता कि कैसे बिल्डिंग बही बाढ़ में. मतलब जैसे कैमरा लगा हुआ है जो लगातार नज़र बनाए हुए है ऊपर. ऐसी सैटेलाइट अब ऊपर अंतरिक्ष में स्थापित कर दी है भारत ने. लेकिन ऊपर पतंग की तरह एक ही जगह पर कैसे सैटेलाइट को टिका सकते हैं? वो तो चक्कर काट रही है ना ऊपर तभी तो अपनी कक्षा में बनी रहती है. तो जब चक्कर काटेगी तो टिकी कैसे रहेगी? तो यही तो असली कमाल है. और ये कमाल किया जाता है सैटेलाइट को एक बिल्कुल ख़ास पॉयंट पर छोड़ कर अंतरिक्ष में. ISRO के नॉटी बॉय रॉकेट ने वही कमाल कर के दिखाया है.
धरती की स्पीड से ही घूमेगी यह सैटेलाइट
इसको ऐसे समझिए कि जैसे पृथ्वी एक बॉल है और उस बॉल के चारों तरफ़ सैटेलाइट घूम रही है. तो जितना पृथ्वी की बॉल के पास होगी उसको उतना तेज़ी से चक्कर लगाना पड़ेगा. यानी कोई 8 घंटे में चक्कर लगाएगी, थोड़ी और दूर होगी तो 12 घंटे में चक्कर लगाएगी, और दूर होगी तो 18 घंटे में एक चक्कर लगाएगी. जितना दूर से चक्कर लगाएंगे तो चक्कर का रास्ता यानी सैटेलाइट की कक्षा बड़ी होती जाएगी और उतना ज़्यादा टाइम लगता जाएगा. अब इसमें एक चीज़ और नोट कर लीजिए. याद रखिये पृथ्वी भी घूमे जा रही. मतलब पृथ्वी की जो बॉल है वो स्पिन भी तो हो रही है. पृथ्वी भी घूम रही है और उसके चारों तरफ़ सैटेलाइट चक्कर लगा रही है. तो अगर समझो 10 घंटे में कोई सैटेलाइट एक चक्कर लगा कर वहीं आती है तो नीचे पृथ्वी पर वही जगह नहीं होती. पृथ्वी ख़ुद घूम चुकी होती है. तो सैटेलाइट के नीचे नई जगह आ जाती है.
कैसे स्पीड मैच होगा
अब आइए उस कमाल पर जो किया गया है. अगर सैटेलाइट इतनी दूरी पर छोड़ी जाए कि वो अपना एक चक्कर एकदम एक्ज़ैक्ट 24 घंटे में पूरा करे, तो क्या होगा? पृथ्वी को भी अपनी धुरी पर पूरा एक राउंड घूमने में 24 घंटे लगते हैं. तभी तो 24 घंटे बाद सेम टाइम हो जाता है. तो पृथ्वी भी अपनी धुरी पर 24 घंटे में एक बार घूमेगी और सैटेलाइट भी बिल्कुल उतने ही टाइम में, 24 घंटे में एक चक्कर अगर पूरा करेगी. तो सैटेलाइट की स्पीड पृथ्वी के घूमने की स्पीड से बिलकुल मैच कर जाएगी. तो पृथ्वी पर जैसे-जैसे भारत वाला एरिया घूमता रहेगा, बिलकुल वैसे-वैसे उसके साथ-साथ सैटेलाइट अंतरिक्ष में घूमती रहेगी. तो क्या होगा? ऐसा लगेगा कि सैटेलाइट ठीक वहीं पर चिपकी हुई है अंतरिक्ष में, वहीं टिकी हुई है. जैसे पृथ्वी की बॉल से किसी ने डोर से पतंग बांध रखी हो. जहां-जहां भारत घूमेगा साथ-साथ डोर के पतंग भी घूमेगी. तो ये कमाल किया गया इस सैटेलाइट को अंतरिक्ष में भेजकर. वो भारत पाकिस्तान चीन तिब्बत के इस पूरे इलाक़े के ऊपर ही बनी रहेगी.



