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न्यायिक नियुक्तियों में पारदर्शिता की आवश्यकता

सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश संजय किशन कौल, जिन्होंने चार वर्षों तक भारत के मुख्य न्यायाधीश के बाद शीर्ष अदालत के सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश के रूप में सेवा दी, का आगामी संस्मरण न्यायाधीशों की नियुक्ति से जुड़ी कॉलेजियम प्रणाली के कामकाज पर कई परेशान करने वाले सवाल खड़े करता है। ‘विदाऊट फियर एंड फेवर’ शीर्षक वाला यह संस्मरण अभी प्रकाशित होना बाकी है, लेकिन जस्टिस कौल ने कई साक्षात्कारों में कॉलेजियम प्रणाली से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला है। उन्होंने यह संकेत देकर इस प्रणाली की विश्वसनीयता
पर सवाल उठाने का प्रयास किया है कि इसके विचार-विमर्श को संचालित करने के लिए पर्याप्त रूप से सुसंगत और पारदर्शी प्रक्रिया का अभाव है। उन्होंने एक ऐसे प्रसंग का भी उल्लेख किया जिसमें एक संभावित न्यायाधीश की जाति-समुदाय पर चर्चा की गई थी।

अपने साक्षात्कारों में उन्होंने विशेष रूप से न्यायिक नियुक्तियों को लेकर भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ के दृष्टिकोण को निशाने पर लिया है और इस बात पर बल दिया है कि न्यायपालिका में सरकार के हस्तक्षेप का दृढ़ता से विरोध करने का साहस होना चाहिए।
जस्टिस चंद्रचूड़ की बौद्धिक गहराई और ऐसी क्षमता की सराहना करते हुए भी, उन्होंने आरोप लगाया कि पूर्व सी.जे.आई. ‘सरकार के प्रति अत्यधिक संवेदनशील विनम्र थे और ‘उनसे अपेक्षाएं कहीं अधिक थीं।’ उन्होंने एक घटना का हवाला दिया जिसमें जस्टिस चंद्रचूड़ सर्वोच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश की नियुक्ति के पक्ष में थे, लेकिन वे उस विशेष व्यक्ति की नियुक्ति पर सरकार का रुख भी जानना चाहते थे। जस्टिस कौल ने कहा कि उनका मानना था कि सरकार के साथ व्यवहार में, विशेषकर न्यायिक नियुक्तियों के मामले में, ‘उन्हें और अधिक दृढ़ होना चाहिए था।’

एक साक्षात्कार में जस्टिस कौल ने कहा कि सरकारें उन्हीं मुख्य न्यायाधीशों का सम्मान करती हैं जो कड़ा रुख अपनाते हैं, और ऐसा होना भी चाहिए। उन्होंने यह दावा भी किया कि उन्होंने विरोध स्वरूप कॉलेजियम की एक बैठक से वॉकआऊट (बहिर्गमन) किया था, हालांकि जस्टिस चंद्रचूड़ ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि उन्हें ऐसे किसी वॉकआऊट की याद नहीं है और कॉलेजियम के सदस्यों द्वारा सभी निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए थे। सर्वोच्च न्यायालय के एक अन्य पूर्व न्यायाधीश ने यह भी इंगित किया कि जस्टिस चंद्रचूड़ ने एक धार्मिक अनुष्ठान के लिए प्रधानमंत्री को अपने आवास पर आमंत्रित करके एक अन्य अलिखित नियम को तोड़ा था।यद्यपि संस्मरण प्रकाशित होने के बाद उच्च न्यायपालिका के कामकाज के बारे में और अधिक विवरण सामने आएंगे, लेकिन यह स्पष्ट है कि सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित मानदंडों और प्रक्रियाओं में पारदर्शिता की भारी कमी है। यह भी एक वास्तविकता है कि सभी मुख्य न्यायाधीशों का दृष्टिकोण एक जैसा नहीं होता, और यह सर्वविदित है कि रंजन गोगोई जैसे कुछ पूर्व मुख्य न्यायाधीशों ने किस प्रकार अपने गरिमामय पद की साख को बट्टा लगाया है।

कॉलेजियम प्रणाली को कार्यपालिका के हस्तक्षेप से न्यायिक नियुक्तियों को सुरक्षित रखने के लिए विकसित किया गया था। किंतु सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अपने उत्तराधिकारियों के चयन में न्यायाधीशों को प्रधानता दिए जाने के तीन दशक बाद भी यह व्यवस्था अपारदर्शिता, असंगत प्रक्रियाओं और मुख्य न्यायाधीश के हाथों में शक्तियों के संकेंद्रण की शिकार बनी हुई है। जस्टिस कौल इस टकराव के एक बड़े हिस्से की जड़ राजनीतिक प्रतिष्ठान के उस असंतोष को मानते हैं, जो राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एन.जे.ए.सी.) को खारिज करने वाले 2015 के फैसले के बाद से बना हुआ है। उस कानून के तहत नियुक्तियों में कार्यपालिका और प्रबुद्ध नागरिकों को एक औपचारिक भूमिका देने का प्रयास किया गया था। उस फैसले ने न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए न्यायिक प्रधानता को तो बरकरार रखा, लेकिन साथ ही न्यायपालिका के जिम्मे ही उस व्यवस्था की कमियों को दूर करने का कार्य भी छोड़ दिया, जिसकी खामियों को अदालत ने स्वयं स्वीकार किया था।

यह संस्मरण यह भी दर्शाता है कि यह पूरी प्रक्रिया सी.जे.आई. के व्यक्तिगत दृष्टिकोण पर कितनी अधिक निर्भर हो सकती है। किंतु मुख्य मुद्दा केवल यह नहीं है कि एक सी.जे.आई. दूसरे की तुलना में अधिक मुखर या दृढ़ था अथवा नहीं, मुख्य समस्या यह है कि संवैधानिक अदालतों के लिए न्यायाधीशों का चयन करने वाली संस्था के पास अपने विचार-विमर्श को नियमित करने के लिए पर्याप्त रूप से सुसंगत और पारदर्शी प्रक्रिया ही मौजूद नहीं है। जस्टिस कौल की टिप्पणियां कॉलेजियम प्रणाली में स्पष्ट सुधारों की मांग करती हैं, लेकिन सुधार लाने का अर्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति का अधिकार सरकार को सौंपना या एन.जे.ए.सी. को उसी पुराने स्वरूप में पुनर्जीवित करना नहीं है, जिसे रद्द कर दिया गया था। सुधार का वास्तविक अर्थ यह होना चाहिए कि सार्वजनिक रूप से घोषित पात्रता मानदंड, प्रलेखित मूल्यांकन (दस्तावेजी समीक्षा), सुसंगत व तर्कसंगत प्रस्ताव, तबादलों की एक स्पष्ट रूपरेखा और एक पारदर्शी शिकायत निवारण तंत्र के माध्यम से अधिक पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए। कॉलेजियम की विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह इन सुरक्षा उपायों को संस्थागत रूप देने में कितनी सक्षम है। फिर भी, न्यायिक नियुक्तियों में कार्यपालिका को अधिक शक्ति या प्रभाव सौंपने के किसी भी कदम का पुरजोर विरोध किया जाना चाहिए, क्योंकि इससे उस संस्था की साख को गंभीर चोट पहुंच सकती है, जिसका समाज में आज भी अत्यधिक सम्मान है।-विपिन पब्बी

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