व्यापार

भारत के लिए विदेशी पूंजी की अहमियत

इन विभिन्न बहुआयामी प्रयासों के बावजूद भारत में टिकाऊ विदेशी पूंजी आकर्षित करने के लिए अभी भी कई ठोस सुधारों की आवश्यकता है। केवल बड़े घरेलू बाजार और उच्च विकास दर के भरोसे रहना पर्याप्त नहीं होगा…

हाल ही में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक 25 सितंबर तक भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 747.6 अरब डालर के स्तर पर पहुंचते हुए भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक मजबूत आर्थिक सुरक्षा कवच बन गया है। भारत दुनिया में चीन, जापान और स्विट्जरलैंड के बाद चौथा सबसे बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार रखने वाला देश बन गया है। यह बात भी महत्वपूर्ण है कि पिछले माह 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के बाद ब्रिक्स देशों से भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश बढऩे की संभावनाएं बढ़ी हैं। इस बार ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में यूएई और सऊदी अरब जैसे देशों की उपस्थिति से भारत के बुनियादी ढांचे, ऊर्जा और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में बड़े पैमाने पर निवेश आने की उम्मीद है। इस शिखर सम्मेलन के दौरान ब्रिक्स देशों के बीच कृषि, तकनीक और वित्त क्षेत्रों में आपसी साझेदारी बढ़ाने पर जोर दिया गया है, जिससे भारत में प्राइवेट सेक्टर के निवेश को बढ़ावा मिलेगा। ब्रिक्स के विस्तार से नए ब्रिक्स देशों में भारतीय सामान और सेवाओं के निर्यात के नए दरवाजे खुले हैं। इस सम्मेलन ने वैश्विक आर्थिक सहयोग और कूटनीतिक प्रभाव को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई है, जिससे वैश्विक निवेशकों का भारत पर भरोसा बढ़ा है। इन सबसे भारत में विदेशी निवेश बढ़ेगा। उल्लेखनीय है कि भारत का रिकॉर्ड विदेशी मुद्रा भंडार भारत के लिए कई दृष्टिकोणों से लाभप्रद है। यह वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच देश को आर्थिक स्थिरता प्रदान करता है।

अमरीकी डॉलर के मुकाबले रुपए में आने वाले उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए रिजर्व बैंक इस भंडार का उपयोग करता है, जिससे भारतीय मुद्रा मजबूत बनी रहती है। चूंकि भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है, अतएव यह विशाल भंडार देश को 10-12 महीने से अधिक के निर्बाध आयात के लिए वित्तीय सुरक्षा देता है। मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार विदेशी निवेशकों को आकर्षित करता है, क्योंकि यह देश की ऋण चुकाने की क्षमता और वित्तीय मजबूती को दर्शाता है। मजबूत आर्थिक स्थिति के कारण वैश्विक रेटिंग एजेंसियां देश की क्रेडिट रेटिंग सुधारती हैं, जिससे भारतीय कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय बाजार से सस्ती दरों पर कर्ज मिलता है। वैश्विक युद्ध, महंगाई या अन्य देशों के केंद्रीय बैंकों के फैसलों से उत्पन्न आर्थिक संकटों को झेलने में विदेशी मुद्रा भंडार सुरक्षा कवच की तरह मदद करता है। गौरतलब है कि हाल ही में जहां विभिन्न वैश्विक क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों-जापानी क्रेडिट रेटिंग एजेंसी (जेसीआर), एसएंडपी रेटिंग्स और फिच रेटिंग्स ने भारत के विदेशी मुद्रा भंडार की मजबूती को रेखांकित किया है, वहीं भारतीय रिजर्व बैंक की विशेष डॉलर-रुपए विदेशी मुद्रा अदला-बदली (फॉरेक्स स्वैप) सुविधा के तहत अभूतपूर्व सफलता ने वैश्विक वित्तीय जगत में भारत की आर्थिक साख और मजबूती का एक नया अध्याय लिख दिया है। यह महत्वपूर्ण है कि 8 जून 2026 को शुरू की गई इस योजना के प्रति अनिवासी भारतीयों (एनआरआई) ने ऐसा अभूतपूर्व उत्साह दिखाया कि आरबीआई को अपने लक्ष्य समय से पहले ही निर्धारित लक्ष्य हासिल हो गए। यह परिदृश्य बताता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रति वैश्विक स्तर पर निवेशकों का भरोसा अटूट है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि गत 18 अगस्त को गजट अधिसूचना के बाद लागू कराधान एवं अन्य कानून (संशोधन) अधिनियम 2026 अब भारत में विदेशी पूंजी को आकर्षित करने, कर व्यवस्था में स्पष्टता लाने और घरेलू विनिर्माण को सुदृढ़ बनाने के परिप्रेक्ष्य में अत्यंत अहम भूमिका निभाएगा। इसका मुख्य उद्देश्य भारत को वैश्विक पूंजी और व्यापार के लिए अधिक आकर्षक व भरोसेमंद गंतव्य बनाना है।

यह अपतटीय निवेश कोषों (ऑफशोर इन्वेस्टमेंट फंड्स) और फंड प्रबंधकों के लिए नियमों को सरल बनाता है, जिससे भारत से परिचालन करने वाले कोष प्रबंधकों को कर संबंधी जटिलताओं का सामना न करना पड़े। इससे वैश्विक केंद्रों में कार्यरत भारतीय व विदेशी प्रबंधक सुगमता से भारत की ओर रुख करेंगे। इसके अतिरिक्त इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्षेत्र के लिए उपकरण आपूर्ति पर मिलने वाली आयकर छूट को वर्ष 2040-41 तक विस्तारित किया गया है। सीमा शुल्क-बंधित (कस्टम्स-बॉन्डेड) गोदामों में इलेक्ट्रॉनिक घटकों के भंडारण को कर-मुक्त करने और डेटा सेंटरों के लिए प्रक्रियाओं को सुगम बनाने से वैश्विक कंपनियां भारत में बड़े पैमाने पर निवेश के लिए आकर्षित होंगी। इससे रोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे। यह भी उल्लेखनीय है कि 21 साल बाद यानी वर्ष 2047 तक भारत को विकसित देश बनाने और लगभग 30-35 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने और प्रति व्यक्ति आय करीब 18000 डॉलर करने के लिए बुनियादी ढांचे, तकनीक और विनिर्माण क्षेत्र में भारी निवेश की आवश्यकता है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए भारत को लगातार औसतन करीब 9 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि दर बनाए रखनी होगी। इतने बड़े विकास लक्ष्य को अकेले घरेलू संसाधनों से पूरा करना संभव नहीं होगा, इसलिए विदेशी पूंजी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। इसमें कोई दो मत नहीं हैं कि आर्थिक सुधारों के पिछले 35 वर्षों में जो विदेशी मुद्रा भारत में धीमी गति से आई है, अब कराधान और अन्य कानून (संशोधन) अधिनियम 2026 के लागू होने के बाद भारत की ओर विदेशी मुद्रा के प्रवाह में तेजी आने की पूरी संभावनाएं हैं। यदि हम भारत में विदेशी पूंजी आकर्षित करने के ऐतिहासिक प्रयासों पर दृष्टि डालें, तो पाते हैं कि 1991 के आर्थिक संकट के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव और वित्त मंत्री डा. मनमोहन सिंह द्वारा आर्थिक सुधारों का नया दौर शुरू किया गया था।

तब से अब तक विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए निरंतर कई ठोस कदम उठाए गए हैं। बीमा, दूरसंचार और खुदरा (रिटेल) जैसे प्रमुख क्षेत्रों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की सीमा बढ़ाकर 100 प्रतिशत तक कर दी गई है। रक्षा क्षेत्र में भी कुछ शर्तों और नियमों के साथ 100 प्रतिशत एफडीआई की अनुमति दी गई है। अधिकांश क्षेत्रों में पूर्व-सरकारी अनुमति के बिना (स्वचालित मार्ग से) निवेश करने की छूट प्रदान की गई। पुराने और कठोर ‘फेरा’ (एफईआरए) कानून को समाप्त कर लचीला ‘फेमा’ (एफईएमए) लागू किया गया जिससे विदेशी मुद्रा का प्रवाह और लेनदेन आसान हो गया। देश को वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करने और विदेशी कंपनियों को आकर्षित करने के लिए मेक इन इंडिया अभियान शुरू किया गया। निवेशकों को कर में छूट, सरल नियम और आधुनिक बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराने के लिए विशेष आर्थिक क्षेत्रों (एसईजेड) का विकास किया गया।

प्रमुख विनिर्माण क्षेत्रों में उत्पादन बढ़ाने वाली कंपनियों को वित्तीय प्रोत्साहन देने के लिए उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (पीएलआई) जैसी व्यवस्थाएं की गईं। व्यापार को गति देने के लिए चालू खाते पर रुपए को पूरी तरह से परिवर्तनीय बनाया गया तथा भारतीय शेयर बाजार में विदेशी संस्थागत और पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) के लिए नियमों को सरल किया गया। इन विभिन्न बहुआयामी प्रयासों के बावजूद भारत में टिकाऊ विदेशी पूंजी आकर्षित करने के लिए अभी भी कई ठोस सुधारों की आवश्यकता है। केवल बड़े घरेलू बाजार और उच्च विकास दर के भरोसे रहना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए देश के नियामक ढांचे, कर प्रणाली और कानूनी तंत्र में व्यापक बदलाव अनिवार्य हैं। दीर्घकालिक निवेश के लिए स्थिर नीतियां पहली प्राथमिक शर्त हैं। कर नियमों, सीमा शुल्क और क्षेत्र-विशेष के प्रावधानों में अचानक होने वाले परिवर्तनों से निवेशक दूर भागते हैं।

डा. जयंती लाल भंडारी

Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button