राजनीति

जनसंघ के 75 वर्ष: एक दीपक से कमल तक, राष्ट्रवाद की अखंड यात्रा

21 अक्तूबर 1951 को दिल्ली में एक दीपक जलाया गया था। उस दिन कम लोगों ने सोचा होगा कि इतना छोटा दीया एक दिन पूरे देश की राजनीति को रोशन कर देगा। आज, ठीक 75 वर्ष बाद, वही दीपक कमल बनकर देश के कोने-कोने में खिल रहा है। भारतीय जनता पार्टी आज दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है। केंद्र में लगातार तीसरी बार हमारी सरकार है और देश के अनेक राज्यों में शासन की जिम्मेदारी हमारे कंधों पर है। लेकिन इतने विस्तार और इतनी उपलब्धियों के बीच भी हम अपनी जड़ों को नहीं भूले हैं। भारतीय जनसंघ की हीरक जयंती हमारे लिए केवल स्मरण का अवसर नहीं है। यह गर्व का, आत्मचिंतन का और नए संकल्प का अवसर है।

जनसंघ की स्थापना किसी व्यक्ति की महत्वाकांक्षा से नहीं हुई थी। यह उस बेचैनी से जन्मा था जो आजादी के तुरंत बाद हर राष्ट्रवादी के मन में थी। देश को स्वतंत्र हुए 4 वर्ष ही हुए थे। लाखों लोगों के बलिदान से मिली आजादी के बाद उम्मीद थी कि देश अपनी सभ्यताएं, अपनी परंपरा और अपने स्वाभिमान के आधार पर आगे बढ़ेगा। लेकिन तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने राष्ट्रीय हितों की जगह व्यक्तिगत अहंकार और वैचारिक आयात को प्राथमिकता दी। सीमाओं की सुरक्षा में ढिलाई बरती गई, विभाजन की त्रासदी झेलकर आए शरणार्थियों की पीड़ा अनसुनी की गई और विदेश नीति में भारत को एक कमजोर, झुके हुए देश की तरह पेश किया गया। ऐसे समय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सर संघचालक श्रद्धेय माधव सदाशिव गोलवलकर के परामर्श से और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में भारतीय जनसंघ की नींव रखी गई। उद्देश्य स्पष्ट था: एक ऐसा राजनीतिक दल जो भारतीयों के मन में राष्ट्रवाद की भावना जगाए, देश को स्वावलंबी बनाए और भारत की मूल सांस्कृतिक पहचान को राजनीति के केंद्र में स्थापित करे। विचार के स्तर पर जनसंघ भारत की सनातन सांस्कृतिक चेतना से जुड़ा था और पद्धति के स्तर पर पूर्णत: लोकतांत्रिक था।

डॉ. मुखर्जी का जीवन अपने आप में एक संदेश है। वह नेहरू मंत्रिमंडल में उद्योग मंत्री थे। सत्ता का सुख उनके पास था। लेकिन जब उन्होंने देखा कि धर्मनिरपेक्षता के नाम पर तुष्टीकरण की नीति चलाई जा रही है, पूर्वी पाकिस्तान में हिंदुओं पर अत्याचार हो रहे हैं और इसके बावजूद नेहरू-लियाकत समझौते के जरिए पाकिस्तान को रियायतें दी जा रही हैं, तो उन्होंने अप्रैल 1950 में बिना एक क्षण गंवाए मंत्रिपद त्याग दिया। संसद में अपने इस्तीफे पर वक्तव्य देते हुए उन्होंने पूरे देश के सामने साफ  कहा कि सरकार पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थियों की रक्षा करने में विफल रही है। यह भारतीय राजनीति में सिद्धांत के लिए सत्ता छोडऩे का दुर्लभ उदाहरण था, और यही परंपरा आगे चलकर हमारी पहचान बनी। डॉ. मुखर्जी ने यह भी देखा कि नेहरू सरकार भारत की परिस्थितियों को समझे बिना विदेशी समाजवादी मॉडल थोप रही है, समान नागरिक संहिता जैसे राष्ट्रीय एकता के प्रश्नों से कतरा रही है और जम्मू-कश्मीर के भारत में पूर्ण एकीकरण के प्रति उदासीन है। एक परिवार को संतुष्ट करने के लिए राज्य को विशेष दर्जा दिया जा रहा था। इसके विरुद्ध उन्होंने वह ऐतिहासिक उद्घोष किया जो आज भी हर राष्ट्रवादी के हृदय में गूंजता है: ‘एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे।’ 

पंजाब के लिए यह इतिहास और भी निकट का है। मई 1953 में परमिट व्यवस्था को चुनौती देने के लिए डॉ. मुखर्जी पंजाब की धरती से होकर ही जम्मू-कश्मीर की ओर बढ़े थे। माधोपुर से रावी पार कर लखनपुर पहुंचते ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 23 जून 1953 को हिरासत में ही रहस्यमय परिस्थितियों में उनका बलिदान हो गया। उनकी मृत्यु की निष्पक्ष जांच की मांग को कांग्रेस सरकार ने ठुकरा दिया। लेकिन उनका बलिदान व्यर्थ नहीं गया। 5 अगस्त 2019 को जब अनुच्छेद 370 और 35ए समाप्त हुए, तब हर भाजपा कार्यकत्र्ता ने महसूस किया कि डॉ. मुखर्जी का अधूरा सपना 66 वर्ष बाद पूरा हुआ है। पंजाब और दिल्ली में जनसंघ की प्रारंभिक इकाइयां राष्ट्रीय स्थापना से पहले ही आकार लेने लगी थीं और विभाजन का दर्द झेल चुके पंजाब के लाखों परिवारों ने जनसंघ के राष्ट्रवाद में अपनी आवाज पहचानी।

जनसंघ इसलिए भी विशिष्ट है कि यह देश का पहला विशुद्ध स्वदेशी राजनीतिक विकल्प था। इसकी स्थापना न किसी विदेशी व्यक्ति के हाथों हुई और न इस पर किसी विदेशी विचारधारा की छाया पड़ी। देश जिन समस्याओं से जूझ रहा था, उनका समाधान अपने संसाधनों, अपने सिद्धांतों और अपनी परंपराओं में खोजने का यह पहला संगठित प्रयास था। सांस्कृतिक रूप से अखंड भारत की कल्पना, पाकिस्तान के साथ बराबरी का व्यवहार, राष्ट्रहित पर आधारित स्वतंत्र विदेश नीति, उत्पादन में वृद्धि और उद्योगों का विकेंद्रीकरण, जाति, समुदाय या पंथ से ऊपर उठकर हर नागरिक को समान अधिकार और पिछड़े वर्गों के जीवन-स्तर में सुधार, ये वे मार्गदर्शक सूत्र थे जो उस समय तय किए गए। आज 75 वर्ष बाद भी ये सूत्र हमारे लिए आदर्श हैं और प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में एन.डी.ए. सरकार इन्हीं संकल्पों को एक-एक कर साकार कर रही है।

डॉ. मुखर्जी के बलिदान के बाद जनसंघ के सामने अस्तित्व का संकट था। लेकिन पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने उस संकट को अवसर में बदल दिया। महामंत्री के रूप में उन्होंने देशभर में प्रवास किया, पूर्णकालिक संगठनकत्र्ता तैयार किए, स्थानीय नेतृत्व खड़ा किया और संगठन के समन्वय के लिए टोली बनाने की परंपरा डाली। देखते ही देखते स्थानीय समितियों, मंडलों, जिला इकाइयों और प्रदेश संगठनों का ऐसा ढांचा खड़ा हो गया जिस पर आज भाजपा का विशाल संगठन टिका है। 1965 में विजयवाड़ा अधिवेशन में उनका एकात्म मानवदर्शन पार्टी का मार्गदर्शक दर्शन बना। यह पश्चिम के पूंजीवाद और साम्यवाद, दोनों का भारतीय उत्तर था, जिसमें व्यक्ति, समाज, प्रकृति और राष्ट्र को एक समग्र इकाई के रूप में देखा गया। अंत्योदय का जो विचार उन्होंने दिया, यानी पंक्ति में खड़े अंतिम व्यक्ति का उत्थान, वही आज उज्ज्वला, जनधन, आयुष्मान भारत और प्रधानमंत्री आवास योजना की आत्मा है। लेकिन जब दोहरी सदस्यता के नाम पर हमारी वैचारिक निष्ठा पर सवाल उठाए गए, तो हमने विचारधारा से समझौता करने की बजाय नया रास्ता चुना। 6 अप्रैल 1980 को भारतीय जनता पार्टी का जन्म हुआ। मुंबई के पहले राष्ट्रीय अधिवेशन में श्रद्धेय अटल जी ने कहा था:‘अंधेरा छंटेगा, सूरज निकलेगा, कमल खिलेगा।’ आज वह भविष्यवाणी इतिहास बन चुकी है।

हम सभी भाजपा कार्यकत्र्ता सौभाग्यशाली हैं कि हमें इतनी गौरवशाली विरासत मिली है। हमारे पूर्वजों ने त्याग, तपस्या और बलिदान से जो दीपक जलाया था, उसकी लौ आज भी हमारा मार्ग रोशन कर रही है। लक्ष्य स्पष्ट है: 2047 तक विकसित भारत। रास्ता भी स्पष्ट है, जो हमारे शिखर पुरुष दिखा गए हैं। जनसंघ की हीरक जयंती पर आइए, हम सब संकल्प लें कि राष्ट्र प्रथम का यह मंत्र हमारे हर विचार, हर कर्म और हर निर्णय की कसौटी बना रहेगा। यही डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी और उन असंख्य अनाम कार्यकत्र्ताओं को हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी, जिन्होंने इस यात्रा को अपने पसीने और अपने रक्त से सींचा।-तरुण चुघ

Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button