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छात्रों में बढ़ती आक्रामकता, समाधान जरूरी

पंजाब के एक प्रसिद्ध विश्वविद्यालय में छात्रों का आक्रोशित होकर आक्रामक प्रदर्शन, उच्च शिक्षा जगत के लिए चिंताएं पैदा कर रहा है। चिंता का बड़ा कारण इसलिए भी है क्योंकि जिस उम्र में छात्रों के मानसिक और सामाजिक विकास की नींव रखी जाती है, उसी उम्र में कई छात्रों में आक्रामकता घर करने लगी है। भारत के छात्रों में आक्रामक मानसिकता का पनपना हमारी शिक्षा, पारिवारिक एवं सामाजिक संरचना पर कई सवाल खड़े करता है। यह रुझान छात्रों के शैक्षणिक प्रदर्शन पर तो नकारात्मक प्रभाव डाल ही रहा है, इसे भविष्य में समाज में अस्थिरता के लिए बड़ा खतरा भी मानना चाहिए। बड़ा सवाल है कि जिन वजहों से छात्रों के भीतर आक्रामकता पैदा हो रही है, उनसे निपटने के लिए क्या किया जा रहा है?

यूं तो उम्र के इस पड़ाव पर उनको सही राह दिखाने की जिम्मेदारी परिजन और शिक्षक और शैक्षणिक प्रशासन की ही होती है। आज दोनों ही कहीं न कहीं अपनी जिम्मेदारी को ठीक तरीके से शायद नहीं निभा पा रहे हैं, इसके लिए सभी समाजसेवियों, शिक्षाविदों और चिंतकों को आगे आना चाहिए। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो, छात्रों में आक्रामकता कुंठा और दबाव का नतीजा है। छात्रों में गुस्सा, निराशा या चिंता जैसी भावनाओं को नियंत्रित करने की क्षमता का अभाव होता है, जिससे वे आक्रामक हो जाते हैं। पढ़ाई और परीक्षा में अच्छे अंक लाने का भारी दबाव और असफलता का डर छात्रों में चिड़चिड़ापन और आक्रामकता पैदा करता है। ध्यान की कमी और अतिसक्रियता के कारण छात्र तुरंत उत्तेजित हो जाते हैं। कंडक्ट डिसऑर्डर एक ऐसा विकार है, जिसमें नियमों को तोडऩा और आक्रामक व्यवहार करना शामिल होता है। इसमें छात्र बड़ों और शिक्षकों के प्रति लगातार अवज्ञाकारी और गुस्सैल रुख अपनाते हैं। लंबे समय तक रहने वाली उदासी या आंतरिक मानसिक पीड़ा भी गुस्से के रूप में बाहर आती है।

बचपन में किसी प्रकार का शारीरिक या मानसिक शोषण, घर में हिंसा देखना, या उपेक्षा का शिकार होना छात्रों के मन में गहरे डर और गुस्से को जन्म देता है। जब छात्र अपनी बात या अपनी जरूरतें दूसरों को सही तरीके से नहीं समझा पाते, तो उनकी झुंझलाहट आक्रामकता में बदल जाती है। जो छात्र खुद स्कूल या दोस्तों के बीच रैगिंग या उत्पीडऩ का शिकार होते हैं, वे अक्सर अपनी संकुचन या बदले की भावना को दूसरों पर आक्रामकता के जरिए निकालते हैं। खुद को अकेला महसूस करना या कम आत्मसम्मान होना भी छात्रों में कुंठा और आक्रामक प्रवृत्ति को बढ़ावा देता है। इन मनोवैज्ञानिक कारणों का निदान कैसे होगा?

कैम्पस का माहौल यदि सकारात्मक नहीं हो तो भी छात्र आक्रामक हो जाते हैं। क्या देश के सभी उच्च शिक्षा संस्थानों में मनोवैज्ञानिक सलाहकारों की व्यवस्था है? क्या इस दिशा में में रैगुलेटरी अथॉरिटी की गाइडलाइंस का पालन किया जा रहा है? क्या उच्च शिक्षा संस्थानों का धीरे-धीरे, व्यापारिक संस्थानों में तबदील हो जाना, शिक्षा जगत के सामाजिक-सार्वजनिक हितों की रक्षा कर सकेगा? ऐसे कई सवाल हैं, जिनका हल करने से छात्रों में आक्रामकता को कम किया जा सकता है।-डा. वरिन्द्र भाटिया

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