संपादकीय

…क्या महज औपचारिकता बन गया है सदन?


एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में संसद जनहित से जुड़े मुद्दों पर बहस का सर्वोच्च मंच होता है, तो ऐसे में सरकार और विपक्ष की जिम्मेदारी हो जाती है कि वे इसकी उपयोगिता और महत्त्व को कायम रखें। विडंबना यह है कि जब भी संसद का सत्र शुरू होता है, किसी न किसी मुद्दे पर सरकार और विपक्ष के बीच असहमति एक टकराव में तब्दील हो जाती है और दोनों सदनों का ज्यादातर समय बेकार चला जाता है।

एक ओर विपक्षी पार्टियां सरकार से किसी मुद्दे पर जवाब की मांग करती हैं, तो दूसरी ओर सरकार आमतौर पर ऐसी मांगों की अनदेखी करने का रुख अख्तियार कर लेती है। नतीजतन, हंगामे और सदन को स्थगित किए जाने के समांतर विपक्ष के बहिर्गमन के बीच संसद की कार्यवाही महज औपचारिकता बन कर रह जाती है। जबकि इसी बीच सरकार अपनी सुविधा के मुताबिक ऐसे मसलों पर तैयार विधेयकों को भी बिना चर्चा के पारित करा लेती है, जिन पर विपक्षी दलों के विचार और व्यापक बहस की जरूरत होती है। इस सत्र में कई विधेयकों को पारित करने में इतना कम वक्त लगा, मानो उसके लिए महज औपचारिकता निभाई गई हो।

सवाल है कि इस तरह की स्थितियों में संसद और लोकतंत्र की क्या अहमियत रह जाती है। मानसून सत्र के तीन सप्ताह जिस तरह सिर्फ हंगामे और विपक्ष के बहिर्गमन के दौरान बार-बार स्थगित होते हुए गुजर गए, उससे एक बार फिर यह सवाल उठा है कि क्या संसद को अब सिर्फ दिखावे का ठिकाना मान लिया गया है! वरना क्या वजह है कि एक ओर विपक्षी दलों की ओर से पूरे सत्र के दौरान नीट प्रश्नपत्र लीक, राम मंदिर दान राशि में कथित गड़बड़ी और विद्यार्थियों के विरोध प्रदर्शन पर पुलिस की कार्रवाई के मुद्दे पर सरकार को घेरा गया, संबंधित और जिम्मेदार मंत्रियों से जवाबदेही की मांग की गई, वहीं सरकार ने इन मसलों पर एक विचित्र चुप्पी ओढ़े रखी।

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खासतौर पर दिल्ली में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस की बेरहमी और पैलेट गन चलाने के सवाल पर विपक्ष ने जवाब मांगा, लेकिन गृह मंत्री ने आखिरी दिन इसे लेकर थोड़ी सक्रियता दिखाई, जो प्रकारांतर से बेमानी साबित हुई। अगर यही रुख पहले जाहिर किया गया होता, तो संभव है कि संसद में कुछ मुद्दों और पेश किए गए विधेयकों पर बहस की गुंजाइश निकल पाती।

अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि अलग-अलग मुद्दों पर सरकार और विपक्ष के बीच गतिरोध कायम रहने की वजह से कार्य उत्पादकता लोकसभा में महज उन्नीस फीसद और राज्यसभा में उनतालीस फीसद रही। अब इस बात पर चिंता जताने में शायद सभी दल शामिल होंगे कि संसद की कार्यवाही नहीं चलने की वजह से करोड़ों रुपए बर्बाद हो गए। यह समझना मुश्किल है कि संसद की कार्यवाही के दौरान मुद्दों पर मत-विरोध उभरने, सदन स्थगित किए जाने या विपक्ष के बहिर्गमन के तमाम उदाहरण सामने रहते हुए भी सरकार की ओर से कोई ऐसी पहल नहीं दिखती कि वह सत्र की शुरुआत से पहले सभी विपक्षी दलों को विश्वास में ले और जरूरी मुद्दों पर चर्चा सुनिश्चित करे।

जिस तरह जनहित से जुड़े मामलों पर विधेयकों को बिना बहस या चर्चा के ही पारित कर दिए जाने की परंपरा चल पड़ी है, उसका सीधा असर जनता के अधिकारों और लोकतंत्र की सेहत पर पड़ेगा। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि संवाद, बहस या चर्चा संसद की कार्यवाही के जीवन तत्त्व हैं और इसे सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी सभी दलों की है, लेकिन इसके लिए सरकार की जवाबदेही ज्यादा बनती है।

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