जनसंख्या समस्या का एक नया समाधान ‘एस.आई.आर.’

दशकों तक भारत जनसंख्या विस्फोट को लेकर चिंतित रहा। हर जनगणना खतरनाक सुर्खियां लेकर आती थी। पंचवर्षीय योजनाएं थीं, परिवार-नियोजन कार्यक्रम, लाल त्रिकोण, नारे और जनसंख्या स्थिरीकरण पर संगोष्ठियां थीं। जनसांख्यिकीविद् हमें चेतावनी देते थे कि हम भारतीय बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं।
हमें चिंता करने की जरूरत नहीं थी। ऐसा लगता है कि इसका समाधान पूरी तरह से अप्रत्याशित जगह से आया है: भारत निर्वाचन आयोग। मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण (एस.आई.आर.) कुछ ही महीनों में वह हासिल करने में सक्षम दिखता है जो दशकों की जनसंख्या नीति नहीं कर सकी। एस.आई.आर. से पहले दिल्ली में लगभग 1.45 करोड़ मतदाता थे। इसकी मसौदा सूची घटकर लगभग 97.5 लाख रह गई है — लगभग 48 लाख की गिरावट, करीब एक-तिहाई। महाराष्ट्र लगभग 9.78 करोड़ से 7.71 करोड़ पर आ गया है, जिससे 2 करोड़ से अधिक नाम मसौदे से बाहर हो गए हैं। कर्नाटक में भी मसौदा चरण में 1 करोड़ से अधिक नाम बाहर किए गए हैं। एस.आई.आर. के तीन चरणों में, कथित तौर पर मसौदा सूचियों से 13 करोड़ से अधिक नाम बाहर छोड़ दिए गए हैं। माना कि ये सभी अंतिम विलोपन नहीं हैं। दावे और आपत्तियां कई नामों को बहाल करेंगी। लेकिन एक महान राष्ट्रीय उपलब्धि को खराब करने के लिए ऐसी तकनीकी बारीकियों की अनुमति क्यों दी जाए?
यदि मतदाता-सूची के अंकगणित को जनसांख्यिकी मान लिया जाए, तो भारत की जनसंख्या समस्या शायद खुद-ब-खुद हल हो रही है। शायद अब हम 1.45 अरब लोग नहीं हैं। शायद हम चुपचाप खिसककर 1.2 अरब पर आ गए हैं। गहन पुनरीक्षण का एक या दो दौर और, और वांछित 1 अरब का आंकड़ा पहुंच के भीतर हो सकता है। फायदों के बारे में सोचिए। प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता बढ़ जाएगी। प्रति हजार जनसंख्या पर अस्पताल के बिस्तरों में सुधार होगा। आवास की कमी घट जाएगी। शिक्षक-छात्र अनुपात बेहतर दिखेगा।
यहां तक कि प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद (डी.जी.पी.) भी बिना बढ़ाने की असुविधा के काफी बढ़ सकता है। मतदाता सूचियां एक पीढ़ी में एक बार नए सिरे से तैयार नहीं की जाती हैं। उन्हें निरंतर अद्यतन (अपडेट) किया जाना चाहिए। वार्षिक संशोधन होते हैं, बूथ स्तर के अधिकारी (बी.एल.ओ.), राजनीतिक-पार्टी के एजैंट और नाम जोडऩे, हटाने और सुधार करने की विस्तृत प्रक्रियाएं होती हैं। यदि यह तंत्र ठीक-ठाक काम कर रहा था, तो हमें अचानक कैसे पता चला कि दिल्ली के लगभग एक-तिहाई मतदाताओं को मसौदा सूची से बाहर करने की आवश्यकता है, या महाराष्ट्र में 2 करोड़ से अधिक नामों को एक ही झटके में गायब होना पड़ रहा है?
या तो पुरानी सूचियां (जिनके आधार पर चुनाव आयोग ने 2024 का आम चुनाव कराया था) आश्चर्यजनक रूप से अविश्वसनीय थीं, या वर्तमान प्रक्रिया के लिए किसी असाधारण स्पष्टीकरण की आवश्यकता है। दोनों में से कोई भी संभावना विशेष रूप से आश्वस्त करने वाली नहीं है।
हमने पहले भी देखा है कि नागरिकता, पहचान और दस्तावेजीकरण से जुड़ी भारी भरकम प्रक्रियाएं कैसे अपना एक अलग ही रूप ले लेती हैं। असम का एन.आर.सी. एक शिक्षाप्रद उदाहरण है। उच्चतम न्यायालय की निगरानी में वर्षों के सत्यापन, भारी प्रशासनिक प्रयास और लगभग 1,600 करोड़ रुपए के व्यय के बाद, 2019 की अंतिम सूची में 19.06 लाख लोग बाहर रह गए थे। हालांकि, परिणाम ने एक अप्रत्याशित राजनीतिक समस्या पैदा कर दी। उस समय व्यापक रूप से प्रसारित अनुमानों से पता चला कि बाहर किए गए लोगों में एक बड़ा हिस्सा केवल मुस्लिम प्रवासियों की बजाय बंगाली भाषी हिंदुओं का था।
एस.आई.आर. के साथ एक असहज समानता है। आलोचकों को संदेह है कि इस प्रक्रिया का मुसलमानों पर असंगत प्रभाव पड़ेगा, यह एक ऐसा आरोप है जिसे चुनाव आयोग ने दृढ़ता से खारिज किया है। लेकिन एक बार जब करोड़ों लोगों पर दस्तावेजी जाल बिछा दिया जाता है, तो नौकरशाही जरूरी नहीं कि उसी राजनीतिक सटीकता के साथ भेदभाव करे जिसकी उसके आलोचक या समर्थक कल्पना करते हैं। बड़ी संख्या में हिंदू भी निवास, प्रवासन, दस्तावेजीकरण, वर्तनी, पहचान और सत्यापन के सवालों में उलझ जाते हैं। बेशक, मतदाता सूची स्वच्छ होनी चाहिए। मृत मतदाताओं को हटाया जाना चाहिए। डुप्लीकेट प्रविष्टियां गायब होनी चाहिएं। कोई व्यक्ति जो स्थायी रूप से स्थानांतरित हो गया है, उसे पुराने पते पर अनिश्चित काल तक नामांकित नहीं रहना चाहिए।-एस. वाई. कुरैशी



