संपादकीय

महिला-शक्ति का समय

यह देश की संसदीय प्रणाली में ‘महापरिवर्तन’ का दौर है। संसद का विशेष सत्र 16, 17, 18 अप्रैल को महिला आरक्षण कानून को लागू करने और नए परिसीमन कानून को पारित करने पर विमर्श करेगा। लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में 33 फीसदी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हों, इस प्रावधान का बिल और कानून बीते 30 सालों से लटका पड़ा है। 1996 में देवगौड़ा सरकार के दौरान सबसे पहले महिला आरक्षण बिल पेश किया गया, तो संसद अगड़ी-पिछड़ी, फैशनेबल, दलित महिलाओं के खांचों में बंट गई थी। बिल को फाड़ दिया गया था। ऐसे भय और ऐसी आशंकाएं मुलायम सिंह यादव, शरद यादव, उमा भारती, लालू यादव सरीखे संसदीय नेताओं ने व्यक्त कीं कि बालकटी, फैशनपरस्त और ऊंचे घरानों की ही महिलाएं, आरक्षण के जरिए, संसद तक पहुंचेंगी। नतीजतन बिल को लटकाया और भटकाया जाता रहा। सितंबर, 2023 में यह बिल मोदी सरकार ने ‘नारी शक्ति वंदन विधेयक’ के तौर पर पारित कराया। नवंबर, 2023 में राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद यह कानून बन गया, लेकिन इसे लागू नहीं किया गया। सरकार 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले भी इसे लागू कर सकती थी, क्योंकि 2011 की जनगणना को आधार बनाया जाना था। लोकसभा की मौजूदा सीटों की संख्या 1971 की जनगणना पर आधारित थी। लंबे 55 साल के बाद परिवर्तन अनिवार्य है, क्योंकि जनसंख्या के साथ-साथ देश की अर्थव्यवस्था भी बदल चुकी है। चूंकि यह मामला 2026 तक ‘फ्रीज’ रखा गया था, लिहाजा अब सरकार नया परिसीमन आयोग बना रही है और संसद से कानून पारित कराएगी। महिला आरक्षण कानून 2029 के लोकसभा चुनाव और उसके बाद के विधानसभा चुनावों और उपचुनावों पर लागू किया जा सके, लिहाजा संसद में 131वां संविधान संशोधन लाया जाएगा। संविधान संशोधन बिल पारित कराने के लिए सरकार को 362 सांसदों का समर्थन चाहिए अथवा सदन में उपस्थित सांसदों का दो-तिहाई बहुमत होना चाहिए। विपक्ष के पाले में 233 सांसद हैं, लिहाजा सरकार के लिए चुनौती है।

विपक्ष इसे भी मुद्दा बना रहा है और परिसीमन कानून पर बिल के विरोध में मत-विभाजन मांग सकता है। परिसीमन कानून तो साधारण बहुमत से पारित किया जा सकता है, लेकिन महिला आरक्षण संविधान संशोधन का विषय है, लिहाजा दो-तिहाई बहुमत की दरकार है। बुधवार को विपक्ष की बैठक प्रस्तावित थी। तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल में मतदान से सिर्फ एक सप्ताह पहले ही संसद का विशेष सत्र क्यों बुलाया गया और महिला आरक्षण तथा परिसीमन कानूनों पर संविधान संशोधन पारित कराने की योजना सरकार ने क्यों बनाई, विपक्ष इसी सवाल से चिपका है। कुछ विशेषज्ञ ऐसी व्याख्याएं भी कर रहे हैं कि महिला आरक्षण कानून 2039 के लोकसभा चुनाव से पहले लागू नहीं हो सकता, क्योंकि 2027 की जनगणना के बाद एक और परिसीमन की आवश्यकता हो सकती है या 2029 तक परिसीमन का काम सम्पन्न नहीं हो सकता। बहरहाल राजनीति तो इस देश की हरेक धडक़न में है, लेकिन यह देश के सामाजिक, राजनीतिक, लैंगिक और संसदीय परिदृश्य बदलने का समय है। जो प्रस्ताव संसद के विचाराधीन है, उसके मुताबिक, राज्यों से 815 सांसद चुन कर लोकसभा में आएंगे, जबकि संघशासित क्षेत्रों से 35 सांसद चुने जाएंगे, लिहाजा 2029 में लोकसभा में 850 सांसद दीख सकते हैं। अभी यह संख्या 543 है। आरक्षण 15 साल के लिए होगा।

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