धुल गया संसद का मानसून सत्र : जवाबदेह कौन?

हमारे सांसद जिस काम के लिए चुने गए हैं, उसे छोड़कर बाकी लगभग हर काम हुआ। सत्र लगभग पूरी तरह धुल गया और महज 19 प्रतिशत संसदीय कामकाज ही हो सका। जरा सोचिए, कोई कर्मचारी 19 प्रतिशत काम करे और फिर भी पूरी तनख्वाह, भत्ते और सुविधाओं की उम्मीद रखे। किसी भी संस्था में यह अनुशासनात्मक कार्रवाई का कारण बन सकता है। लेकिन संसद में यह रोजमर्रा की बात हो गई है। हंगामा, नारेबाजी, स्थगन और आरोप-प्रत्यारोप के बाद लोकतंत्र पर गंभीर भाषण। नि:संदेह, विपक्ष को सरकार को घेरने और सवाल पूछने का पूरा अधिकार है। सरकार को असहज सवालों का सामना करना ही चाहिए, क्योंकि संसद कभी भी रबर स्टैंप बनने के लिए नहीं थी। लेकिन सरकार को जवाबदेह ठहराने और संसद को काम ही न करने देने के बीच बुनियादी अंतर है।
दुर्भाग्य से, संसद केवल बाधित नहीं हुई, बल्कि यह जिम्मेदारी से बेहद चिंताजनक पलायन का उदाहरण बन गई। सांसदों ने मानो लोकतंत्र के मंदिर को जवाबदेही से मुक्त किसी निजी क्लब की तरह समझ लिया। गौर कीजिए-लोकसभा ने 12 विधेयक पारित किए, जिनमें से 11 बिना बहस के पारित हुए और 9 के समय संबंधित मंत्री को छोड़कर कोई सांसद मौजूद नहीं था। केवल लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 पर विस्तृत चर्चा हुई, जिसमें 11 घंटे तक बहस चली और 48 सांसदों ने भाग लिया। दरअसल, संसद अपने सामने मौजूद एक बड़ी चुनौती का सामना करने में बुरी तरह विफल रही, जेन-काी द्वारा उठाए गए मुद्दों के लिए अपने दरवाजे खोलना और सड़क तथा संसद के बीच बढ़ती दूरी को पाटना। दूसरी ओर, विपक्ष को लगा कि उसने एक बार फिर भाजपा से मुद्दे और राजनीतिक विमर्श की बढ़त छीन ली है। उसने प्रदर्शनकारियों पर पुलिस ङ्क्षहसा पर बहस के लिए शाह की पेशकश को यह कहते हुए ठुकरा दिया कि ‘हम भाषण नहीं सुनना चाहते।’
त्रासदी यह है कि हंगामा अब राजनीतिक रणनीति बन चुका है। राजनीतिक दल यह गणित लगाने लगे हैं कि संसद को बाधित करना, उसकी कार्रवाई की जांच-पड़ताल, बहस और सरकार को जवाबदेह बनाने से कहीं अधिक सोशल मीडिया फुटेज दिला सकता है। सदन में एक मिनट की नारेबाजी, विधायी कार्यों की एक घंटे की गंभीर और धैर्यपूर्ण पड़ताल से ज्यादा सुर्खियां बटोरती है। विचार-विमर्श की जगह नाटकीयता ने ले ली है और इसकी कीमत हम चुकाते हैं। संसद में बर्बाद हुआ हर घंटा केवल कोई संस्थागत आंकड़ा नहीं है। वह करदाताओं का पैसा है। वह लंबित कानून है। वह अनुत्तरित सवाल है। वह ऐसी नीति है, जिस पर समुचित बहस नहीं हो पाती। वह संसदीय समितियों से छिन गया पड़ताल का अवसर है। और वह नागरिक हैं, जिन्हें बार-बार कतार में सबसे पीछे धकेल दिया जाता है। फिर भी किसी को शॄमदगी महसूस होती नहीं दिखती। सबसे हैरान करने वाली बात है-संस्थागत जवाबदेही का पूरी तरह अभाव। समस्या किसी एक सत्र या किसी एक दल तक सीमित नहीं है। यह एक व्यवस्थागत समस्या है। संसद के भीतर सरकार और विपक्ष भले ही एक-दूसरे से जमकर लड़ें लेकिन जब बात अपने विशेषाधिकारों और सुविधाओं की रक्षा की आती है, तो दोनों में असाधारण द्विदलीय एकता दिखाई देती है।
इसीलिए संसदीय जवाबदेही को राजनीतिक नैतिकता के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। इसके लिए संस्थागत सुरक्षा-तंत्र जरूरी है। एक पारदर्शी सार्वजनिक डैशबोर्ड होना चाहिए, जिसमें प्रत्येक सांसद की उपस्थिति, सदन में भागीदारी, पूछे गए सवाल, बहस में हिस्सा, प्रस्तुत निजी सदस्य विधेयक और समिति संबंधी काम का पूरा विवरण दर्ज हो। नागरिकों को एक ही स्थान पर यह देखने का अधिकार होना चाहिए कि उनके चुने हुए प्रतिनिधि ने संसद के एक सत्र के दौरान वास्तव में क्या किया। कोई सांसद लगातार सदन की कार्रवाई बाधित करता रहे तो उसके खिलाफ कोई सार्थक आर्थिक कार्रवाई क्यों न हो, जबकि एक सरकारी कर्मचारी अनुपस्थिति या कदाचार के लिए वेतन गंवा सकता है। सांसदों और राजनीतिक दलों को सामूहिक रूप से करोड़ों रुपए का सार्वजनिक धन बर्बाद करने की छूट क्यों हो और उनसे इसका स्पष्टीकरण तक न मांगा जाए? आखिर इन ‘वॉशआऊट्स’ की जवाबदेही कौन तय करेगा? जब तक इस सवाल का जवाब नहीं मिलता, संसद शायद भारत की एकमात्र ऐसा कार्यस्थल बनी रहेगी, जहां विफलता शानदार भी हो सकती है, महंगी भी और बार-बार दोहराई भी जा सकती है-फिर भी किसी को इसका हिसाब नहीं देना पड़ता।
इसके अलावा, क्या राजनीतिक दल वास्तव में संसदीय सुधार चाहते हैं? शायद नहीं। मौजूदा व्यवस्था उनके अनुकूल है। विपक्ष में रहते हुए सदन को बाधित करना हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। सत्ता में रहते हुए संसदीय बहुमत के जरिए कामकाज को जबरन आगे बढ़ाया जा सकता है। दोनों ही स्थितियों में वास्तविक संस्थागत सुधार सुविधाजनक रूप से बयानबाजी और विस्मृति के बीच कहीं दबा रहता है। नतीजा यह है कि संसद तेजी से शोर और संख्याबल के बीच फंसती जा रही है। इस पूरी प्रक्रिया में लोकतंत्र की सबसे जरूरी चीज, तर्कपूर्ण बहस, सिकुड़ती जा रही है।
अब आगे क्या : संसद को कम बहाने, कम स्थगन और कहीं अधिक जवाबदेही की जरूरत है। केवल पद मिल जाने से काम करना वैकल्पिक नहीं हो जाता। नियमों में प्रभावी दंड का प्रावधान होना चाहिए। सदन की कार्रवाई बाधित करने पर अनुपातिक परिणाम भुगतने पडऩे चाहिएं। इस विफलता और गंवाए गए अवसर की जिम्मेदारी सरकार और विपक्ष, दोनों को लेनी होगी। हालांकि, सरकार की जिम्मेदारी अधिक है, क्योंकि सदन को सुचारू रूप से चलाना और विधेयकों पर चर्चा व बहस सुनिश्चित करना सरकार का दायित्व है। केवल संख्याबल के सहारे विधेयकों को ध्वनिमत से पारित कर देना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए सरकार को सहमति, सहयोग और उदारता का परिचय देना होगा। अंतत: संसद न तो सरकार की है, न विपक्ष की। संसद नागरिकों की है। उसके सदन राजनीतिक रंगमंच नहीं हैं। वे ऐसे कार्यस्थल हैं जिन्हें जनता के पैसे से चलाया जाता है। हमारे सांसदों पर सामूहिक रूप से यह जिम्मेदारी है कि वे यह साबित करें कि वे जिम्मेदार और जनता के प्रति संवेदनशील हैं।-पूनम आई. कौशिश



