किसे कहेंगे घुसपैठिया?…

फिल्म अभिनेता सैफ अली खान अस्पताल से घर लौट आए हैं। राजनेताओं की भाषा के मुताबिक, सैफ ‘टनाटन’ और बिल्कुल स्वस्थ नजर आ रहे हैं। हमले के मात्र पांच दिन बाद ही सैफ बिल्कुल ठीक हो गए, उनके गहरे जख्म भी भर गए, वाह! चमत्कार हो गया। यही हमारी राजनीति की भाषा है। हमारे नेताओं के ऐसे वाहियात और बेमानी विश्लेषण हैं कि वे सैफ पर जानलेवा हमले और बांग्लादेशी अभियुक्त को लेकर सवाल कर रहे हैं। बहरहाल हम इस मुद्दे को यहीं छोड़ते हैं, क्योंकि पुलिस और अन्य एजेंसियों को सम्यक जांच करने की पूरी स्वतंत्रता दी जानी चाहिए। यह नेताओं के संदेहों और सवालों का क्षेत्र भी नहीं है। हमारा बुनियादी सरोकार यह है कि बांग्लादेशी घुसपैठियों और रोहिंग्या मुसलमानों का मुद्दा एकदम ‘राष्ट्रीय’ बन गया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने महाराष्ट्र सरकार को अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने का आदेश दिया है। बाकायदा राज्य के गृह विभाग को एक पत्र लिखा गया है। सैफ के हमले ने यह मुद्दा एक बार फिर गरमा दिया है। पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा राज्यों की सीमाओं पर अवैध घुसपैठियों की धरपकड़ अचानक बढ़ गई है और उन्हें वापस बांग्लादेश में खदेड़ा जा रहा है। दिल्ली के उपराज्यपाल विनय सक्सेना ने पुलिस आयुक्त को पत्र लिखा था, जिसके बाद बांग्लादेशी घुसपैठियों के खिलाफ तलाशी अभियान बढ़ गए हैं। अलबत्ता बांग्लादेश वापस भेजने की कोई खबर नहीं आई है, क्योंकि राष्ट्रीय राजधानी के गली-मुहल्लों में बांग्लादेशी दशकों से सक्रिय हैं। वे जीवन और समाज का हिस्सा बने हैं। वे रिक्शा चलाते हैं। उनकी औरतें घरों में काम करती हैं। इलाके के ढाबों और दुकानों पर बांग्लादेशी मजदूरी करते हैं। वे सहकारी सोसायटी के फ्लैटों में निर्माण, मरम्मत, बढ़ई, प्लंबर और एयर कंडीशनर मैकेनिक के तौर पर खुलेआम, सालों से काम कर रहे हैं। उनके पास आधार कार्ड, वोटर आई कार्ड, राशन कार्ड जैसे सरकारी दस्तावेज हैं। वे ‘प्रधानमंत्री की मुफ्त अनाज’ योजना का भी लाभ उठा रहे हैं। वे आम आदमी पार्टी के चुनावी लाभार्थी समूह में भी शामिल हैं। कानूनन वे ‘भारतीय’ हैं। उनकी पुश्तैनी जड़ें अधिकतर बंगाल, असम, त्रिपुरा आदि राज्यों से जुड़ी हैं।
ऐसे में किसे ‘घुसपैठिया’ करार देंगे और किस पर ‘अवैध प्रवासी’ का संदेह कर कानूनी कार्रवाई करेंगे? दरअसल बांग्लादेश से पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, असम, मेघालय और मिजोरम राज्यों की सीमाएं लगती हैं। अधिकतर सीमाएं खुली हैं। हालांकि करीब 77 फीसदी सीमा पर बाड़बंदी का काम किया जा चुका है, लेकिन दोनों देशों के बीच कुछ सीमा-विवाद हैं, कुछ इलाके नदियों से सटे हुए हैं, जहां फेंसिंग नहीं की जा सकती। इन इलाकों के लोग भी बाड़ का विरोध करते रहे हैं। लिहाजा बांग्लादेश से त्रिपुरा, असम, बंगाल के जरिए लोग आते-जाते रहे हैं। पकड़े जाने पर वे खुद को असम, त्रिपुरा के निवासी बताते हैं। दस्तावेज भी होते हैं, तो प्रशासन और पुलिस उन्हें हिरासत में कैसे रख सकते हैं? हमारे देश में ऐसे भी गिरोह सक्रिय हैं, जो फर्जी कार्ड और दस्तावेज बनवा देते हैं। यह भी नए किस्म का भ्रष्टाचार और देशद्रोह है। चूंकि सैफ अली खान वीआईपी शख्स हैं, लिहाजा उनके घर में घुसने और हमला करने का यह मामला सुर्खियों में आ गया। अभी तक की जांच में बांग्लादेशी घुसपैठिए को ही ‘हमलावर’ माना जा रहा है, लिहाजा यह मुद्दा नए सिरे से ‘राष्ट्रीय’ बन गया। आरएसएस इस मुद्दे को दशकों से उठाता रहा है। संघ के आकलन भी सामने आते रहे हैं कि देश में 2 करोड़ से ज्यादा बांग्लादेशी अवैध रूप से घुस चुके हैं और ‘नकली भारतीय’ बनकर रह रहे हैं। ऐसे घुसपैठियों में आतंकवादी और तस्करों के एजेंट भी पाए गए हैं। गिरफ्तारी होती है, जांच होती है, लेकिन अंतिम निष्कर्ष शून्य रहा है। बीते 11 साल से केंद्र में मोदी सरकार है, जो चेतना से संघवादी है। इस मुद्दे पर खूब राजनीति भी होती रही है। अब दिल्ली चुनाव में भाजपा के आरोप हैं कि केजरीवाल की पार्टी बांग्लादेशी घुसपैठियों और रोहिंग्याओं के दस्तावेज बनवा रही है और उन्हें दिल्ली में ही बसा रही है, ताकि वे ‘आप’ के ही वोटर बने रहें। बेशक यह भी गंभीर जांच का विषय है। अब देखते हैं कि यह मुद्दा ‘राष्ट्रीय फोकस’ में आने के बाद किस अंजाम तक पहुंचता है?
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