आंकड़ों में गरीबी घटी लेकिन क्या आत्मनिर्भरता बढ़ी?

विश्व बैंक के आंकड़ों पर सरकार को अपनी पीठ थपथपाने और विपक्षी आलोचना को पटखनी देने का अवसर मिल गया है। परंतु असली सवाल यह है कि शहरी हो या देहाती, सामान्य नागरिक के जीवन में कितना बदलाव आया? विश्व बैंक की अप्रैल 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, 2011-12 से 2023-24 के बीच भारत में निम्न-मध्यम आय वाले देशों के लिए निर्धारित गरीबी रेखा, प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 396 रुपए (2021 की क्रय-शक्ति के आधार पर) की आमदनी हुई। मतलब कि गरीबी रेखा से नीचे रहने वाली आबादी लगभग 58 प्रतिशत से घटकर 16 प्रतिशत रह गई और करीब 50 करोड़ लोग गरीबी रेखा से ऊपर आए। अत्यधिक गरीबी यानी प्रतिदिन 283 रुपए से कम पर जीवन बिताने वालों का अनुपात भी 27 प्रतिशत से घटकर ढाई प्रतिशत रह गया। ध्यान रहे कि यह विश्लेषण 2021 में किसी व्यक्ति की खरीददारी करने की क्षमता पर आधारित था और अब 2026 है। इसलिए पूछा जाना चाहिए कि क्या इस आमदनी से जीवन समृद्ध, सुरक्षित और आत्मनिर्भर बन सकता है?
राजनीति और नेताओं के स्वार्थ : इन आंकड़ों का राजनीतिक पक्ष भी कम दिलचस्प नहीं है। सत्ताधारी दल इन्हें अपनी नीतियों और नेतृत्व की सफलता का प्रमाण बताता है। विपक्ष बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की परेशानी और सरकारी योजनाओं की कमियों को सामने लाकर सरकार को घेरता है। राजनीति में यह स्वाभाविक है लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब आंकड़े राजनीतिक हथियार बन जाते हैं। उल्लेखनीय है कि गरीबी में कमी एक लंबी प्रक्रिया का परिणाम होती है। इसमें आॢथक विकास, लोगों की मेहनत, रोजगार, कृषि और उद्योग की स्थिति, पहले से चल रही योजनाएं और वर्तमान सरकार की नीतियां, सभी की भूमिका होती है। इसका पूरा श्रेय किसी एक सरकार को देना न्याय नहीं होगा।
मुफ्त सुविधाएं-राहत या स्थायी समाधान : लगभग 80 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज, किसानों को प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के तहत सालाना 6,000 रुपए, उज्ज्वला योजना के तहत गैस कनैक्शन, शौचालय निर्माण के लिए सहायता, गरीबों के लिए आवास, स्वास्थ्य बीमा और महिलाओं के लिए अलग-अलग राज्यों में नकद सहायता जैसी सुविधाओं का महत्व नकारा नहीं जा सकता। वृद्ध, विधवा और दिव्यांग लोगों को सामाजिक सुरक्षा देना कोई मुफ्तखोरी नहीं, बल्कि कल्याणकारी राज्य का दायित्व है।
राहत और विकास दो अलग-अलग चीजें हैं। मुफ्त गैस कनैक्शन मिलना और नियमित रूप से सिलैंडर भरवा पाना दो अलग बातें हैं। शौचालय बन जाना और पानी की नियमित उपलब्धता होना भी अलग बातें हैं। किसान के खाते में 6,000 रुपए आना राहत हो सकती है, लेकिन खेती की लागत, फसल का उचित मूल्य, सिंचाई और बाजार की समस्याओं का पूरा समाधान नहीं। मुफ्त राशन पेट भर सकता है लेकिन परिवार की स्थायी आमदनी नहीं बन सकता। विडंबना यह है कि केंद्र या राज्य की कोई और किसी भी दल की सरकार हो, कोई यह नहीं जानना चाहता कि इन योजनाओं से लाभाॢथयों के जीवन में दीर्घकालीन बदलाव कितना आया। क्या बच्चों की शिक्षा बेहतर हुई? क्या महिलाओं को आॢथक स्वतंत्रता मिली? क्या युवाओं को कौशल और रोजगार मिला? क्या परिवार कुछ वर्षों बाद सरकारी सहायता के बिना भी अपनी जरूरतें पूरी करने की स्थिति में पहुंचा?
युवा को मुफ्त सुविधा नहीं, भविष्य चाहिए : आज का पढ़ा-लिखा युवा केवल राहत नहीं चाहता, नौकरी चाहता है, अपना कारोबार शुरू करना चाहता है और अपने परिवार का भविष्य सुरक्षित करना चाहता है। भारत सरकार के आंकड़े बताते हैं कि 15 से 29 वर्ष के युवाओं में बेरोजगारी दर 10 प्रतिशत थी। शहरी युवाओं में यह 14 प्रतिशत रही। केवल 5 प्रतिशत युवाओं ने ही औपचारिक व्यावसायिक या तकनीकी प्रशिक्षण प्राप्त किया था। लगभग हर चौथा युवा न रोजगार में था, न शिक्षा में और न ही प्रशिक्षण में। यह केवल बेरोजगारी की कहानी नहीं है बल्कि हमारे कौशल और अवसरों के बीच की खाई है।
अपना छोटा उद्योग या कारोबार शुरू करने वाला व्यक्ति बैंक से कर्ज, लाइसैंस, निरीक्षण, सरकारी मंजूरी और भुगतान में देरी जैसी अड़चनों से जूझता है। कहीं उसे सिफारिश की जरूरत पड़ती है, कहीं रिश्वत दिए बिना काम नहीं होता। ऐसे माहौल में आत्मनिर्भर बनने का सरकारी नारा जमीन पर कितना कारगर है, यह समझना कोई रॉकेट साइंस नहीं है।
दूसरे देशों से तुलना : यूरोप के कई देशों में व्यापक सामाजिक सुरक्षा है। पैंशन, बेरोजगारी भत्ता और स्वास्थ्य सुविधाएं हैं लेकिन इनके साथ कौशल प्रशिक्षण, अप्रैंटिसशिप और रोजगार में वापसी की व्यवस्था भी जोड़ी जाती है। जर्मनी की व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रणाली इसका उदाहरण है, जहां पढ़ाई के साथ उद्योगों में काम सीखने का अवसर मिलता है। डेनमार्क में बेरोजगार व्यक्ति को सहायता देने के साथ उसे रोजगार के योग्य बनाने पर जोर दिया जाता है। एशिया में चीन, वियतनाम और बंगलादेश ने उद्योग, निर्यात, विनिर्माण के साथ रोजगार के अवसर बढ़ाने पर जोर दिया। बड़े पैमाने पर औद्योगिक विकास और बुनियादी ढांचे ने गरीबी घटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन देशों की नीतियां भारत में ज्यों की त्यों लागू नहीं की जा सकतीं लेकिन एक सबक स्पष्ट है, सामाजिक सहायता जरूरी है लेकिन यदि स्थायी रूप से आॢथक प्रगति का सपना साकार करना है तो रोजगार और आमदनी के अवसर पैदा किए बिना कोई चारा नहीं।
असली विकास का पैमाना : क्या गरीब परिवार का बच्चा अच्छी शिक्षा पा रहा है? क्या किसान की आमदनी सम्मानजनक है? क्या युवा को योग्यता के अनुसार रोजगार मिल रहा है? क्या छोटा व्यापारी बिना रिश्वत और सिफारिश के अपना काम कर सकता है? क्या महिलाओं को सहायता के साथ आॢथक स्वतंत्रता भी मिल रही है? सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं होनी चाहिए कि उसने कितने करोड़ लोगों को मुफ्त सुविधाएं दीं, बल्कि यह होनी चाहिए कि कितने करोड़ लोग अब उन सुविधाओं पर निर्भर हुए बिना सम्मानपूर्वक अपना जीवन चला सकते हैं। गरीबी घटाना बड़ी उपलब्धि है लेकिन गरीबी से बाहर आए व्यक्ति को फिर से गरीबी में न लौटने देना उससे भी बड़ी जिम्मेदारी है। लोकतंत्र में सरकार का मूल्यांकन इस बात से नहीं होना चाहिए कि उसने जनता को कितना दिया, बल्कि इस बात से होना चाहिए कि उसने जनता को अपने दम पर कितना कमाने, आगे बढऩे और सम्मानपूर्वक जीने योग्य बनाया।-पूरन चंद सरीन



