संपादकीय

गठबंधन में कांग्रेस का घटता कद

हरियाणा की हार I.N.D.I.A. खेमे में कांग्रेस की साख पर भारी पड़ती दिख रही है। हरियाणा के चुनावी नतीजे आने के बाद न सिर्फ विपक्षी नेताओं की बयानबाजी के अंदाज बदल गए हैं बल्कि सीट बंटवारे में कांग्रेस की सौदेबाजी करने की क्षमता भी खत्म हो गई लगती है।

‘त्याग’ की मजबूरी
इसका पहला बड़ा प्रभाव उत्तर प्रदेश में दिखा, जहां नौ विधानसभा सीटों पर हो रहे उपचुनाव के मद्देनजर समाजवादी पार्टी ने एकतरफा ढंग से उम्मीदवार घोषित करने शुरू किए। कांग्रेस ने पहले परदे के पीछे बातचीत कर मामले को संभालने की कोशिश की, लेकिन बात नहीं बनी। आखिरकार उसने त्याग की मुद्रा अख्तियार करते हुए कहा कि लोकतंत्र और संविधान बचाने की इस लड़ाई में व्यापक हितों को देखते हुए वह अपना कोई प्रत्याशी खड़ा नहीं करेगी और सभी 9 सीटों पर समाजवादी पार्टी को जिताने का प्रयास करेगी।

बात बराबरी की
महाराष्ट्र विकास आघाड़ी के तीनों प्रमुख दलों में कांग्रेस खुद को सबसे बड़ी बता रही थी। इसका ठोस आधार भी था। लोकसभा चुनावों में पार्टी ने राज्य में विपक्षी दलों में सबसे ज्यादा 13 सीटें जीती थीं। स्वाभाविक ही वह बाकी दोनों दलों के मुकाबसे ज्यादा सीटें मांग रही थी। शुरुआती खबरों में ऐसे संकेत भी मिले कि उसकी मांग को स्वीकार कर लिया जाएगा। लेकिन आखिरी दौर में शरद पवार की अगुआई में हुई बैठक में जो फॉर्म्युला मंजूर हुआ, उसके मुताबिक तीनों पार्टियों – कांग्रेस, शिवसेना (यूबीटी) और एनसीपी (शरद)- ने 85-85 सीटों पर लड़ना तय किया। निश्चित रूप से यह कथित बराबरी कांग्रेस के खिलाफ है, लेकिन वह इसे मानने को मजबूर दिख रही है।

बड़े व्यक्तित्व की जरूरत
सवाल यह है कि कांग्रेस का यह घटा हुआ कद I.N.D.I.A. ब्लॉक के क्षेत्रीय दलों के लिए तात्कालिक तौर पर फायदेमंद भले हो, क्या यह दीर्घकालिक तौर पर गठबंधन के लिए लाभकारी होगा? ध्यान रहे, लोकसभा चुनावों में अगर विपक्ष बेहतर प्रदर्शन कर सका तो उसके पीछे दो दौर की भारत जोड़ो यात्रा के कारण विपक्ष के नेता के तौर पर राहुल गांधी के बढ़े हुए कद का भी कम योगदान नहीं था। भले ही मौजूदा दौर गठबंधन का हो, उसके केंद्र में एक बड़े व्यक्तित्व की मौजूदगी जरूरी होती है जो गठबंधन को न सिर्फ जोड़े रखता है बल्कि उसे मजबूती भी देता है।

सीधा मुकाबला है अहम

ऐसे में अगर विपक्षी गठबंधन को सार्थक विकल्प के रूप में बने रहना है तो कांग्रेस को इस कमजोरी से उबरना पड़ेगा। लेकिन यह तब तक नहीं होगा, जब तक कि वह BJP से सीधे मुकाबले में हार जाने वाली अपनी छवि को निर्णायक तौर पर नहीं बदलती।

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