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मतदाता सूची स्वच्छ बनाएं, मगर वैध मतदाताओं के नाम न हटाएं

लोकतंत्र की शुरुआत एक सरल प्रश्न से होती है-मतदान करने का अधिकार किसे है? मुझे निर्वाचन आयोग  की विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया का पहला अनुभव अपने ही घर के दरवाजे पर हुआ। एक बूथ-स्तरीय अधिकारी मेरे निर्वाचन संबंधी विवरणों का सत्यापन करने आए। मैंने उन्हें निर्वाचन आयोग द्वारा जारी 2 मतदाता पहचान-पत्र (1995 और 2009 के) दिखाए और सोचा कि यह पर्याप्त होगा लेकिन, जाहिर तौर पर ऐसा नहीं था। मुझे बताया गया कि चूंकि मेरे पास वर्ष 2002 का मतदाता पहचान-पत्र नहीं है, इसलिए मुझे सुनवाई के लिए उपस्थित होना होगा। ‘क्यों?’ इसका कोई उत्तर नहीं दिया गया। न ही यह समझाया गया कि 2002 का कार्ड ऐसा कौन-सा जादुई दस्तावेज है, जो निर्वाचन आयोग द्वारा जारी किए गए 2 मतदाता पहचान-पत्रों से वह बात सिद्ध कर सकता है, जो वे दोनों मिलकर नहीं कर सकते।

यही छोटा-सा अनुभव विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया की बड़ी समस्या को सामने लाता है। संक्षेप में, जब कोई नागरिक कोई सरल प्रश्न पूछता है, तो संस्था के पास उसका स्पष्ट उत्तर होना चाहिए। अन्यथा मतदाता सूची को साफ करने की एक सामान्य प्रक्रिया कुछ और बन जाती है, एक ऐसी प्रक्रिया जिसमें नागरिकों को चुनावी नौकरशाही के रास्तों को समझकर आगे बढऩा पड़ता है। यही कारण है कि निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता सूचियों को लेकर पैदा हुआ विवाद केवल मतदाता सूचियों की सफाई का एक प्रशासनिक अभ्यास नहीं है। यह लोकतांत्रिक सामाजिक अनुबंध के मूल तक जाता है। देशभर में मसौदा मतदाता सूचियों से 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए गए हैं। निर्वाचन आयोग का कहना है कि ऐसा मृत, दोहरे, स्थानांतरित और अपात्र प्रविष्टियों को हटाकर सटीक मतदाता सूचियां सुनिश्चित करने के लिए किया गया है। यह एक वैध संवैधानिक उद्देश्य है। चुनाव में फर्जी मतदाता के लिए कोई स्थान नहीं है। लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है। मृत मतदाता मतदान नहीं कर सकता लेकिन यदि किसी वास्तविक मतदाता का नाम हटा दिया गया है, तो वह भी मतदान नहीं कर सकता। यहीं खतरे की घंटी बजती है। मुद्दा यह है कि क्या सफाई की यह प्रक्रिया अनजाने में वास्तविक मतदाताओं को उनके मताधिकार से वंचित कर सकती है, विशेषकर तब, जब इस प्रक्रिया में लाखों नाम, जटिल दस्तावेज और कम समय-सीमा शामिल हों।

मतदाता सूची को साफ करना लोकतांत्रिक व्यवस्था की नियमित व्यवस्था का हिस्सा है। लेकिन नागरिकों से यह प्रमाणित करने के लिए कहना कि उन्हें सूची में बने रहने का अधिकार क्यों है, एक महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रक्रिया है। एक और चिंताजनक घटनाक्रम निर्वाचन आयोग के भीतर मतभेद से जुड़ा है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, 2 निर्वाचन आयुक्तों-संधू और जोशी ने 10 महीनों में चुनावी सूची संबंधी प्रक्रिया के फैसलों और उपायों पर 14 बार आपत्तियां दर्ज कीं। इनमें नए मतदाताओं के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म 6 में किए गए बदलाव भी शामिल थे, जिनमें आवेदक अथवा उसके माता-पिता की पूर्व एस.आई.आर. सूचियों में उपस्थिति से संबंधित प्रश्न जोड़े गए थे। दोनों ने इन्हें ‘अवैध’ और ‘अनधिकृत’ बताया। निश्चित रूप से यह कोई मामूली असहमति नहीं है, क्योंकि निर्वाचन आयोग कोई ऐसा सामान्य सरकारी विभाग नहीं है, जहां आंतरिक असहमति किसी फाइल में दबकर रह जाए। वह चुनावों का संवैधानिक निर्णायक है।

आयोग ने जवाब दिया कि विचारों में मतभेद विचार-विमर्श का सामान्य हिस्सा हैं और एस.आई.आर. से जुड़े निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए। इसलिए मुख्य निर्वाचन आयुक्त द्वारा अपने सहयोगियों को ‘दरकिनार’ किए जाने का आरोप अपने आप में एक प्रश्न बना हुआ है। हालांकि, इससे एक बड़ा प्रश्न सामने आता है-तीन सदस्यीय संवैधानिक निकाय के 2 सदस्यों ने सार्वजनिक रूप से उन फैसलों पर आपत्ति क्यों जताई, जो यह निर्धारित करते हैं कि मतदाता सूची में किसका नाम रहेगा? इसका उत्तर खुले में दिया जाना चाहिए, न कि नौकरशाही के अंधेरे में। चुनाव की विश्वसनीयता केवल अंतिम परिणाम पर निर्भर नहीं करती, बल्कि उस प्रक्रिया में जनता के विश्वास पर भी निर्भर करती है, जिसके माध्यम से परिणाम सामने आता है।

पहले से ही विपक्षी दल संसद में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए एक और नोटिस देने की तैयारी कर रहे हैं। उनका आरोप है कि मतदाता सूची का राजनीतिकरण किया गया है और एस.आई.आर. को इस तरह तैयार किया गया है कि इससे भाजपा के पक्ष में चुनावी परिणाम प्रभावित हों। निर्वाचन आयोग इन आरोपों को खारिज करता है। लेकिन आयोग को यह समझना चाहिए कि पारदर्शिता संदेह का सबसे अच्छा उपचार है। उसे आंकड़े, कार्यप्रणाली, नाम हटाने के कारण, प्राप्त आपत्तियों की संख्या और कितनी आपत्तियां स्वीकार या अस्वीकार की गईं तथा क्यों, इन सबका विवरण प्रकाशित करना चाहिए। इसके साथ ही आयोग के सदस्यों के बीच हुए मतभेदों और उनके समाधान की प्रक्रिया भी स्पष्ट की जानी चाहिए। 

स्वतंत्र चुनावों के लिए स्वच्छ मतदाता सूची जरूरी है। लेकिन मतदाता सूची को केवल इसलिए स्वच्छ नहीं कहा जा सकता कि उसमें से लाखों नाम गायब हो गए हैं। वह तभी स्वच्छ है जब प्रत्येक पात्र नागरिक, जो मतदान करना चाहता है, उसके पास सूची में अपना नाम बनाए रखने का निष्पक्ष और व्यावहारिक अवसर हो। इसलिए निर्वाचन आयोग को विपक्ष, न्यायालयों और नागरिकों द्वारा उठाए गए सवालों का जवाब देना चाहिए, क्योंकि उसका अधिकार इतना महत्वपूर्ण है कि उसे अपारदर्शी नहीं होने दिया जा सकता। चुनाव आयोग को राजनीतिक संघर्ष के मैदान से ऊपर खड़ा होना होगा, क्योंकि चुनाव न तो सरकार की संपत्ति हैं और न विपक्षी दलों की। वे मतदाताओं के हैं।

यदि लाखों मतदाताओं के नाम सूचियों से गायब हो जाते हैं और स्वयं निर्वाचन आयोग के भीतर इस बात पर मतभेद हो कि प्रक्रिया किस प्रकार संचालित की जा रही है, तो सवाल केवल यह नहीं रह जाता कि चुनाव कौन जीतेगा। इससे भी अधिक मूलभूत प्रश्न यह है-क्या किसी चुनाव को स्वतंत्र और निष्पक्ष कहा जा सकता है, यदि हमें निश्चित न हों कि प्रत्येक पात्र मतदाता को मतदान करने की अनुमति दी गई थी? क्योंकि यदि मतदाता सूचियां ही सवालों के घेरे में हों, तो चुनावी जनादेश पर भी अनिवार्य रूप से प्रश्नचिह्न लग जाता है। और जब स्वयं 2 निर्वाचन आयुक्त प्रक्रिया को लेकर स्पष्ट उत्तर चाहते हैं लेकिन उन्हें इसकी बजाय अस्पष्ट और शब्दाडंबरपूर्ण स्पष्टीकरण मिलते हैं, तो चिंता केवल राजनीतिक नहीं रह जाती।-पूनम आई. कौशिश  

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