पहाड़ों में उड़ान पर सुरक्षा से समझौता क्यों?

उत्तराखंड के चमोली जिले में 30 अक्तूबर, 2026 को बद्रीनाथ से देहरादून के सहस्त्रधारा हैलीपैड के लिए उड़ान भरने वाला ट्रांस भारत एविएशन का एक हैलीकॉप्टर जोशीमठ के पास चाई गांव-हाथी पर्वत क्षेत्र में दुर्घटनाग्रस्त हो गया। इसमें दिल्ली के रहने वाले पायलट कैप्टन हिमांशु सभ्रवाल समेत कर्नाटक के पांच यात्रियों की मौत हो गई, जिनमें बेंगलुरु पुलिस के इंस्पैक्टर अरुण सालुंके भी शामिल थे। ऑरेंज अलर्ट और खराब मौसम के बीच उड़ान भरने वाला यह विमान संपर्क टूटने के तुरंत बाद पहाड़ी से टकराया। यह हादसा चारधाम क्षेत्र में हो रही हैलीकॉप्टर दुर्घटनाओं की शृंखला का हिस्सा है और पहाड़ी उड़ानों की मूलभूत कमजोरियों को उजागर करता है।
पहाड़ों में हैलीकॉप्टर उड़ानें स्वाभाविक रूप से जोखिम भरी होती हैं। संकरी घाटियां, अचानक बदलता मौसम, घना बादल, तेज हवाएं और ऊंचाई पर ऑक्सीजन की कमी पायलट के निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित करती है। चारधाम यात्रा में हैलीकॉप्टर सेवाएं लोकप्रिय हो गई हैं क्योंकि वे तीर्थयात्रियों को कठिन पैदल यात्रा से बचाती हैं। लेकिन यह सुविधा सुरक्षा के मूल्य पर आ रही है। एयरक्राफ्ट एक्सीडैंट इन्वैस्टिगेशन ब्यूरो (AAIB) के आंकड़ों के अनुसार, 2015 से 2025 के बीच चारधाम सैक्टर में 8 दुर्घटनाएं और एक गंभीर घटना हुई, जिनमें से 5 घातक थीं। इनमें से अधिकांश का कारण मानक संचालन प्रक्रियाओं (SOP) का पालन न करना, खराब मौसम में निर्णय लेना और ऊंचाई संबंधी चुनौतियां थीं। 2025 में ही कई हादसे हुए, जिनमें गौरीकुंड और उत्तरकाशी के क्रैश प्रमुख हैं।
जोशीमठ हादसे के संभावित कारणों में मौसम सबसे अहम माना जा सकता है। भारतीय मौसम विभाग ने चमोली में तूफान, बारिश और तेज हवाओं का ऑरेंज अलर्ट जारी किया था। उड़ान भरते समय स्थानीय मौसम भले ही साफ रहा होगा लेकिन घाटी में बादल और वर्षा अचानक छा गए होंगे। पहाड़ी उड़ानों में नियंत्रित उड़ान में भू-भाग से टकराना (CFIT) एक सामान्य कारण होता है, जब पायलट दृश्यता खोकर गलत दिशा में चला जाता है। अन्य संभावित कारणों में पायलट का अनुभव, विमान की रखरखाव स्थिति या ऑप्रेटर द्वारा जल्दबाजी में उड़ान भरने का दबाव शामिल हो सकता है। ए.ए.आई.बी. जांच में उपलब्ध उपकरणों की जांच करेगा (हैलीकॉप्टर में आमतौर पर ब्लैक बॉक्स नहीं होता), पायलट का उड़ान इतिहास, रखरखाव रिकॉर्ड और चारधाम संबंधी डी.जी.सी.ए. नियमों का अनुपालन देखा जाएगा।ए.ए.आई.बी. का उद्देश्य दोषारोपण नहीं, बल्कि कारण पता कर भविष्य की सुरक्षा सुनिश्चित करना होता है। फिर भी व्यावहारिक रूप से पायलट की निर्णय लेने की गलती, ऑप्रेटर की नियामकीय लापरवाही या दोनों सामने आ सकते हैं। फिलहाल उत्तराखंड नागरिक उड्डयन विकास प्राधिकरण ने ट्रांस भारत एविएशन के पूरे बेड़े को एहतियातन ग्राऊंडेड कर दिया है। पूर्व में इस कंपनी के पायलटों के लाइसैंस खराब मौसम में उड़ान भरने पर निलंबित हो चुके हैं और आपातकालीन लैंडिंग की घटनाएं भी रही हैं।
भारत में निजी हैलीकॉप्टर ऑप्रेटर चारधाम जैसे क्षेत्रों में नियम-कानूनों की धज्जियां उड़ाते हुए देखे गए हैं। ए.ए.आई.बी. पुरानी रिपोर्टों में स्पष्ट हुआ है कि अधिकांश हादसे एस.ओ.पी. का पालन न करने से हुए। फर्जी फ्लाइट लॉग, पायलटों के ड्यूटी घंटों की अनदेखी, खराब मौसम में उड़ान और अतिरिक्त यात्राओं के लिए नकद लेन-देन जैसी शिकायतें आम रही हैं। 2025 के गौरीकुंड क्रैश में आर्यन एविएशन पर एस.ओ.पी. उल्लंघन का आरोप लगा और उसके संचालन निलंबित किए गए। डी.जी.सी.ए. ने कई बार ऑडिट किए, जुर्माने लगाए और कुछ ऑप्रेटरों को अस्थायी रूप से रोका लेकिन ये कदम अधिकतर हादसों के बाद प्रतिक्रियात्मक रहे हैं। मुनाफे की होड़ में यात्रियों की संख्या बढ़ाने के लिए नियमों को ताक पर रखा जाता है।
नागरिक उड्डयन मंत्रालय और डी.जी.सी.ए. इस मामले में ढीले साबित हो रहे हैं क्योंकि नियामक ढांचा काफी हद तक खंडित है। डी.जी.सी.ए. राष्ट्रीय स्तर पर लाइसैंसिंग और नियम बनाने वाला निकाय है, जबकि उत्तराखंड में उत्तराखंड नागरिक उड्डयन विकास प्राधिकरण दैनिक समन्वय संभालता है। गौरतलब है कि संसदीय स्थायी समिति ने भी इस क्षेत्राधिकारिक अस्पष्टता को रेखांकित किया है कि डी.जी.सी.ए. निरंतर और सक्रिय पर्यवेक्षण नहीं करता। पर्वतीय उड़ानों के लिए पर्याप्त हिल-फ्लाइंग अनुभव, मौसम निगरानी और आपातकालीन लैंङ्क्षडग स्थलों की कमी बनी हुई है। ए.ए.आई.बी. ने 50 घंटे की पर्यवेक्षित हिल उड़ान की सिफारिश की है लेकिन इसका क्रियान्वयन कमजोर रहा है। परिणाम यह है कि हादसे होते रहते हैं और केवल अस्थायी ग्राऊंडिंग या सर्कुलर जारी करके मामला ठंडा कर दिया जाता है।
निजी चॉपर ऑप्रेटरों द्वारा केवल मुनाफे के बारे में सोचना और यात्रियों की सुरक्षा के साथ समझौता करना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं। चारधाम यात्रा आध्यात्मिक है लेकिन यह व्यावसायिक अवसर भी बन गई है। जब ऑप्रेटर खराब मौसम की चेतावनी के बावजूद उड़ान भरते हैं या पायलटों पर अतिरिक्त सॉर्टी का दबाव डालते हैं, तो वे जानबूझकर जोखिम बढ़ा रहे होते हैं। यात्रियों को ‘तीर्थ यात्रा’ का आकर्षण दिखाकर महंगे टिकट बेचे जाते हैं लेकिन उनके जीवन की कीमत मुनाफे के आगे नहीं आंकी जाती। सुरक्षा एक समझौता नहीं, अनिवार्य शर्त होनी चाहिए।
जोशीमठ हादसा एक और चेतावनी है। ए.ए.आई.बी. की विस्तृत रिपोर्ट आने तक निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी, लेकिन पैटर्न साफ है। पहाड़ी उड़ानों के लिए सख्त मौसम प्रोटोकॉल, अनुभवी पायलटों की अनिवार्य शर्त, रियल-टाइम निगरानी और प्रभावी दंड व्यवस्था जरूरी है। मंत्रालय और डी.जी.सी.ए. को प्रतिक्रियात्मक रवैए से हटकर सक्रिय नियामक बनना होगा अन्यथा मुनाफे की ये उड़ानें और जानें लेती रहेंगी।-रजनीश कपूर



