‘किल ट्रंप’ के मायने युद्ध

ईरान के सुप्रीम लीडर रहे एवं शिया मुस्लिम समुदाय की आस्था के प्रतीक अयातुल्ला अली खामेनेई के जनाजे का दौर है, लिहाजा समूचा देश मातम में है। शोकाकुल लोग रो रहे हैं, छाती पीट रहे हैं, राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान और संसद अध्यक्ष कालीबाफ सरीखे शीर्ष नेताओं और सैन्य कमांडरों को फफक-फफक कर रोते देखा गया है। यह सिलसिला 9 जुलाई तक चलेगा, जिस दिन खामेनेई को उनके गृह नगर मशहद में ‘सुपुर्द-ए-खाक’ किया जाएगा। ईरान गमजदा है, लेकिन अपनी समूची ताकत के नमूने भी पेश कर रहा है। उसने ऐसी बैलिस्टिक मिसाइल का सफल परीक्षण किया है, जिसे मात्र 8 मिनट में लॉन्च किया जा सकता है और दुश्मन को ‘मिट्टी-मलबा’ किया जा सकता है। तेहरान में 30 से अधिक देशों के शीर्ष प्रतिनिधिमंडल और 90 से अधिक देशों के धर्मगुरु और प्रतिनिधि पहुंचे हैं और दिवंगत सुप्रीम लीडर को श्रद्धांजलियां पेश की हैं। यह शोक-आयोजन यहीं तक सीमित नहीं रहा, क्योंकि सुप्रीम लीडर के सम्मान, श्रद्धा, आस्था में जो भी भीड़ सडक़ों पर दिखाई दे रही है, उसके कई हाथों में ‘किल टं्रप’ और ‘डेथ टू अमरीका’ के पोस्टर देखे गए। मंसूबे साफ हैं कि ईरानी अवाम भी चाहता है कि इस शहादत, बलिदान का बदला जरूर लिया जाए। खून का बदला खून…! ‘प्रार्थना-स्थल’ पर भी नारे गूंजते रहे-अमरीका और टं्रप की हत्या करो। मेजर जनरल अहमद वाहिदी समेत सैन्य कमांडरों ने कसम खाई है कि सुप्रीम लीडर की हत्या का बदला हर हाल में लिया जाएगा। इसके साफ मायने हैं कि युद्ध अभी जारी रहेगा। हालांकि जनाजे के दौरान अतिरिक्त सुरक्षा और सतर्कता के लिए अमरीका ने ईरान को ‘अलर्ट’ किया है। राष्ट्रपति टं्रप अब ईरान को सुरक्षा मुहैया कराने की बात कह रहे हैं, लेकिन तंज भी कस रहे हैं कि हमने ईरान को, सुप्रीम लीडर के जनाजे के लिए, एक सप्ताह की छुट्टी दी है। ध्यान रहे कि राष्ट्रपति टं्रप का ही यह मकसद था कि सुप्रीम लीडर को खत्म कर ईरान में कथित तानाशाही समाप्त की जाए और सत्ता बदल दी जाए। अमरीका ने ही इजरायल के साथ मिल कर खामेनेई पर हमला किया था, जिसमें उनके साथ 40 से अधिक शीर्ष नेता, सलाहकार और कमांडर भी मारे गए।
बहरहाल अमरीका ने यह भी पुष्टि की है कि इजरायल जनाजे के दौरान ईरान की भीड़ और वहां के कालीबाफ अब्बास अरागची (विदेश मंत्री) सरीखे नेताओं पर हमले कर सकता है! अमरीकी खुफिया एजेंसियां भी इजरायल के नापाक मंसूबों पर लगातार नजरें गड़ाए हैं। ईरान और अमरीका के ऐसे संबंध अप्रत्याशित, आश्चर्यजनक लगते हैं। रक्षा विशेषज्ञों के अब भी आकलन हैं कि फीफा फुटबॉल विश्व कप अथवा खामेनेई के सुपुर्द-ए-खाक के बाद युद्ध फिर भडक़ेगा और वह पहले से ज्यादा भीषण, वीभत्स होगा। ईरान युद्ध का विध्वंसकारी दौर फिलहाल काफी शांत है और दुनिया ने राहत की एक सांस ली है, क्योंकि खाड़ी देशों से तेल, गैस की आपूर्ति कुछ शुरू हुई है, लेकिन होर्मुज पर अब भी ईरान का नियंत्रण है। सिर्फ टैक्स का भुगतान करने वाले जहाज, टैंकर ही होर्मुज से गुजर पा रहे हैं। युद्ध से वैश्विक अर्थव्यवस्था का 2.2 ट्रिलियन डॉलर से अधिक का नुकसान आंका जा रहा है, लिहाजा दोनों देशों को इस संदर्भ में विमर्श कर यथाशीघ्र ‘अंतिम समझौते’ पर सहमत होना चाहिए। यदि इजरायल जैसे ‘नरसंहारी देश’ पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद भी काबू पाने में असमर्थ, असहाय है, तो उसपर ढक्कन लगा देना चाहिए। इजरायल की सेनाएं गाजा और लेबनान में विध्वंसक हमले हर रोज कर रही हैं और लगातार लाशें बिछा रही हैं। लाखों लोग विस्थापित हो चुके हैं। बच्चे भी मारे जा रहे हैं। क्या सभी रिहायशी इमारतों में हमास और हिजबुल्लाह के आतंकी मौजूद हैं, उनके नेटवर्क बने हुए हैं? इजरायल हमले कर कब्जे करने पर आमादा क्यों है? इजरायल अमरीका-ईरान के दरमियान समझौते की संभावनाओं को भी ध्वस्त करने पर आमादा है। खबर है कि प्रधानमंत्री नेतन्याहू शीघ्र ही ‘व्हाइट हाउस’ में राष्ट्रपति टं्रप से मुलाकात करेंगे और भविष्य की रणनीति पर विमर्श करेंगे। यदि राष्ट्रपति टं्रप जरा-सा भी मानवतावादी नेता हैं, तो उन्हें नेतन्याहू को निर्णायक चेतावनी देनी चाहिए कि नरसंहार तुरंत बंद करो। वहां से समझौते की बातचीत नया मोड़ ले सकती है। लेकिन अली खामेनेई के अंतिम संस्कार की प्रक्रिया के दौरान अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जो बयान दिया है, उससे यह संभावना है कि आगे दोनों देशों में फिर तल्खी आ सकती है। अगर दोनों देशों में युद्ध दोबारा शुरू होता है तो इसके परिणाम सभी के लिए घातक सिद्ध होंगे। क्योंकि ईरान और अमरीका के साथ-साथ दूसरे देशों की अर्थव्यवस्था पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ेगा। इतिहास गवाह है कि युद्ध के परिणाम हमेशा घातक ही होते हैं।



