यहां तालाब का होता है विवाह, सजता है मंडप, पंडित पढते हैं मंत्र, फिर केले के पौधे से रचाई जाती है धूम धाम से शादी

मधुबनी: मिथिला में जब कोई नया पोखर या इनार खुदवाया जाता है तो उसे ‘कुंवारा’ माना जाता है. शादी किए बिना उसका पानी पीना-खेती में लगाना मिथिला में अशुभ मानते हैं. मान्यता है कि शादी के बाद ही तालाब ‘पवित्र’ होकर जल देता है और गांव में सूखा नहीं पड़ता है. दरभंगा, मधुबनी, सहरसा साइड में बड़े जमींदार या मुखिया नया पोखर खुदवाते हैं तो पोखरे का बियाह जरूर होता है. तालाब को दूल्हा, दुल्हन के लिए पीपल, बरगद या केला का पौधा पास में लगाया जाता है. जहां पंडित मंत्र पढ़ते हैं और भोज- भात का आयोजन किया जाता है.
प्रकृति से जुड़ाव की है अनोखी परंपरा
मिथिलांचल में पग -पग पोखर की कहावत भी है, यानी कि यहां हर आधा किलोमीटर, 1 किलोमीटर पर कोई ना कोई जलाशय यानी कि तालाब जरूर होता है. तालाब को मैथिली भाषा में पोखर कहते हैं. जब कोई नया तालाब यहां के किसी जमींदार या फिर मुखिया के द्वारा खुदवाया जाता है तो वह सिर्फ उसका नहीं रहता है, बल्कि वह पूरे समाज का होता है. मंदिर के पास या फिर कोई ऐसी जगह पर ही होता है. ताकि सब इसका लाभ ले सके, उससे पहले तालाब का विवाह होता है, जिसे पोखरी विवाह कहते हैं. जिसे शास्त्र में मानें तो ‘जल संस्कार’ भी कहा जाता है.
मधुबनी के पंडित बालकृष्ण झा शास्त्री कहते हैं कि पोखरी विवाह जरूरी इसलिए होता है, क्योंकि जब खुदवाया जाता है तो पोखर तो वह कुंवारा माना जाता है, उसका जल देवताओं को अर्पित नहीं कर सकते हैं, पूजा पाठ में अनुष्ठान में उपयोग नहीं होता है, लेकिन उसका विवाह हो जाता है, बीच में की जाठ गाड़ दिया जाता है, तब प्रयोग किया गया यह जल शुद्ध माना जाता है.
बता दें कि इसमें केला की पौध को दुल्हन मानते हैं. पोखर को दूल्हा और केला वृक्ष को सजाकर तैयार सोलह सिंगार करके और वहां पास में रखते हैं, फिर दोनों को मंत्र उच्चारण के साथ विवाह होता है. तीन-चार दिनों तक चलता है और फिर पोखर के बीच में लकड़ी का मोटा जाठ डाला जाता है. ऐसे में लोग पहचान कर सके कि यह पोखर का विवाह हो गया और इसका जल अर्पित करने योग्य है.
जानें कैसे होती है पोखरि बियाह
दरअसल, तालाब को दूल्हा माना जाता है. दुल्हन के लिए केला का पौधा पास में लगाया जाता है. आम शादी की तरह लगन लिखी जाती है, मंडप बनता है, पंडित जी मंत्र पढ़ते हैं. तालाब की ‘मेंड़’ पर सिंदूर, माला, जनेऊ चढ़ाते हैं. पेड़ से तालाब का ‘पाणिग्रहण’ कराते है. आसपास लोग जुटते हैं लोक गीत गाया जाता है, अगले 3, 4 दिनों तक भव्य अनुष्ठान चलता है. साथ ही भोज-भात में पूरे गांव को खाजा, दही-चूड़ा, तरुआ भोज कराया जाता है. नाच-गान भी होता है. जैसे एक शादी में खुशियां मनाई जाती है. ठीक वैसे ही, कुल मिलाकर कहें तो तालाब कुंवारा होता है. जब तक उसके शादी केला ( कदली वृक्ष) से नहीं होगी वो जल शुद्ध नहीं माना जाता है.



