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बुजुर्गों की अनदेखी और बिखरते पारिवारिक मूल्य

कुछ दिन पहले कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआइ से जुड़ी एक कंपनी के मालिक ने कहा था कि इन बूढ़ों की बात मत सुनिए। उन्होंने यह कोई नई बात नहीं कही। वृद्ध होते ही समाज आपको एक दयनीय चीज समझता है। कई बार सरकारें भी इस आशय की बात कहती रहती हैं कि वृद्ध लोग अर्थव्यवस्था पर बोझ हैं।

पहली नजर में देखने पर ऐसा लगता है कि ऐसा सोचना सही ही होगा। आखिर समाज और आर्थिकी को चलाने के लिए युवा चाहिए। कोरोना महामारी के समय भी ऐसा बहुत कुछ सुनने को मिला था। किसी भी दल की सरकार हो, वे अपनी जो भी योजनाएं बनाती हैं, वे युवाओं को लक्षित होती हैं।

दूसरी ओर, चीन, जापान और यूरोप के बहुत से देश हैं, जहां लोग अब बच्चे नहीं पैदा करना चाहते। कहीं यह सरकारी नीतियों की उपज है, तो कहीं समाज की मानसिकता का बन गया हिस्सा। मगर अब वहां की सरकारें कह रही हैं कि आगे उनका देश कैसे चलेगा, क्योंकि उनके यहां बुजुर्गों की संख्या बढ़ती जा रही है। उनकी सामाजिक सुरक्षा योजना पर काफी खर्च होता रहा है।

‘लोग बुढ़ापे से डरते हैं’

भारत में भी बाल सफेद होते ही स्त्री या पुरुष को वृद्ध के खाते में डाल दिया जाता है। यानी प्रकारांतर से कहा जाता है कि अब समाज को उसकी जरूरत नहीं। ‘चित्रलेखा’ उपन्यास का वह वाक्य याद आता है, जहां शृंगार करते हुए एक महिला चित्रलेखा से कहती है कि- देवी, सफेद बाल! फिल्म में नायिका को एकाएक शीशे में अपनी शक्ल दांत टूटी हुई, एक अशक्त बुढ़िया के रूप में नजर आने लगती है। यानी लोग बुढ़ापे से डरते हैं।

बुढ़ापा यानी मृत्यु के आसपास होने का अहसास। शायद यही कारण है कि अब चाहे कोई स्त्री हो या पुरुष, बहुत कम लोगों के बाल सफेद नजर आते हैं। सौंदर्य उद्योग ने भी अपने उत्पादों को लोकप्रिय करने के लिए मुहावरा चलाया है- ‘एज इज जस्ट ए नंबर’, यानी उम्र सिर्फ एक अंक भर है।

जब तक अपने यहां संयुक्त परिवारों का बोलबाला था, तब तक फिर भी घरों में बुजुर्गों की कुछ अहमियत थी। हालांकि तब भी ऐसे मामले होते थे, जब किसी बुजुर्ग को बहुत से परिवार वाले किसी ऐसे स्थान पर छोड़ आते थे, जहां से वे फिर कभी घर न लौट सकें।

‘अनुभव उम्र से ही तय होता है’

मगर कई लोक कथाएं ऐसी मिलती हैं, जहां जब युवा वर्ग किसी परेशानी में फंसता है, तो बुजुर्ग ही उन्हें उस मुसीबत से निकालते हैं। ये एक तरह से उनके अनुभव के महत्त्व को समझना है। अनुभव उम्र से ही तय होता है। जन्म लेते ही कोई अनुभवी नहीं हो जाता।

जब से एकल परिवारों का चलन दुनिया भर में बढ़ा है, तब से बुजुर्गों की हालत खराब होती जा रही है। पश्चिम में तो फिर भी सरकारों की तरफ से कुछ योजनाएं उनके लिए हैं। अच्छे वृद्धाश्रम भी हैं, लेकिन अपने यहां ऐसा बहुत कम है। इंटरनेट पर मौजूद वीडियो में अक्सर दिखता है कि कभी बहू, तो कभी बेटा, तो कभी बेटी, वृद्ध माता-पिता के संसाधनों पर कब्जा जमाकर उन्हें वृद्धाश्रमों में छोड़ने की बातें करते हैं।

अपने देश में सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2022 में बुजुर्गों की आबादी 15.3 करोड़ थी। 2050 तक इनकी आबादी 34.7 करोड़ होने का अनुमान है। इसीलिए मांग की जा रही है कि अब सेवानिवृत्ति की उम्र को बढ़ाया जाए। सेवानिवृत्ति के बाद भी ऐसे काम हों, जिन्हें उम्रदराज लोग कर सकें। उनकी कुछ आय हो जाए और वे बच्चों पर निर्भर न रहें।

‘बुजुर्गों के मसले पर बहुत बेमन से सोचा जाता है’

मगर अपने यहां सरकारों की यह सोच नहीं बदली है कि इन दिनों भी बच्चे माता-पिता के साथ रहते होंगे। इसीलिए बुजुर्गों के मसलों पर बहुत बेमन से सोचा जाता है। यहां तक कि बहुत सारी विदेशी कंपनियां भी भारत आकर ऐसा ही सोचती हैं।

इस संदर्भ में बहुत पहले की एक घटना कई लोगों को याद होगी। एक युवा को बहुत बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी में नौकरी मिली, लेकिन उसे घर के किराए का भत्ता नहीं दिया गया। कारण पूछने पर कंपनी ने कहा कि आप तो अपने माता-पिता के साथ रहते होंगे। कुछ साल पहले एक सर्वेक्षण में बताया गया था कि भारत में तिरसठ फीसद युवा परिवार के साथ नहीं रहना चाहते।

‘बुजुर्ग अपने बच्चों की शिकायत तक नहीं करते’

जब से यह बात चली है कि भारत सबसे युवा आबादी वाला देश है, पैंसठ फीसद लोग युवा हैं, तब से शायद ही किसी राजनीतिक पार्टी को हमने बुजुर्गों की इतनी बड़ी आबादी के हितों के बारे में बात करते सुना होगा। इनके वोट तो सभी को चाहिए, लेकिन ये सबसे उपेक्षित नागरिक बना दिए गए हैं। सही है कि कभी-कभार अदालतें जरूर लताड़ लगाती हैं, लेकिन अदालतों तक कितने लोग पहुंच पाते हैं! परिवार की प्रतिष्ठा की खातिर ज्यादातर बुजुर्ग अपने बच्चों की शिकायत तक नहीं करते।

पिछले दिनों एक बेटे ने अपनी मां से मारपीट की। जब पुलिस ने उसे पकड़ा, तो मां ने कहा कि मेरा बेटा तो बहुत अच्छा है। अगर उसने पीटा होता, तो क्या मुझे चोट न लगती? जबकि इस घटना का वीडियो भी उपलब्ध था।

एक ओर कोई बुजुर्ग अपने बेटे को बचाने के लिए इस हद तक चला जाता है कि अपने खिलाफ बेटे की हिंसा और अपमान को भी नजरअंदाज करता है, दूसरी ओर बेटा अपने स्वार्थ में पिता के प्रति न्यूनतम संवेदना भी नहीं रख पाता। सवाल है कि जहां बुजुर्गों को ऐसे दुराग्रहों के बीच जीवन गुजारना पड़ रहा हो, वहां एक संवेदनशील समाज का हिस्सा होने पर हम कैसे खुश हो लें!

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