संपादकीय

किस ब्रह्मांड में हैं ट्रंप

प्रधानमंत्री मोदी ने नीदरलैंड के एक मंच से आगाह किया है कि यह आपदाओं का दशक बन गया है। यदि पश्चिम एशिया युद्ध के हालात नहीं बदले, युद्ध नहीं थमा, तो दशकों की कई उपलब्धियों पर पानी फिर जाएगा। दुनिया की बड़ी आबादी फिर से गरीबी के दलदल में फंस जाएगी। सिंगापुर के प्रधानमंत्री लॉरेंस वोंग ने भी कहा है कि ऊर्जा-संकट अभी इतना बढ़ेगा कि दुनिया में आर्थिक महामंदी का दौर शुरू हो सकता है। होर्मुज अभी खुलता नहीं लग रहा, बल्कि समंदर का तनाव और बढ़ेगा। जंग अभी जारी रहेगी, लिहाजा हमें इन स्थितियों के लिए तैयार रहना है और मुकाबला भी करना है। जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन, इटली सरीखे विकसित देशों की अपनी चिंताएं हैं, क्योंकि तेल-गैस की उनकी सप्लाई चेन भी बहुत प्रभावित हुई है। अमरीकी राष्ट्रपति टं्रप न जाने किस ब्रह्मांड में रहते हैं? कैसे आत्म-मुग्ध, साम्राज्यवादी, आक्रांता किस्म के, कब्जेबाज राष्ट्रपति हैं, जिसे दुनिया की चिंता भी नहीं है और उसके प्रति सरोकार भी ‘शून्य’ हैं। टं्रप चीन प्रवास से खाली हाथ, नाकाम, फ्लॉप, समझौते के बिना, ईरान युद्ध के किसी समाधान के बिना और ताइवान पर चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की ‘युद्ध-सी’ चेतावनी सुनकर लौटे हैं और ईरान पर नए आक्रमण की रणनीति में जुट गए हैं। उनके अपने देश अमरीका में मुद्रास्फीति बढ़ गई है। पेट्रोल-डीजल 44-48 फीसदी तक महंगे हो गए हैं, जबकि अमरीका खुद तेल-उत्पादक और निर्यातक देश है। विश्व में हाहाकार मची है। जापान जैसे देश को अपना तेल रिजर्व खोलना पड़ा है, ताकि देश में आपूर्ति बराबर बनी रहे। कच्चे तेल की कीमतें 108 डॉलर प्रति बैरल तक उछल चुकी हैं। कच्चा तेल औसतन 51 फीसदी महंगा हुआ है। यूरिया और अमोनिया 65 फीसदी और बुटान (हाईड्रोकॉर्बन गैस) 51 फीसदी से अधिक महंगे हुए हैं। यह कोई अस्थायी बाधा और सामान्य स्थिति नहीं है। संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी का आकलन है कि ईरान युद्ध के कारण दुनिया के 4.5 करोड़ लोग भुखमरी के शिकार हो सकते हैं। क्या टं्रप को इन स्थितियों का एहसास तक नहीं है?

क्या वह विश्व-विजयी आक्रांता साबित होना चाहते हैं? राष्ट्रपति टं्रप के सौजन्य से ऐसी खबरें न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे मीडिया में छपी हैं कि ट्रंप ईरान के परमाणु कार्यक्रम और संवर्धित यूरेनियम (करीब 450 किग्रा.) पर कब्जा करने को सैन्य व्यूह-रचना करवा रहे हैं। यह कौन-सी कूटनीति है? अभी तक के युद्ध में तो अमरीका ईरान के परमाणु कार्यक्रम की परछाईं तक ढूंढ नहीं सका है और अब तो रूस, चीन उसे बराबर मदद दे रहे हैं। राष्ट्रपति टं्रप चीन गए थे, लेकिन चीन के प्रति इतना घोर अविश्वास और संदेह है कि चीन ने जो उपहार दिए थे, उन्हें हवाई अड्डे पर ही कूड़ेदान में डलवा कर नष्ट करा दिया गया। हैकिंग और जासूसी के उपकरणों का शक…! चीन ने सेमीकंडक्टर चिप, दुर्लभ खनिज, बोइंग विमान, बिजली के वाहन, आपसी व्यापार समझौते आदि पर कोई ठोस बात ही नहीं की, समझौता तो दूर की कौड़ी है। राष्ट्रपति टं्रप तो अपने ही ब्रह्मांड में रहते हैं, बेशक गालबजाई करते रहें कि चीन दौरा बेहद सफल रहा। हकीकत यह है कि टं्रप चीन से खाली हाथ लौटे हैं, लिहाजा गुस्से और कुंठा में ईरान पर नए आक्रमण की बात कर रहे हैं। पेंटागन के कमांडरों को युद्ध की तैयारियां करने के अघोषित आदेश दिए जा चुके हैं। हकीकत यह भी है कि चीन और रूस की मदद से ईरान युद्ध के मोर्चे पर अब भी डटा है और पलटवार की चेतावनियां भी जारी कर रहा है। भारत में लोगों की तल्ख प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं। शनिवार को देश के अलग-अलग हिस्सों में गिग वर्कर्स ने दोपहर 12 बजे से शाम 5 बजे तक प्रतीकात्मक हड़ताल रखी। गिग की संख्या देश भर में 1.2 करोड़ से अधिक बताई जाती है। कैब सेवाएं, ट्रक आदि ने भी हड़ताल के संकेत दिए हैं। हमारे देश में तेल कंपनियों ने 2022 के बाद पेट्रोल-डीजल के दाम 3-3 रुपए बढ़ाए हैं। उसी पर चीखा-चिल्ली मची है। विशेषज्ञ मानते हैं कि ये दाम 20-30 रुपए तक बढ़ेंगे, तभी तेल कंपनियों के घाटे पूरे होंगे और वे मुनाफा कमाने लगेंगी। अगर हालात सामन्य नहीं हुए तो आने वाला समय और ज्यादा संकट वाला होगा। फिलहाल तो वैश्विक संकट देखते रहिए।

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