संपादकीय

क्या टकराव से पहले बात नहीं हो सकती थी?

एक स्वस्थ लोकतंत्र में सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना और शांतिपूर्ण तरीके से विरोध प्रदर्शन नागरिकों का अधिकार होता है। सच यह है कि असहमति और उसकी शांतिपूर्ण अभिव्यक्ति से ही लोकतंत्र जीवन पाता है और मजबूत होता है।

मगर कुछ मसलों पर सरकारी तंत्र का रुख कई बार इस हद तक उदासीन और उपेक्षापूर्ण हो जाता है कि आम लोगों को अपनी बात दर्ज करने के लिए आंदोलन एक जरूरी विकल्प लगने लगता है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि अगर सरकार ने नीट प्रश्नपत्र लीक के मुद्दे पर उभरे विरोध के बाद समय रहते आंदोलनकारियों से संवाद का रास्ता अपनाया होता, तो क्या स्थिति को संभाला जा सकता था?

आमतौर पर सरकार की ओर से टालमटोल के रवैये की वजह से ही संवादहीनता की स्थिति पैदा होती है और इसके बाद कभी-कभी आंदोलन की दिशा भी नियंत्रित नहीं रह पाती। हैरानी की बात यह है कि मतभेद या सवालों के सामने आने पर सरकार अपनी ओर से बातचीत में दिलचस्पी नहीं दिखाती, लेकिन जब लोग सड़क पर उतर जाते हैं, तब कथित हिंसा पर काबू पाने के नाम पर पुलिस के जरिए बलप्रयोग का सहारा लेने से भी नहीं हिचकती।

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दरअसल, नीट 2026 के प्रश्नपत्र लीक के मुद्दे पर विद्यार्थियों के आंदोलन के दौरान जो भी अराजकता और पुलिस की कार्रवाई देखने में आई, वह सरकार और आंदोलनकारियों के बीच संवादहीनता का ही नतीजा थी।

इसी से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्त्वपूर्ण टिप्पणी की कि अगर कुछ गुमराह लोग पत्थरबाजी भी करते हैं, तो भी युवाओं को शांत करने और उनसे बातचीत करने की जरूरत है।

गौरतलब है कि दिल्ली के जंतर-मंतर पर पुलिस ने आंदोलनकारियों पर जिस तरह लाठीचार्ज किया और आंसू गैस के गोले छोड़े, उस पर तीखे सवाल उठे। इसके बाद पुलिस की ओर से यह सफाई दी गई कि आंदोलनकारियों की भीड़ अराजक और हिंसक हो गई थी।

सवाल है कि क्या सिर्फ इस दलील से प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस की सख्ती, बेरहमी और यहां तक कि कई छात्राओं के प्रति भी अफसोसनाक बर्ताव को उचित ठहराया जा सकता है? खबरें यहां तक आईं कि प्रदर्शन कर रहे युवाओं पर ‘पैलेट गन’ भी चलाई गई, जिसका उपयोग हर लिहाज से गलत था।

अव्वल तो इस स्थिति से बचने के लिए हर तरह के वैकल्पिक उपायों का सहारा लेने की जरूरत थी, लेकिन क्या यह नौबत सिर्फ संवाद की उपेक्षा करने या इसके प्रति उदासीन होने की वजह से ही नहीं आई?

पुलिस की सख्ती सवालों के घेरे में आने के बाद मुद्दा जब राजनीतिक शक्ल अख्तियार करने लगा और विपक्षी दलों ने भी इस मसले पर आवाज उठाई, तब विद्यार्थियों की मांग के मुताबिक आखिर केंद्रीय शिक्षा मंत्री का इस्तीफा हुआ और आंदोलनकारियों से बातचीत भी की गई।

संवाद के जरिए हल तक पहुंचने की कोशिश करने का जो काम सरकार ने स्थिति बिगड़ने के बाद किया, क्या वही वह प्रदर्शन के पहले नहीं कर सकती थी? क्या इसी अपरिपक्वता और समय पर बातचीत के तकाजे की अनदेखी का ही नतीजा नहीं था कि प्रदर्शनकारियों ने ‘संसद मार्च’ का आह्वान किया और फिर एक अप्रिय और दुखद स्थिति पैदा हुई?

इस लिहाज से देखें, तो सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह संवाद को तरजीह देने पर जोर दिया है, वह दरअसल सबसे शुरुआती और लोकतांत्रिक तकाजा है। उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार इसे एक सबक के तौर पर देखेगी।

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