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धूप से बनेगा हाइड्रोजन ईंधन, सौर ऊर्जा के बाद एक और क्रांतिकारी तकनीक, जर्मनी में बना सोलर मॉड्यूल

जर्मनी के रिसर्चर्स ने हाल ही में एक अनोखा सोलर मॉड्यूल पेश किया है, जो सूरज की रोशनी के 31.3 प्रतिशत हिस्से को हाइड्रोजन में बदल सकता है। इससे प्रदूषण ना फैलाने वाले साफ ईंधन को फैक्ट्रियों में बड़े पैमाने पर बनाना बहुत आसान हो जाएगा। इस प्रोजेक्ट के लिए बाडेन-वुर्टेमबर्ग में स्थित फ्रौनहोफर इंस्टीट्यूट फॉर सोलर एनर्जी सिस्टम्स (ISE) के वैज्ञानिकों ने कॉन्सेंट्रेटिंग फोटोवोल्टिक सेल्स को प्रोटॉन एक्सचेंज मेम्ब्रेन (PEM) इलेक्ट्रोलाइजर सेल्स के साथ सीधे जोड़ दिया है। इसका मतलब है कि रिसर्च ने खास तरह के एडवांस सोलर पैनलों को सीधे पानी से हाइड्रोजन बनाने वाली मशीनों से जोड़ दिया। आइये, इसेक बारे में डिटेल में जानते हैं।

दो मशीनों को आपस में जोड़ा

रिसर्च ने देखा कि दोनों मशीनों को आपस में सीधे जोड़ने की वजह से बीच में बिजली का रूप यानी AC से DC या वोल्टेज बदलने का झंझट खत्म हो गया। इसके साथ ही, अब सोलर पैनल से मिलने वाली बिजली की मदद से सीधे पानी को अलग करके हाइड्रोजन ईंधन बनाना मुमकिन हो गया।

फ्रौनहोफर ISE में III-V फोटोवोल्टिक्स और कॉन्सेंट्रेटर टेक्नोलॉजी डिपार्टमेंट के हेड और दुनिया के सबसे कुशल सोलर सेल्स में से कुछ को विकसित करने के लिए मशहूर भौतिक विज्ञानी फ्रैंक डिमरोथ (PhD) ने कहा कि हमारा नया रिकॉर्ड दिखाता है कि सूरज की रोशनी से सीधे बहुत आसानी से हाइड्रोजन को बनाया जा सकता है। यह सिस्टम ट्रेडिशनल सोलर पैनल के बजाय कॉन्सेंट्रेटिंग फोटोवोल्टिक्स (PVs) पर बेस्ड है।

कैसे काम करता है मॉड्यूल?

  • इसमें एक खास तरह के लेंस का इस्तेमाल करके सूरज की बिखरी हुई रोशनी को एक जगह इकट्ठा किया जाता है। फिर इस तेज रोशनी को बहुत एडवांस और सुपर-पावरफुल सोलर पैनलों पर डाला जाता है, जिससे बहुत ज्यादा बिजली बनती है।
  • रिसर्चर्स ने इन सोलर सेल्स को सीधे सीरीज में लगे दो प्रोटॉन एक्सचेंज मेम्ब्रेन (PEM) इलेक्ट्रोलाइजर सेल्स के कैथोड और एनोड से जोड़ा। इसके बाद उन्होंने दोनों टेक्नोलॉजी की इलेक्ट्रिकल विशेषताओं का सावधानी से मिलान किया। सिस्टम ने बिना किसी बीच के कन्वर्जन स्टेज या एनर्जी लॉस के सीधे हाइड्रोजन प्रोडक्शन में बिजली ट्रांसफर की।
  • फील्ड टेस्ट में आउटडोर डेमोंस्ट्रेटर ने आने वाली सोलर एनर्जी का लगभग 31.3 प्रतिशत हिस्सा हाइड्रोजन में जमा केमिकल एनर्जी में बदल दिया। इस क्षमता का हिसाब फ्यूल की ‘हायर हीटिंग वैल्यू’ का इस्तेमाल करके लगाया गया था।
  • इस टेक्नोलॉजी में III-V सोलर सेल्स का इस्तेमाल किया जाता है, जिन्हें अभी दुनिया के सबसे ज्यादा कुशल फोटोवोल्टिक डिवाइस माना जाता है। अपनी बेहतरीन परफॉर्मेंस और टिकाऊपन की वजह से इन सेल्स का इस्तेमाल लंबे समय से स्पेसक्राफ्ट में किया जा रहा है।

मार्केट में कब आएगा?

भले ही इस शुरुआती मॉडल प्रोटोटाइप ने रिकॉर्ड तोड़ कामयाबी पाई है, लेकिन यह तकनीक अभी बनने की बिल्कुल शुरुआती स्टेज में है। रिसर्चर डिमरोथ ने बताया कि काम अभी शुरू ही हुआ है, इसलिए यह पक्का कहना मुश्किल है कि मार्केट में बिकने लायक फाइनल सिस्टम हम कितनी जल्दी तैयार कर पाएंगे।

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