संपादकीय

परिसीमन का पेच…

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन की अगुआई में हुई संयुक्त कार्रवाई समिति (JAC) की बैठक से स्पष्ट हो गया है कि इसमें शामिल हुए दलों के लिए परिसीमन कितना संजीदा मुद्दा है। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू NDA का हिस्सा होने के बावजूद अपने ढंग से इस मसले को उठा चुके थे, लेकिन पिछले कुछ समय से इस पर स्टालिन काफी मुखर नजर आ रहे थे। खैर, JAC में परिसीमन प्रक्रिया को और 25 वर्षों के लिए स्थगित करने का प्रस्ताव पारित किया गया।

संवाद की संभावना : परिसीमन स्थगित करने के प्रस्ताव को एक सुझाव के रूप में लिया जाए तो बैठक के दौरान इन नेताओं का जोर इस पर दिखा कि वे विरोध परिसीमन का नहीं बल्कि इस प्रक्रिया में निहित और संभावित अन्याय का कर रहे हैं। हालांकि, केंद्र की NDA सरकार की तरफ से यह बात साफ की जा चुकी है कि दक्षिणी राज्यों के साथ किसी प्रकार का अन्याय नहीं होने दिया जाएगा। इन दोनों पहलुओं को पॉजिटिव नजरिए से देखा जाए तो संवाद के जरिए कोई हल निकलने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

टकराव के आसार : 
सवाल है कि ऐसे में संवाद के बजाय टकराव बढ़ता क्यों दिख रहा है। इसके पीछे पिछले कुछ समय से केंद्र और राज्यों के बीच बढ़ी दूरी की भी अहम भूमिका है। चाहे, विरोधी दलों के शासन वाले कुछ राज्यों में राज्यपालों की अति सक्रियता का सवाल हो या त्रिभाषा फॉर्म्युले पर हुई बयानबाजी का या फिर कर-राजस्व आवंटन में होने वाले कथित भेदभाव संबंधी आरोपों का- कुछ हलकों में ऐसी धारणा बनी है कि राज्यों की हैसियत धीरे-धीरे घट रही है।

बहस का मूल : समझना होगा कि इस बहस के मूल में दो बुनियादी सिद्धांत हैं। पहला लोकतंत्र और दूसरा संघात्मक ढांचा। लोकतंत्र संख्या के हिसाब से हिस्सेदारी की बात करता है तो संघात्मक ढांचा राज्यों की समान हैसियत सुनिश्चित करने की गारंटी देता है। दोनों में से किसी को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

बीच की राह : अगर यह बात सही है कि परिसीमन को अनंतकाल तक स्थगित किए रहना कोई हल नहीं हो सकता तो इसमें भी दो राय नहीं कि किसी राज्य को जनसंख्या वृद्धि पर काबू पाने की सजा नहीं मिलनी चाहिए। ऐसे में रास्ता एक ही है कि केंद्र किसी के साथ अन्याय न होने देने के अपने संकल्प से आगे बढ़कर कुछ राज्यों में जोर पकड़ती अन्याय की आशंका को संबोधित करे और उसे दूर करने का प्रयास करे।

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