युवा शक्ति ही साकार करेगी विकसित भारत का सपना

सभी विद्यार्थियों से एक जैसी उपलब्धियों की अपेक्षा करना उचित नहीं है। किसी की रुचि विज्ञान में हो सकती है, तो कोई साहित्य, संगीत, खेल, कला या उद्यमिता में बेहतर प्रदर्शन कर सकता है। विद्यार्थियों की तुलना दूसरों से नहीं होनी चाहिए…
विद्यार्थी किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी होते हैं। उनकी आंखों में पलने वाले सपने, मन में उठने वाले विचार और कर्म में दिखाई देने वाला संकल्प ही देश के भविष्य की दिशा निर्धारित करता है। आज के विद्यार्थी ही कल के वैज्ञानिक, शिक्षक, चिकित्सक, प्रशासक, उद्यमी, सैनिक और राष्ट्रनिर्माता हैं। इसलिए विद्यार्थियों की प्रतिभा को निखारना, उन्हें सही दिशा देना और उनके भीतर आत्मविश्वास पैदा करना केवल परिवार या शिक्षण संस्थानों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज का दायित्व है। इसी संदर्भ में विश्व विद्यार्थी दिवस का महत्व और भी बढ़ जाता है। भारत में 15 अक्तूबर को पूर्व राष्ट्रपति, महान वैज्ञानिक और युवाओं के प्रेरणास्रोत डा. एपीजे अब्दुल कलाम की जयंती के अवसर पर विश्व विद्यार्थी दिवस मनाया जाता है। इस दिवस का उद्देश्य विद्यार्थियों के जीवन में शिक्षा, ज्ञान, अनुशासन, रचनात्मकता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के महत्व को रेखांकित करना है। डा. कलाम का संपूर्ण जीवन इस बात का प्रमाण है कि साधारण परिस्थितियों में जन्म लेने वाला व्यक्ति भी असाधारण उपलब्धियां प्राप्त कर सकता है, बशर्ते उसके पास बड़े सपने देखने का साहस और उन्हें साकार करने के लिए निरंतर परिश्रम करने का संकल्प हो।
डा. कलाम का जीवन विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा : डा. कलाम का जीवन संघर्ष, सादगी, अनुशासन और समर्पण की अनुपम मिसाल है। तमिलनाडु के रामेश्वरम में एक साधारण परिवार में जन्मे कलाम ने कठिन परिस्थितियों के बावजूद शिक्षा के प्रति अपनी लगन को कभी कम नहीं होने दिया। अपनी वैज्ञानिक उपलब्धियों के माध्यम से उन्होंने भारत के अंतरिक्ष और रक्षा कार्यक्रमों में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वर्ष 2002 में वह भारत के राष्ट्रपति बने, लेकिन सर्वोच्च संवैधानिक पद पर पहुंचने के बाद भी उनका सबसे प्रिय परिचय एक शिक्षक का ही रहा। डा. कलाम का विश्वास था कि बच्चों और युवाओं के भीतर देश को बदलने की क्षमता है। वह विद्यार्थियों से संवाद करते, उनके प्रश्नों को प्रोत्साहित करते और उन्हें बड़े लक्ष्य निर्धारित करने की प्रेरणा देते थे। उनका जीवन संदेश देता है कि सफलता केवल संसाधनों की प्रचुरता से नहीं, बल्कि दृढ़ इच्छाशक्ति, निरंतर अभ्यास और सकारात्मक सोच से प्राप्त होती है। आज जब विद्यार्थी परीक्षा, प्रतिस्पर्धा और भविष्य की अनिश्चितताओं के दबाव से गुजर रहे हैं, तब कलाम के विचार पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं। विद्यार्थियों को यह समझना होगा कि असफलता जीवन का अंत नहीं, बल्कि अपनी कमियों को पहचानकर आगे बढऩे का अवसर है। शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री प्राप्त करना नहीं, वर्तमान समय में शिक्षा को अक्सर परीक्षा में प्राप्त अंकों, डिग्रियों और नौकरी हासिल करने के साधन के रूप में देखा जाता है। निस्संदेह, रोजगार प्राप्त करना शिक्षा का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य है, लेकिन शिक्षा का वास्तविक लक्ष्य इससे कहीं व्यापक है। शिक्षा व्यक्ति को विवेकशील बनाती है, सही और गलत के बीच अंतर करना सिखाती है तथा समाज के प्रति उसकी जिम्मेदारियों का बोध कराती है। यदि कोई विद्यार्थी उच्च अंक प्राप्त कर ले, लेकिन उसमें ईमानदारी, संवेदनशीलता, अनुशासन और सामाजिक जिम्मेदारी का अभाव हो, तो उसकी शिक्षा अधूरी मानी जाएगी। शिक्षण संस्थानों का उद्देश्य केवल सफल पेशेवर तैयार करना नहीं, बल्कि अच्छे नागरिकों का निर्माण करना भी होना चाहिए। आज आवश्यकता ऐसी शिक्षा व्यवस्था की है, जिसमें किताबी ज्ञान के साथ व्यावहारिक अनुभव, नैतिक मूल्य, संवाद कौशल, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और समस्या समाधान की क्षमता को भी समान महत्व मिले। विद्यार्थियों को प्रश्न पूछने, नए विचार प्रस्तुत करने और अपनी गलतियों से सीखने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। प्रश्न करने वाला विद्यार्थी ही आगे चलकर अनुसंधानकर्ता और नवाचारक बन सकता है।
डिजिटल युग में विद्यार्थी और नई चुनौतियां : इक्कीसवीं सदी का विद्यार्थी ऐसे दौर में शिक्षा प्राप्त कर रहा है, जहां मोबाइल फोन, इंटरनेट, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल माध्यमों ने ज्ञान तक पहुंच को आसान बना दिया है। आज घर बैठे दुनिया के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों की अध्ययन सामग्री प्राप्त की जा सकती है। ऑनलाइन कक्षाओं और डिजिटल पुस्तकालयों ने सीखने के नए अवसर उपलब्ध कराए हैं। लेकिन इन सुविधाओं के साथ कुछ गंभीर चुनौतियां भी सामने आई हैं। सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग, मोबाइल पर अनावश्यक समय बिताना, गलत सूचनाओं का प्रसार और डिजिटल मनोरंजन की लत विद्यार्थियों की एकाग्रता को प्रभावित कर सकती है। कई विद्यार्थी दूसरों की उपलब्धियों से अपनी तुलना करके तनाव का अनुभव करते हैं और अपने आत्मविश्वास को कमजोर कर लेते हैं। तकनीक अपने आप में न अच्छी है और न बुरी, उसका उपयोग किस उद्देश्य से किया जा रहा है, यह अधिक महत्वपूर्ण है। विद्यार्थियों को डिजिटल साधनों का इस्तेमाल ज्ञान अर्जित करने, नई क्षमताएं विकसित करने और रचनात्मक कार्यों के लिए करना चाहिए। उन्हें यह भी सीखना होगा कि इंटरनेट पर उपलब्ध प्रत्येक जानकारी सत्य नहीं होती। तथ्यों की जांच करना, विश्वसनीय स्रोतों को पहचानना और अपनी स्वतंत्र सोच विकसित करना आज की अनिवार्य आवश्यकताएं हैं।
मानसिक स्वास्थ्य और परीक्षा का दबाव : विद्यार्थियों के सामने आज सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक मानसिक दबाव भी है। अच्छे अंक प्राप्त करने, प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल होने और मनचाहा करियर चुनने की दौड़ में कई विद्यार्थी तनाव का सामना करते हैं। कुछ मामलों में अभिभावकों की अत्यधिक अपेक्षाएं और समाज में सफलता की सीमित परिभाषा इस दबाव को और बढ़ा देती है। यह समझना जरूरी है कि प्रत्येक विद्यार्थी की रुचि, क्षमता और सीखने की गति अलग होती है। सभी विद्यार्थियों से एक जैसी उपलब्धियों की अपेक्षा करना उचित नहीं है। किसी की रुचि विज्ञान में हो सकती है, तो कोई साहित्य, संगीत, खेल, कला या उद्यमिता में बेहतर प्रदर्शन कर सकता है। अभिभावकों और शिक्षकों को विद्यार्थियों की तुलना दूसरों से करने के बजाय उनकी व्यक्तिगत प्रगति पर ध्यान देना चाहिए। बहरहाल, विकसित भारत का सपना युवा पीढ़ी ही साकार करेगी।-प्रो. मनोज डोगरा



