मिथुन और गोविंदा का वो दौर जब जूता मतलब Bata था, विदेशी ब्रांड जो बन गया भारत का देसी आइकन

नई दिल्ली: ज्यादातर भारतीयों के मन में रचा-बसा बाटा असल में एक विदेशी ब्रांड है। इसकी शुरुआत 1894 में चेकोस्लोवाकिया में टोमास बाटा ने की थी। भारत में औपनिवेशिक काल के दौरान 1930 के दशक में इसने कदम रखा था। ऐसा करते हुए बाटा ने देश के संगठित फुटवियर बाजार की नींव रखी। साथ ही कोलकाता के पास ‘बाटानगर’ जैसी पूरी औद्योगिक बस्ती बसाकर भारतीय संस्कृति और मध्यम वर्ग के दिलों में खुद को ‘देसी’ पहचान के रूप में स्थापित कर लिया। 80-90 के दशक में तो जूता मतलब बाटा बन गया था। आइए, यहां इस ब्रांड के सफर के बारे में जानते हैं।
1894 में चेकोस्लोवाकिया से शुरू हुए बाटा ने जब 1920-30 के दशक में भारत में प्रवेश किया तब देश में फुटवियर का संगठित ढांचा नहीं था। जापानी आयात का दबदबा था। टोमास बाटा ने आम भारतीयों को किफायती और गुणवत्तापूर्ण जूते देने के मकसद से कोलकाता के पास अपनी पहली प्रोडक्शन यूनिट लगाई। बाटा ने स्थानीय जलवायु और भारतीय पैरों की बनावट के अनुकूल प्रोडक्ट बनाकर देश में औद्योगिक स्तर के जूतों का स्टैंडर्डाइजेशन किया। समय के साथ स्कूल और ऑफिस शूज से आगे बढ़कर कंपनी ने स्नीकर्स, एथलीजर और ‘हश पपीज’ और ‘पावर’ जैसे प्रीमियम सब-ब्रांड्स पेश कर अपने पोर्टफोलियो को विविधता दी।
बाटा की सबसे बड़ी ताकत उसकी बेजोड़ डिस्ट्रीब्यूशन स्ट्रैटेजी और सटीक प्राइसिंग रही है। कंपनी ने हर वर्ग के लिए एंट्री लेवल से लेकर प्रीमियम कैटेगरी तक की कीमतें रखीं। इससे उपभोक्ता बचपन से बड़े होने तक तक ब्रांड से जुड़ा रहता है। 1,500 से अधिक एक्सक्लूसिव स्टोर्स, मजबूत रिटेल नेटवर्क और हालिया ई-कॉमर्स इंटीग्रेशन के कारण यह भारत का सबसे बड़ा फुटवियर नेटवर्क बना हुआ है।
प्रतिस्पर्धा के मोर्चे पर बाटा ने घरेलू ब्रांड्स (जैसे रिलैक्सो, खादिम्स) और नाइके, एडिडास जैसे वैश्विक स्पोर्ट्स ब्रांड्स की चुनौतियों का डटकर मुकाबला किया है। ब्रांड पर लगे ‘पुराने ढर्रे’ के ठप्पे को हटाने के लिए कंपनी ने दिशा पटानी और कृति सैनन जैसे युवा एंबेसडरों के साथ फैशन-फोकस्ड कैंपेन की शुरुआत की। इसके अलावा, ऑनलाइन डिस्काउंटिंग और महामारी जैसी चुनौतियों का सामना करने के लिए बाटा ने अपने रिटेल फॉर्मेट और डिजिटल डिलीवरी चैनलों को तेजी से आधुनिक बनाया है।
भारत में बाटा का जुड़ाव सांस्कृतिक और भावनात्मक है। 80-90 के दशक में बड़े हुए भारतीयों के लिए ‘टेनिस/स्कूल शू’ का मतलब ही बाटा था। यह वही दौर था जब सिनेमा जगत में मिथुन चक्रवर्ती और गोविंदा छाए हुए थे। भारी बदलावों की जगह लगातार और धीरे-धीरे सुधार की रणनीति अपनाकर बाटा ने 90 से अधिक सालों से भारत में अपनी प्रासंगिकता बरकरार रखी है। यह सफर साबित करता है कि उपभोक्ता की जरूरतों की गहरी समझ, भरोसेमंद उत्पाद और व्यापक पहुंच के दम पर कोई भी ब्रांड किसी देश के जनजीवन का अभिन्न अंग बन सकता है।



