बड़ी कामयाबी…

26/11 यानी मुंबई आतंकी हमले के बहुचर्चित आरोपी तहव्वुर राणा का अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में दायर रिव्यू पिटिशन खारिज होने के बाद उसके प्रत्यर्पण की राह खुल गई है। यह भारत की एक अहम कूटनीतिक और कानूनी जीत तो है ही, आतंक के कारोबारियों को न्याय की वेदी पर ला पटकने के वैश्विक अभियान के लिहाज से भी एक बड़ा कदम है।
आतंक का बर्बर चेहरा : 2008 का मुंबई आतंकी हमला न केवल देशवासियों को स्तब्ध कर देने वाला था बल्कि इसने पूरी दुनिया को सकते में डाल दिया। जिस तरह समुद्री मार्ग से आए लश्कर-ए-तैयबा के दस आतंकवादियों ने भारत की वित्तीय राजधानी को बंधक सा बना लिया और यहां तीन दिनों तक आतंक का खेल खेलते रहे, उसे भुलाना मुश्किल है। इस हमले से जुड़े कई आतंकी इस दौरान मारे भी जा चुके हैं, लेकिन भारत की न्याय व्यवस्था का सामना करने की जहां तक बात है तो कसाब के बाद तहव्वुर राणा दूसरा प्रमुख चेहरा होगा।
परदे के पीछे का सच : आतंक के इस खेल में मोहरे बने लोग भले सामने नजर आते हों, उनकी भूमिका नगण्य ही होती है। असल भूमिका इन्हें परदे के पीछे से बढ़ावा देने वाले उन लोगों की होती है जो आम तौर पर परदे के पीछे ही बने रहते हैं। तहव्वुर राणा का यह प्रत्यर्पण इस लिहाज से भी अहम है। वह न केवल मुख्य आरोपी डेविड कोलमैन हेडली का करीबी सहयोगी रहा बल्कि कनाडा जा बसने से पहले पाकिस्तान आर्मी में मेडकल ऑफिसर के तौर पर भी काम करता रहा है। आश्चर्य नहीं कि 26/11 केस में पब्लिक प्रॉसीक्यूटर रहे उज्ज्वल निकम समेत कई लोग मानते हैं कि यह प्रत्यर्पण इस मामले में पाकिस्तानी सुरक्षा प्रतिष्ठान से जुड़े अफसरों की भूमिका पर भी बेहतर ढंग से रोशनी डाल सकता है।
आगे की चुनौतियां : ऐसे में बहुत महत्वपूर्ण है कि आने वाली चुनौतियों की गंभीरता को समझते हुए एक-एक कदम फूंक-फूंक कर बढ़ाया जाए। राणा की सुरक्षा सुनिश्चित करना और तमाम अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन करते हुए आगे बढ़ना जितना जरूरी है, उतना ही महत्वपूर्ण है कूटनीतिक मोर्चे पर सावधानी बनाए रखना। तभी इस मामले की अंतरराष्ट्रीय साजिश से जुड़ी तमाम परतों को खोलना और इसमें शामिल सभी तत्वों को बेनकाब करना संभव हो पाएगा।



