ईरान पर ‘परमाणु हमला’

नौवीं बार संभावनाएं जताई जा रही हैं कि अमरीका ईरान पर ‘परमाणु हमला’ कर सकता है! राष्ट्रपति टं्रप इजरायल के कार्यवाहक प्रधानमंत्री नेतन्याहू के लगातार दबाव में हैं कि परमाणु हमले से ही ‘ईरान समस्या’ का कोई समाधान मिल सकता है। यदि ईरान पर परमाणु हमला किया गया, तो उसके बाद तीसरे विश्व युद्ध की स्थितियां ‘चरम’ पर होंगी। रूस, उत्तरी कोरिया, चीन और भारत भविष्य के विनाशकारी युद्ध में शामिल होने को बाध्य होंगे! लेकिन राष्ट्रपति टं्रप ईरान युद्ध के 8 लंबे महीनों के बाद भी दोहरी जुबान बोल रहे हैं कि ईरान के साथ ‘डील’ की बातचीत अच्छी चल रही है। वह युद्ध नहीं चाहते, लेकिन फिर यह भी बयान देते हैं कि हम ईरान का अस्तित्व खत्म कर देंगे। अमरीका में मध्यावधि चुनाव सम्पन्न हो चुके हैं, लिहाजा अब राष्ट्रपति टं्रप के लिए दोनों ही विकल्प खुले हैं कि ईरान पर एक बार फिर युद्ध थोपा जाए अथवा समझौते की संभावनाओं को पुख्ता किया जाए। इसी दौरान अमरीका के वरिष्ठ पत्रकार और कभी राष्ट्रपति टं्रप के बेहद करीब रहे टकर कार्लसन ने ‘एक्स’ प्लेटफॉर्म पर पोस्ट लिखी है कि अमरीका कुछ ही दिनों में ईरान के नतांज परमाणु केंद्र के करीब ‘पिकएक्स पहाडिय़ों’ पर परमाणु हमला कर सकता है। इस बार ‘बी 61-11’ बॉम्बर्स के जरिए ‘बंकरफोड़ू’ बमबारी की जा सकती है या मिसाइलों से हमला किया जा सकता है! अमरीका पहले भी ईरान के परमाणु केंद्रों की पहाडिय़ों पर हमले कर चुका है, लेकिन इस बार ‘परमाणु सम्मत हथियारों’ से हमले की संभावनाएं जताई जा रही हैं। दिलचस्प यह है कि उपराष्ट्रपति वेंस और टं्रप के ‘विशेष दूत’ स्टीव विटकॉफ युद्ध नहीं, ईरान के साथ बातचीत और डील के पक्षधर हैं। बहरहाल यदि इस बार युद्ध का विस्तार हुआ, तो कच्चे तेल की कीमतें 140 डॉलर प्रति बैरल तक उछल सकती हैं और फिर वहीं स्थिर रह सकती हैं, क्योंकि सर्दी का मौसम शुरू हो चुका है।
अमरीका और यूरोपीय देशों में खासकर गैस की मांग ‘चरम’ पर पहुंच जाती है, क्योंकि वहां के घरों को गर्म रखने के लिए गैस की बुनियादी जरूरत होती है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के मुताबिक, 15 देशों में ऊर्जा की जबरदस्त किल्लत है। गैस के साथ-साथ तेल के संकट भी हैं। फ्रांस, फिलीपींस, इंडोनेशिया, स्लोवाकिया, जापान सरीखे देशों में ‘ऊर्जा आपातकाल’ और ‘राशनिंग’ की व्यवस्था लागू करनी पड़ी है। जहां तक भारत का सवाल है, तो उसने अक्तूबर माह में 56 लाख बैरल तेल औसतन हररोज खरीदा है। सुखद संकेत यह है कि खाड़ी देशों से औसतन रोजाना 23 लाख बैरल तेल हररोज आयात किया जा सका है और 20 लाख बैरल तेल रूस से खरीदा है। भारत कुछ अन्य देशों से भी सीमित मात्रा में कच्चा तेल खरीद रहा है। यदि ईरान युद्ध नए सिरे से भडक़ता है, तो होर्मुज के रास्ते आयात फिर बंद हो सकता है। सऊदी अरब के तेल ठिकानों पर हूती आतंकी लगातार हमले कर रहे हैं। रूस पर यूक्रेन ने इतने हमले किए हैं कि उसके 49 फीसदी तेल संयंत्र, रिफाइनरियां, तेल के संसाधन नष्ट अथवा क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। रूस से हमें नवंबर-दिसंबर में तेल की आपूर्ति निश्चित रूप से कम होगी! यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें 140 डॉलर या अधिक रहीं, तो भारत में मुद्रास्फीति, आम वस्तुओं के महंगे दाम, विदेशी मुद्रा भंडार में कमी और ‘रुपए’ के अवमूल्यन की स्थितियां लगातार बनेंगी। नतीजतन भारत की आर्थिक विकास दर 7 फीसदी से कम हो सकती है। बहरहाल अमरीका के ईरान पर संभावित परमाणु हमले की समूचे देश में यह ‘सामूहिक प्रतिक्रिया’ सामने आ रही है कि ईरान परमाणु अप्रसार संधि से बाहर आए और अपनी परमाणु नीति में बदलाव करे। अर्थात परमाणु बम बनाए। ईरान के पास जितना यूरेनियम सवंर्धित है, उससे कुछ ही दिनों में 10-12 परमाणु बम बनाए जा सकते हैं।



