संपादकीय

प्रधानमंत्री ‘गद्दार’ नहीं

राहुल गांधी लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं। दूसरा सबसे महत्वपूर्ण और संवैधानिक पद..! प्रोटोकॉल और राजनीति के लिहाज से नेता प्रतिपक्ष को ‘छाया प्रधानमंत्री’ माना जाता है। प्रधानमंत्री के बाद नेता विपक्ष के संसदीय दल के पक्ष में ही सर्वाधिक जनादेश होता है, लिहाजा इस सम्मान, प्रतिष्ठा की गरिमा रखी जानी चाहिए, लेकिन देश के तीसरी बार निर्वाचित प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को सार्वजनिक तौर पर ‘गद्दार’ कहकर राहुल गांधी ने ‘लाल लकीर’ पार कर दी है। जब प्रधानमंत्री मोदी विदेश में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे हों और नेता प्रतिपक्ष उन्हें ‘गद्दार’ करार दें, तो भारत भी अपमानित हुआ है। प्रधानमंत्री कभी भी ‘गद्दार’ नहीं हो सकते, क्योंकि उन्हें जनादेश हासिल है, बेशक आप उनका नीतिपरक विरोध कर सकते हैं। राहुल के ‘गद्दार’ अपशब्द से देश की 147 करोड़ से अधिक आबादी भी अपमानित हुई है। यकीनन यह निंदनीय, शर्मनाक, असंसदीय, असंवैधानिक और अमर्यादित अपशब्द है। हम भी मानते हैं और बराबर विश्लेषण कर रहे हैं कि देश में आर्थिक, तेल, खाद के संकट हैं, किल्लत है, लेकिन कोई ‘आर्थिक तूफान’ आ रहा है, इससे हम सहमत नहीं हैं। यदि विपक्ष के नेता के तौर पर राहुल गांधी के भीतर गुस्सा, आक्रोश है, किसान, युवा, महिलाएं, मजदूर, छोटे व्यापारी वाकई रो रहे हैं, तो प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और आरएसएस को ‘गद्दार’ की गाली देने के बजाय उन्हें जन-आंदोलन खड़ा करने का आह्वान करना चाहिए था। विपक्षी नेता राहुल गांधी ‘वैकल्पिक आर्थिक हालात’ का प्रारूप देश के सामने पेश कर सकते थे, लेकिन वह ‘तू-तड़ाक’ की भाषा पर उतर आए। राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री के लिए अपमानजनक भाषा में कहा- ‘एक दिन प्रधानमंत्री टीवी पर आएगा और फिर रोयेगा। जिस तरह कोविड में रोया था, उसी तरह फिर रोयेगा और देश से माफी मांगेगा।’ यह एक राष्ट्रीय, लोकतांत्रिक नेता की भाषा नहीं है, बल्कि राहुल की सामंतवादी सोच ऐसा बुलवा रही है। इसी सोच के मद्देनजर उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के लिए ‘चौकीदार चोर है’ जुमला 2019 में उछाला था।

उस लोकसभा चुनाव में कांग्रेस किस रसातल तक लुढक़ आई थी, राहुल गांधी को आज भी याद होगा। देश के युवा प्रधानमंत्री मोदी को डंडे मारेंगे, यह भी सार्वजनिक बयान दिया था। राहुल ने प्रधानमंत्री को ‘पनौती’ और सैनिकों के ‘खून की दलाली’ करने वाला भी कहा था। राहुल की यह जुबान लगातार चुनाव हारने की कुंठा और हताशा हो सकती है, लेकिन नियंत्रण खुद राहुल गांधी को करना है। आज वह नेता प्रतिपक्ष हैं। कल ऐसे राजनीतिक समीकरण बन सकते हैं कि समूचा विपक्ष उन्हें ‘प्रधानमंत्री का उम्मीदवार’ घोषित कर दे, लिहाजा उन्हें ‘आदतन अपशब्दों’ के आचरण से बचना होगा और अपने व्यक्तित्व, बयानों, आह्वानों को गंभीर, तार्किक, देशहित में करना होगा। देश तभी उन्हें ‘वैकल्पिक प्रधानमंत्री’ के रूप में देखना शुरू कर सकता है। सिर्फ मोदी-विरोध की नफरती सियासत से वह कभी भी प्रधानमंत्री नहीं बन सकते, यह हमारा मूल्यांकन और विश्लेषण है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े ने भी प्रधानमंत्री के लिए ‘जहरीला सांप’ और ‘100 सिर वाला रावण’ अपशब्दों के इस्तेमाल किए थे। ऐसा कांग्रेस और उसके नेताओं के लिए ‘आदतन’ नहीं है, दरअसल वे प्रधानमंत्री मोदी से नफरत करते हैं और 12 साल की सत्ता के बावजूद ‘आपका प्रधानमंत्री’ करार देते हैं। राहुल गांधी ने यह भी कहा कि यदि संघ के लोग आपके पास आएं और मोदी-शाह की बात करें, तो उनसे कहिए कि आपके प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और संगठन ‘गद्दार’ हैं। उन्होंने हिंदुस्तान बेचा है। हमारे संविधान, अंबेडकर जी, गांधी जी पर हमले किए हैं। देश और संविधान किसे बेचा है? देश आज भी मौजूद है और उसकी लोकसभा में राहुल गांधी नेता प्रतिपक्ष हैं। कांग्रेस के भीतर एक जमात ऐसी भी है, जिसके कुछ नेताओं ने प्रधानमंत्री मोदी के लिए ‘नीच’, ‘दानव’, ‘यमदूत’, ‘भस्मासुर’, ‘बिच्छू’, ‘सांप’, ‘अनपढ़’, ‘बंदर’, ‘राक्षस’ सरीखे अपशब्दों का प्रयोग किया है। इनसे उन्हें और पार्टी को तो कोई राजनीतिक फायदा नहीं हुआ। दरअसल राहुल गांधी 22 लंबे सालों से सांसद होने के बावजूद यह सामान्य-सी बात समझ नहीं पाए हैं कि राजनीति की अपनी भाषा होती है, आलोचना-निंदा के ये मायने नहीं होते कि गालियां दी जाएं। उन्होंने अपने लिए एक आवरण बना रखा है, एक मिथ गढ़ रखा है, उसी के भीतर वह आचरण करते रहे हैं। किसी को गद्दार कहने से देश का भला होने वाला नहीं है। इसके बजाय राहुल को महंगाई और बेरोजगारी जैसे मसले उठाने चाहिएं तथा समस्याओं के समाधान पेश करने चाहिएं।

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