स्वास्थ्य

रेक्टल कैंसर से ज्यादा क्यों हो रही युवाओं की मौत…

Why Rectal Cancer Is Increasing In Young Adults: कई सालों तक कोलोरेक्टल कैंसर को बुजुर्गों की बीमारी माना जाता रहा. हेल्थ सलाह भी ज्यादातर उम्रदराज लोगों की जांच पर ही केंद्रित रही, जबकि युवाओं को कम जोखिम वाला समझा गया. लेकिन अब तस्वीर बदलती नजर आ रही है, और यह बदलाव चिंता बढ़ाने वाला है. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर क्या नया निकला है. 

स्टडी में चौंकाने वाले खुलासे

स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ न्यूयॉर्क अपस्टेट मेडिकल यूनिवर्सिटी की मिथिली मेनन पथियिल के नेतृत्व में हुई एक स्टडी, जो Digestive Disease Week (DDW 2026) में पेश की गई, रिपोर्ट में बताया गया कि कम उम्र के लोगों में रेक्टल कैंसर से मौत के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. खासकर 30 के मध्य से 40 की शुरुआत तक की उम्र वाले लोगों में यह बढ़ोतरी ज्यादा देखी गई है. 

किस तरह से बदल रहे हैं मौत के आंकड़े?

रिसर्चर ने 1999 से 2023 तक के आंकड़ों का एनालिसिस किया. इसमें 20 से 44 साल के लोगों के रिकॉर्ड को शामिल किया गया। इतने लंबे समय के डेटा से यह समझने में मदद मिली कि मौत के आंकड़े किस तरह बदलते गए. नतीजे काफी चिंताजनक रहे. कुल मिलाकर कोलोरेक्टल कैंसर से मौत के मामले बढ़े हैं, लेकिन रेक्टल कैंसर की वजह से मौत की दर कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ रही है. कई समूहों में यह बढ़ोतरी कोलन कैंसर के मुकाबले दो से तीन गुना ज्यादा पाई गई. 

अलग- अलग समुदायों पर स्टडी

स्टडी में यह भी सामने आया कि अलग-अलग समुदायों में असर अलग है. हिस्पैनिक लोगों में रेक्टल कैंसर से मौत के मामले सबसे तेजी से बढ़े, जबकि अमेरिका के पश्चिमी हिस्सों में रहने वाले लोगों में भी यह वृद्धि ज्यादा देखी गई.  इससे संकेत मिलता है कि सामाजिक, पर्यावरण या लाइफस्टाइल से जुड़े कारण इसमें भूमिका निभा सकते हैं. भविष्य को समझने के लिए रिसर्चर ने 2035 तक का अनुमान भी लगाया. इसके अनुसार अगर हालात नहीं बदले, तो आने वाले वर्षों में रेक्टल कैंसर से मौत के मामले और बढ़ सकते हैं. खासकर 35 से 44 साल के लोगों में जोखिम सबसे ज्यादा बना रहेगा.

क्या है सबसे बड़ी वजह?

इस स्टडी में एक अहम वजह देरी से पहचान को माना गया है. कम उम्र के लोग अक्सर कैंसर के लक्षणों को नजरअंदाज कर देते हैं. डॉक्टर भी कई बार युवाओं में कैंसर की संभावना कम मानते हैं. जैसे मलद्वार से खून आना या पेट साफ करने की आदत में बदलाव, इन्हें अक्सर छोटी समस्या समझ लिया जाता है. इसी कारण युवा मरीजों में बीमारी का पता देर से चलता है. जहां बुजुर्गों में लक्षण दिखने के एक महीने के भीतर इलाज शुरू हो जाता है, वहीं युवा कई महीनों तक इंतजार करते रहते हैं. यह देरी स्थिति को ज्यादा गंभीर बना सकती है. 

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