संपादकीय

क्यों उबल रही जेन जी?

आजकल चारों तरफ जेन-जी की ऐसी धूम मची है मानो यही एकमात्र राष्ट्रीय मुद्दा और मसला हो! टीवी चैनलों पर लगातार कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं, राजनीतिक प्रवक्ताओं की बहस कराई जा रही है, युवा चेहरे ‘गोलमेज सम्मेलन’ की तर्ज पर अपने पक्ष रख रहे हैं, नतीजतन प्रख्यात गायक तथा थिएटर-हस्ती पीयूष मिश्रा ने रांची पहुंच कर सत्याग्रही युवाओं से संवाद किया। उन्हें ‘आरंभ, प्रचंड’ वाला गीत सुना कर नई हिम्मत, नया हौसला देने की कोशिश की। जेन-जी आंदोलित हो रही है, लिहाजा देश के विभिन्न हिस्सों में परिदृश्य बदल रहे हैं। देहरादून में दिव्यांग छात्रों ने, जयपुर के एक स्कूल में ‘मूक-बधिर’ छात्राओं ने, बिहार के मुजफ्फरपुर समेत दिल्ली, केरलम, कर्नाटक, पंजाब आदि राज्यों में छात्रों, युवाओं के विरोध-प्रदर्शनों ने एक नया उबाल पैदा कर दिया है। यह देश की जेन जी है, जिसकी संख्या 37-40 करोड़ बताई जा रही है। इनमें करीब 27 करोड़, 25 फीसदी से अधिक, मतदाता हैं, जिनकी संख्या 2029 के लोकसभा चुनाव तक बढ़ सकती है। 2027 में उप्र, गुजरात समेत सात राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। वहां करीब 22 फीसदी जेन जी हैं। यदि 5 फीसदी वोट ही इधर-उधर हो गए, तो सत्ता के तमाम समीकरण असंतुलित हो जाएंगे। जेन जी के इन तमाम विरोध-प्रदर्शनों में ‘कॉकरोच’ अनुपस्थित रहे हैं, लेकिन सी-वोटर के एक सर्वेक्षण में ‘प्रमुख कॉकरोच’ अभिजीत दिपके को ‘नेता’ के तौर पर 12 फीसदी से अधिक लोगों ने पसंद किया। बेशक सर्वे का सैंपल साइज सीमित हो, लेकिन यह जनमत भी महत्वपूर्ण है, जबकि दिपके का जेन जी में योगदान ‘राजनीतिक-सा’ रहा है। अभी उन्हें खुद को जेन जी का प्रतिनिधि चेहरा साबित करना है। सर्वे की इस पसंद की थाह और वजह हम नहीं जानते। बहरहाल जेन जी की प्रासंगिकता के कारण ही प्रधानमंत्री मोदी ने आईआईटी दिल्ली के 3036 ‘नव स्नातकों’ को संबोधित किया, उन्हें ‘गुरु मंत्र’ की तरह उपदेश दिया और जेन जी को ताकत मानते हुए उनमें ‘भरोसा’ जताया। जेन जी देश की ताकत और भविष्य हैं।

वे सवाल भी करें, लेकिन समाधान भी खोजें। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने प्रयागराज में अपना ‘छात्रों की गूंज’ अभियान जारी रखा, लेकिन समझ नहीं आया कि वोट चोरी, नोटबंदी, जीएसटी, अदाणी आदि जेन जी के मसले हैं अथवा शिक्षा-सुधार, व्यवस्था-परिवर्तन, पेपरलीक, भर्तियों की खरीद-फरोख्त जेन जी के बुनियादी सरोकार और उनकी चिंताएं हैं? बहरहाल जेन जी उबल रही है। उसमें आक्रोश, नाराजगी, गुस्सा, उपेक्षा और वंचित होने के भाव हैं, तो उनके भी भयावह और बुनियादी कारण हैं। मसलन-बीते एक दशक के दौरान करीब 1.02 लाख सरकारी स्कूल बंद हुए हैं। करीब 1.04 लाख स्कूलों में एक ही अध्यापक है, जो छात्रों को सभी विषय पढ़ाता है। दुनिया का एक और आश्चर्य…! सरकारी स्कूलों में औसतन 5.1 शिक्षक हैं, जबकि निजी स्कूलों में यह औसत 11.1 है। सरकारी स्कूलों में इतने पद खाली हैं, यदि उन्हें भर लिया जाए, तो बेरोजगारी एकदम नीचे आ जाएगी। करीब 33 लाख छात्र इन एक-अध्यापकीय स्कूलों में पंजीकृत हैं। ऐसे पंजीकरण को ही साक्षरता दर माना जाता रहा है, लिहाजा राष्ट्रीय दर शानदार लगती है। यथार्थ तो बेहद काला और कुरूप है। इन स्कूलों में छात्र पढऩे जाते हैं अथवा नहीं, इसका कोई डाटा उपलब्ध नहीं है, लेकिन एक भयावह तथ्य जरूर है कि देश में करीब 48 फीसदी छात्र 12वीं कक्षा तक अपनी पढ़ाई जारी नहीं रख पाते। देश में 69,673 सरकारी स्कूलों में लडक़ों के लिए शौचालय नहीं हैं और 46,345 स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय की सुविधाएं नहीं हैं। लाइब्रेरी से वंचित 55083 स्कूल हैं, जबकि 4.08 लाख सरकारी स्कूलों में कम्प्यूटर की पूरी सुविधाएं नहीं हैं। विडंबना है कि करीब 48 फीसदी छात्र सरकारी स्कूलों में ही पढ़ाई कर पाते हैं, क्योंकि उनके परिवार गरीब, निम्न दर्जे के हैं, निजी स्कूल के खर्चे वहन करने में असमर्थ हैं। ये जेन जी बनेंगे, तो उन्हें पर्याप्त रोजगार कैसे मिलेगा अथवा वे प्रतियोगी परीक्षाएं कैसे पास करेंगे? ऐसे असंख्य आंकड़े और डाटा हैं। हम ऐसे नकारात्मक पक्ष को पेश करने के पक्षधर नहीं हैं, लेकिन यही यथार्थ है, जो जेन जी को पैदा कर रहा है। प्रधानमंत्री मोदी कई बार गिनवाते रहे हैं कि सरकार ने कितने स्कूल, कॉलेज खोले, लेकिन हम विश्व के शीर्ष 100 संस्थानों में भी शामिल नहीं हैं। यही हमारी शिक्षा-नीति है। कहने का तात्पर्य यह भी है कि हमारी शिक्षा गुणवत्ता की दृष्टि से ऊंचाई को नहीं छू पाई है। नई शिक्षा नीति जरूर बनाई गई है, लेकिन कार्यान्वयन के स्तर पर अभी हम उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल नहीं कर पाए हैं। एक कारण यह भी है जिसके चलते जेन जी में आक्रोश देखा जा रहा है। युवाओं की मांगों को संबोधित करना सरकार के लिए लाजिमी है। तभी भारत सच्चे अर्थों में विकसित राष्ट्र बन पाएगा।

Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button