राजनीति

स्वतंत्रता, भोजन व ईंधन से वंचित लोग उठ खड़े होते हैं विरोध में

जब लोगों को स्वतंत्रता, भोजन, ईंधन या किसी अन्य अत्यंत अनिवार्य आवश्यकता से वंचित किया जाता है, तो वे विरोध में उठ खड़े होते हैं। वर्तमान में, विशेष रूप से युवाओं द्वारा फ्रांस, अल्बानिया, बैल्जियम, ब्राजील, चिली, इटली, मोरक्को और पुर्तगाल-और भारत में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। सरकार को दोषी ठहराया जाता है क्योंकि उसे संकट को कम करने या गलतियों को सुधारने के लिए पर्याप्त कदम उठाते हुए नहीं देखा जा रहा। यूरोप में कुछ विरोध प्रदर्शन हिंसक हो गए हैं जो कि निंदनीय है।

अमरीका में, लोग शिकायत करते हैं कि खाद्य पदार्थों की कीमतें ‘अवहनीय’ हैं और ईंधन की कीमतें ‘असहनीय’ हो गई हैं। इसके लिए ट्रम्प को जिम्मेदार ठहराया जाता है। फ्रांस में, लोग स्कूलों की खराब सुविधाओं और शिक्षकों की कमी के कारण अच्छी शिक्षा से वंचित होने की शिकायत करते हैं। मैक्रों को जिम्मेदार ठहराया जाता है। अल्बानिया में, शिकायत एक बहुमूल्य आद्र्रभूमि पारिस्थितिकी तंत्र (वैटलैंड ईकोसिस्टम) को व्यावसायिक दोहन के लिए एक अमरीकी पूंजीपति को सौंपने को लेकर है। एदी रामा को जिम्मेदार ठहराया जाता है। इनमें से प्रत्येक विरोध प्रदर्शन नागरिक की इस भावना का हिस्सा है कि ‘मैं तभी स्वतंत्र हूं जब मैं भोजन जुटा सकूं, अच्छी शिक्षा प्राप्त कर सकूं और अपने पर्यावरण की रक्षा करने में सक्षम रहूं’। यह नमक कर के खिलाफ हुए विरोध की तरह है-नमक पर कर लगाना किसी की स्वतंत्रता को पूरी तरह से प्रतिबंधित नहीं करता लेकिन औपनिवेशिक शक्ति द्वारा नमक कर लगाए जाने का विचार महात्मा गांधी की स्वतंत्रता की अवधारणा के बिल्कुल विपरीत और घृणित था।

अविश्वसनीय रूप से संवेदनहीन : मतदान का अधिकार, निॢववाद रूप से, एक स्वतंत्र देश में किसी नागरिक का सबसे कीमती अधिकार है। मुझे विश्वास नहीं होता कि भाजपा सरकार इतनी संवेदनहीन हो सकती है कि उसने खुद को यह विश्वास दिला लिया कि मतदाता सूची से 13,30,00,000 नामों (26 राज्यों की वयस्क आबादी का 14 प्रतिशत) को हटाए जाने से विरोध का कोई बड़ा तूफान नहीं उठेगा। भारत निर्वाचन आयोग (ई.सी.आई.) ने कहा कि नामों को एक ‘प्रक्रिया’ के तहत हटाया गया था। कोई भी प्रक्रिया ‘उचित विधिक प्रक्रिया’ नहीं होती। ई.सी.आई. ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया है। अब ई.सी.आई. ‘छूट गए’ मतदाताओं को पुन: नामांकित करने के लिए ‘विशेष शिविरों’ का आयोजन कर रहा है! ‘छूट गए’ कहना केवल भ्रम फैलाना है-वास्तव में नामों को गैरकानूनी तरीके से हटाया गया था।
एस.आई.आर. 26 राज्यों में 3 चरणों में आयोजित किया गया था : 

एस.आई.आर. पर कितने करोड़ रुपए खर्च किए गए? पुन: नामांकन पर कितने करोड़ रुपए खर्च होंगे? इस दोहरे खर्च के लिए किससे अधिभार वसूला जाएगा?
हटाए गए लोगों का पुन: नामांकन : संपूर्ण एस.आई.आर. प्रक्रिया को सुप्रीम कोर्ट में कई आधारों पर व्यापक रूप से चुनौती दी गई है। अदालत ने नोटिस जारी किया। अगले ही दिन, ई.सी.आई. ने अपना रुख पूरी तरह बदल दिया, शेष राज्यों के लिए एस.आई.आर. को त्याग दिया और पारंपरिक विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (एस.एस.आर.) पर वापस लौट आया। यह वही ‘स्वीकारोक्ति’ है, जिसका मैंने ऊपर उल्लेख किया था। अकेले पश्चिम बंगाल में जिन लोगों के नाम हटाए गए थे, उन्हें सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपील दायर करने की अनुमति दी गई थी। दायर की गई 22,00,000 अपीलों में से लगभग 1,26,000 अपीलों का 6 महीनों में निपटारा किया गया। इनमें से 91-93 प्रतिशत अपीलों को स्वीकार कर लिया गया और उनके नामों को मतदाता सूची में शामिल करने का निर्देश दिया गया, लेकिन वे हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों में मतदान नहीं कर सके। अन्य स्थानों पर हटाए गए करोड़ों नामों (मृतकों को छोड़कर) के पास अपील का कोई प्रावधान नहीं है। जब तक उनके नाम फिर से नामांकित नहीं हो जाते, वे किसी भी चुनाव में मतदान नहीं कर सकते। पुन: नामांकन पूरी तरह से ई.सी.आई. की दया पर निर्भर है।

अधिकारों की लड़ाई : यह कोई साधारण विरोध नहीं है। यह स्वतंत्रता और मतदान के अधिकार की लड़ाई है। अगली लड़ाई भोजन की होगी। खाद्य पदार्थों की कीमतें इतनी बढ़ गई हैं कि भोजन घरेलू बजट की पहुंच से बाहर हो गया है। हालांकि सरकार 80 करोड़ लोगों को 5 किलोग्राम मुफ्त अनाज देती है लेकिन कई करोड़ लोगों, विशेष रूप से आंतरिक प्रवासी मजदूरों, को यह मुफ्त अनाज नहीं मिल पाता। खाद्य कीमतों में वृद्धि की तुलना इस तथ्य से करें कि कुल कार्यबल के 20 प्रतिशत हिस्से वाले अनौपचारिक-दिहाड़ी मजदूरों की वास्तविक मजदूरी या तो स्थिर हो गई है या घट गई है, तो पीड़ा का दायरा स्पष्ट रूप से समझ आ जाएगा। एक और लड़ाई तैयार हो रही है, किफायती ईंधन की। पैट्रोल, डीजल, बिजली, गैस, मिट्टी का तेल, जलाऊ लकड़ी और बस, ट्रेन या हवाई यात्रा, सब कुछ महंगा हो गया है।

थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यू.पी.आई.) का पिछला आंकड़ा 11.39 प्रतिशत था, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सी.पी.आई.) 5.54 प्रतिशत था और खाद्य मुद्रास्फीति 7.74 प्रतिशत थी। ऐसे कई बाहरी कारक हैं, जैसे युद्ध और टैरिफ, जिन्होंने कीमतों में वृद्धि की है। लेकिन सरकार को इसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए। याद रखें, भाजपा ने 2009-2011 (कारण-अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संकट) और 2013-14 (कारण-टेपर टैंट्रम) में मुद्रास्फीति के लिए यू.पी.ए. सरकार को दोषी ठहराया था।

दबाए गए या छीने गए अन्य अधिकारों के लिए लड़ाई जारी रहेगी। मुझे पता है कि ‘तख्तापलट/सत्ता परिवर्तन’ को एक नकारात्मक अर्थ दे दिया गया है। इसे ‘सरकार का बदलाव’ समझें। किसी सरकार को वोट देकर हटाने के लिए शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन आयोजित करने के विपक्षी दलों और नागरिक समाज समूहों के अधिकार पर कोई सवाल नहीं उठा सकता। एच.वी. कामथ (1 दिसम्बर, 1964) और प्रणब मुखर्जी (19 नवम्बर, 2016) ने कहा था कि ‘सरकार का विरोध करना, उसका पर्दाफाश करना और उसे हटाना विपक्ष का कत्र्तव्य है।’ इस अधिकार से कांग्रेस, ‘इंडिया’ गठबंधन, सी.जे.पी., आइसा और अन्य को क्यों वंचित किया जाए? अगले पड़ाव 2027 में उत्तर प्रदेश, पंजाब, गुजरात और 4 अन्य राज्य होंगे।-पी. चिदम्बरम

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