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तेरह करोड़ का शोर,अब तो सिर्फ सियासत ही बची

तेरह करोड़ मतदाताओं के नाम काट दिए गए! लोकतंत्र खतरे में है! वोट चोरी हो रही है! चुनाव आयोग निष्पक्ष नहीं है! पिछले कुछ समय से विपक्ष इन्हीं आरोपों के सहारे राजनीतिक वातावरण बनाने की कोशिश कर रहा है। संसद से सड़क तक शोर मचाया गया। संवैधानिक संस्थाओं को कठघरे में खड़ा किया गया। लेकिन एक सवाल अनुत्तरित रहा। यदि 13 करोड़ मतदाताओं के अधिकार छीन लिए गए, तो उनके समर्थन में जनसैलाब कहां था?

उधर राहुल गांधी ने इसी मामले पर 1 नवम्बर को रामलीला मैदान में रैली का आह्वान किया है। विपक्ष ने एस.आई.आर. के दौरान लगभग 13 करोड़ प्रविष्टियों के मसौदा सूची से बाहर होने को राजनीतिक मुद्दा बनाया। संख्या बड़ी है। निष्पक्ष जांच और हर पात्र मतदाता के अधिकार की रक्षा आवश्यक है। लेकिन मृत मतदाताओं के नाम हटाना, दोहरी प्रविष्टियां समाप्त करना, स्थानांतरित मतदाताओं की जानकारी दुरुस्त करना और किसी वास्तविक मतदाता को गलत तरीके से बाहर कर देना एक जैसी स्थितियां नहीं हैं। विपक्ष को बताना चाहिए कि इनमें कितने पात्र मतदाता गलत तरीके से बाहर हुए। शिकायतों पर क्या कार्रवाई हुई? आंकड़ा उछालना आसान है, मताधिकार छिन जाने का प्रमाण देना कहीं अधिक कठिन। लोकतंत्र आरोपों से नहीं, तथ्यों से चलता है।

सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा-एकतरफा फैसलों के आरोप को चुनौती : 26 अक्तूबर का घटनाक्रम अत्यंत महत्वपूर्ण है। चुनाव आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय में हलफनामा दाखिल करके स्पष्ट किया है कि एस.आई.आर. के तीनों प्रमुख आदेश सर्वसम्मति से पारित किए गए थे। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी, तीनों इन निर्णयों में सहभागी थे। आयोग के अनुसार फाइलों पर दर्ज टिप्पणियां और सुझाव अंतिम निर्णय नहीं होते। आयोग ने माना कि दोनों आयुक्तों ने कार्य-विभाजन के एक आदेश पर आपत्ति दर्ज कराई थी लेकिन वह आदेश लागू ही नहीं हुआ। अर्थात आंतरिक प्रशासनिक मतभेद और एस.आई.आर. के अंतिम आदेशों की सर्वसम्मति दो अलग विषय हैं। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि फॉर्म-6 में कोई संशोधन नहीं किया गया। हालांकि हलफनामा न्यायालय का अंतिम निर्णय नहीं है लेकिन इससे राजनीतिक दृष्टि से विपक्ष की चुनौती बढ़ गई है। यदि तीनों आयुक्त सहमत थे, तो एकतरफा फैसलों का आरोप किन प्रमाणों पर आधारित है? राहुल गांधी और उनके सहयोगियों को इसका उत्तर देना होगा।

मतदाता अधिकार या संस्थाओं के प्रति अविश्वास : यदि वास्तविक मतदाताओं के नाम गलत हटे हैं, तो उन्हें जोडऩे का अभियान चलना चाहिए। लेकिन यदि मतदाता अधिकारों के नाम पर पूरी चुनाव प्रक्रिया ही संदिग्ध दिखने लगे, तो परिणाम दूरगामी होंगे। लोकतंत्र केवल चुनाव कराने से नहीं चलता। वह प्रक्रिया के प्रति सार्वजनिक विश्वास पर भी टिका होता है। यह विश्वास अंधस्वीकृति से नहीं, पारदर्शिता और जवाबदेही से बनता है। अब आते हैं राहुल गांधी की पहली नवम्बर की प्रस्तावित रैली पर। राहुल गांधी ने किसानों, मजदूरों, युवाओं, महिलाओं, विद्याॢथयों और व्यापारियों से रैली में शामिल होने की अपील की है। कांग्रेस और सहयोगी दल इसे मतदाता अधिकारों की रक्षा का अभियान बता रहे हैं। लेकिन इस रैली की सफलता केवल भीड़ से नहीं मापी जाएगी। महत्वपूर्ण यह होगा कि विपक्ष कितने वास्तविक प्रभावित मतदाताओं के मामले सामने रखता है और कितने आरोप दस्तावेजों से पुष्ट करता है। उधर भाजपा ने सड़क पर उतरने की रणनीति बनाई है। रिपोर्टों के अनुसार देशव्यापी पदयात्राओं की रूपरेखा तैयार है। अभियान का नाम ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ है।

संवैधानिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा किसी दल की बपौती नहीं : दरअसल चुनाव आयोग संविधान के अंतर्गत स्थापित स्वतंत्र संस्था है। उसके निर्णयों पर सवाल उठाए जा सकते हैं, न्यायालय जाया जा सकता है लेकिन आरोप प्रमाणों पर आधारित हों। उसी तरह आयोग की जिम्मेदारी है कि वह हर गंभीर शिकायत का जवाब दे और निर्णय प्रक्रिया को पारदर्शी रखे। न्यायिक विवाद का फैसला न्यायालय को ही करने देना चाहिए।

लोकतंत्र में अविश्वास की राजनीति कितनी दूर जाएगी : भारत ने अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं। कांग्रेस की सरकारें बनीं और गईं। भाजपा विपक्ष में रही, फिर सत्ता में आई। यही लोकतंत्र की विशेषता है। लेकिन यदि हर पराजय के बाद चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर व्यापक आरोप लगें, तो जनविश्वास प्रभावित हो सकता है। इसका अर्थ अनियमितताओं को नजरअंदाज करना नहीं है, बल्कि प्रत्येक वास्तविक अनियमितता की जांच और दोषियों पर कार्रवाई हो। आंदोलन की नैतिक शक्ति उसके आरोपों की गंभीरता, प्रमाणों की विश्वसनीयता और जनता के विश्वास से बनती है।लेकिन सबसे महत्वपूर्ण वह सामान्य मतदाता है, जिसके नाम पर यह लड़ाई लड़ी जा रही है। उसका नाम सूची में सुरक्षित रहे। उसकी शिकायत का समाधान हो। और किसी दल को उसके अधिकारों के नाम पर तथ्यहीन दावे करने की छूट न मिले। तेरह करोड़ का शोर बहुत बड़ा है लेकिन उससे भी बड़ा सवाल है-क्या विपक्ष मतदाता अधिकारों की लड़ाई लड़ रहा है, या संवैधानिक संस्थाओं के प्रति अविश्वास को सत्ता तक पहुंचने का रास्ता बनाना चाहता है?इसका उत्तर नारों में नहीं, तथ्यों में मिलेगा। क्योंकि लोकतंत्र में सत्ता का रास्ता जनता के विश्वास से निकलता है, संस्थाओं के प्रति अविश्वास से नहीं।-के.के. उपाध्याय

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