संपादकीय

‘आधी आबादी’ की लड़ाई शेष

महिला आरक्षण बिल नहीं गिरा। टीवी चैनलों के कुछ अधपके, गौरवर्णा एंकरों को यह जानकारी ही नहीं है कि सामान्य विधेयक, कानून और संविधान संशोधन बिल में क्या फर्क हैं। महिला आरक्षण बिल तो सितंबर, 2023 में संसद सर्वसम्मति से पारित कर चुकी है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 28 सितंबर, 2023 को पारित बिल पर हस्ताक्षर कर उसे कानून बना दिया था। हालांकि 932 दिनों के बाद कानून की अधिसूचना तब जारी की गई, जब लोकसभा में 131वें संविधान संशोधन बिल पर बहस जारी थी। अब 17 अप्रैल, 2026 को वह संविधान संशोधन बिल लोकसभा में पारित नहीं हो पाया, जो बुनियादी तौर पर महिला आरक्षण के मुद्दे से जुड़ा था। बिल पारित कराने के लिए 352 सांसदों का समर्थन अनिवार्य था, लेकिन सत्तारूढ़ भाजपा-एनडीए के पक्ष में 298 वोट ही आए और विपक्ष की 230 सांसदों के समर्थन के बावजूद ‘राजनीतिक जीत’ हुई। संविधान संशोधन के लिए सदन में दो-तिहाई सांसदों का बहुमत अनिवार्य होता है। मोदी सरकार के करीब 12 साल के कार्यकाल में यह पहला मौका है, जब उसका कोई बिल अथवा संविधान संशोधन लोकसभा में गिरा है। नवंबर, 2021 में प्रधानमंत्री मोदी ने, किसान आंदोलन के मद्देनजर, तीन कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा की थी, जिसकी प्रक्रिया संसद में ही पूरी की गई थी। बहरहाल संविधान संशोधन गिरने के बाद जो भी व्याख्याएं की जाएं, लेकिन महिला आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर लटक कर रह गया है। 1996 से महिला आरक्षण बिल की यही नियति देखते रहे हैं। बिल गिरने के बाद नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और फिर विपक्ष के अन्य नेताओं ने यह आग्रह करना शुरू कर दिया है कि प्रधानमंत्री 2023 वाला कानून संसद में ले आएं, जरूरी संशोधन भी करा लें और उसके आधार पर ही महिलाओं का 33 फीसदी आरक्षण लागू कर दें। यह नहीं हो सकता, क्योंकि 2023 के कानून के साथ जनगणना और परिसीमन की अनिवार्यता भी नत्थी हैं।

यदि लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों पर ही आरक्षण लागू करना था, तो यह बिल 2010 में ही यूपीए सरकार पारित करा सकती थी। तब राज्यसभा में भाजपा के सहयोग, समर्थन से बिल पारित कराया गया था। मई, 2014 तक कांग्रेस नेतृत्व की यूपीए सरकार थी, विपक्षी भाजपा भी समर्थन देने को तैयार थी, तो बिल लोकसभा में पेश क्यों नहीं किया गया? अंतत: बिल ‘लैप्स’ हो गया। लोकसभा की मौजूदा संख्या के आधार पर 181 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जानी थी। तब ‘पुरुष वर्चस्ववादी’ दलों के उन्हीं नेताओं ने पुरजोर विरोध किया था, जो शुरू से ही महिला आरक्षण के विरोधी थे और अलग-अलग सवाल, संदेह, आशंकाएं जता रहे थे। मनमोहन सरकार गिर भी सकती थी, लिहाजा बिल को नेपथ्य में फेंक दिया गया। अब उन्हीं के ‘विरासती नेता’ 543 सीटों पर महिला आरक्षण लागू करने की मांग कर रहे हैं। बहरहाल बिल गिरने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने देश की माताओं, बहनों, बेटियों से बात करने का बहाना बना कर राष्ट्र को संबोधित कर महिला आरक्षण को एक ‘राजनीतिक मोहरा’ बनाने की कोशिश की है। प्रधानमंत्री ने नारी-शक्ति के सपनों, अरमानों को कुचलने, रौंदने और अंतत: भ्रूण-हत्या करने सरीखे शब्दों का इस्तेमाल किया है। उन्होंने कांग्रेस, सपा, तृणमूल, द्रमुक सरीखे विपक्षी दलों को निशाना बनाया और उन्हें नारी-शक्ति के गुनहगार, संविधान के अपराधी, पापी आदि करार दिया। प्रधानमंत्री ने उन सभी बदलावों, सुधारों को भी गिनाया और खासकर कांग्रेस को सुधार-विरोधी, महिला-विरोधी, परजीवी, देश में दरारें पैदा करने वाली पार्टी भी करार दिया। प्रधानमंत्री मोदी संविधान संशोधन गिरने के बाद गुस्से में लगते हैं, पराजय के कारण आक्रोश में भी हैं, लेकिन उन्होंने माताओं-बहनों से क्षमा भी मांगी है, क्योंकि वह बिल पारित नहीं करा सके। चूंकि 23 अप्रैल को बंगाल, तमिलनाडु में मतदान होने हैं, लिहाजा भाजपा और उसके सहयोगी दल सडक़ों पर बिछ गए हैं। राहुल गांधी के आवास के बाहर उनका पुतला भी फंूक दिया है। अब सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा महिला आरक्षण बन गया है, लेकिन प्रधानमंत्री ने यह संकेत तक नहीं दिया है कि अब महिला आरक्षण कब तक लागू हो सकेगा?

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