व्यापार

भारत-ब्रिटेन के व्यापार को मिली नई रफ्तार

वाहन और प्रीमियम मदिरा क्षेत्र में ब्रिटिश आयात बढऩे से भारत के घरेलू उत्पादकों को कड़ी प्रतिस्पर्धा मिलेगी। भारतीय इलेक्ट्रिक वाहन निर्माताओं को जो 5 साल का सुरक्षा चक्र मिला है, उसका उन्हें आक्रामक रूप से अनुसंधान और विकास में उपयोग करना होगा ताकि वे भविष्य में वैश्विक प्रतिस्पर्धा का डटकर सामना कर सकें..

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि 15 जुलाई से भारत और ब्रिटेन के बीच लागू हुआ व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौता (सीटा) दोनों देशों की अटूट साझेदारी का एक युगांतरकारी पड़ाव है। यह ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) दोनों देशों की साझा महत्वाकांक्षाओं को ठोस अवसरों में बदलेगा। इस व्यापार समझौते में लगभग शून्य-शुल्क और सामाजिक सुरक्षा की नई व्यवस्था हमारे किसानों, उद्यमियों और लघु उद्योगों को वैश्विक ऊंचाइयों पर ले जाकर उत्कृष्टता का एक नया मापदंड स्थापित करेगी। भारत में ब्रिटिश उच्चायुक्त लिंडी कैमरन के अनुसार यह एफटीए दोनों देशों में रोजगार के नए अवसर पैदा करने, नवाचार को गति देने तथा विभिन्न क्षेत्रों में द्विपक्षीय व्यापार एवं विकास को अभूतपूर्व ऊंचाइयों पर ले जाने में सहायक सिद्ध होगा। उल्लेखनीय है कि 15 जुलाई को सीटा के लागू होने के पहले दिन ही 14 करोड़ डॉलर मूल्य का माल निर्यात हुआ है और आगामी दिनों में माल निर्यात के लिए बड़ी मात्रा में आर्डर मिल चुके हैं। नि:संदेह यह कोई छोटी बात नहीं है कि जिस ब्रिटेन ने कभी भारत पर लंबे समय तक शासन किया था, उसी ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था का आज भारत एक बड़ा रणनीतिक साझेदार बन गया है। यह मुक्त व्यापार समझौता ऐसे समय में लागू हुआ है, जब वैश्विक अर्थव्यवस्था पश्चिम एशिया संघर्ष और भू-राजनीतिक तनावों के दौर से गुजर रही है।

ऐसे में भारत और ब्रिटेन का एक साथ आना दोनों देशों के आर्थिक परिदृश्य को बदलने की क्षमता रखता है। वर्तमान में भारत और ब्रिटेन के बीच वस्तुओं तथा सेवाओं का कुल सालाना व्यापार 55 से 60 अरब डॉलर मूल्य का है, जिसे वर्ष 2030 तक 100 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है। यह भी महत्वपूर्ण है कि इस समझौते से ब्रिटेन जाने वाली करीब 99 प्रतिशत भारतीय वस्तुओं पर कोई शुल्क नहीं लगेगा। इससे ब्रिटेन के बाजार में भारतीय वस्तुएं सस्ती होंगी और उनका निर्यात बढ़ेगा। निश्चित रूप से भारत-ब्रिटेन मुक्त व्यापार समझौता ऐतिहासिक है और इसके दूरगामी रणनीतिक आर्थिक लाभ होंगे। वर्तमान में भारत और ब्रिटेन के बीच व्यापार संतुलित तो है, लेकिन दोनों देशों की वास्तविक क्षमता से काफी कम है। ब्रिटेन सालाना लगभग 949 अरब डॉलर मूल्य की विभिन्न वस्तुओं का आयात करता है और इसमें भारत की हिस्सेदारी महज 13.44 अरब डॉलर की है। इसी प्रकार, ब्रिटेन सालाना लगभग 399 अरब डॉलर का सेवा आयात करता है और उसमें भारत की हिस्सेदारी महज 21.66 अरब डॉलर ही है। यह समझौता ब्रिटेन के लिए यूरोपीय संघ से अलग होने के बाद किए गए अन्य सभी समझौतों (जैसे ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड या प्रशांत-पार साझेदारी) की तुलना में उसके सकल घरेलू उत्पाद को सबसे बड़ा बढ़ावा देने वाला साबित होगा। इससे आगामी वर्षों में ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था में भारी उछाल का अनुमान है। यह मुक्त व्यापार समझौता पश्चिमी देशों की ‘चीन से इतर’ आपूर्ति श्रृंखला विविधीकरण की रणनीति के तहत भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला के एक विश्वसनीय और रणनीतिक केंद्र के रूप में स्थापित करता है। औषधि निर्माण के क्षेत्र में भारत दुनिया की फार्मा हब के रूप में अपनी स्थिति और मजबूत करेगा। इसमें कोई दो मत नहीं हैं कि बाजार पहुंच और शुल्क संरचना के सरलीकरण के मोर्चे पर ब्रिटेन ने अभूतपूर्व उदारता दिखाई है। यह भारतीय विनिर्माण और विशेषकर सेवा क्षेत्र के लिए एक विशाल अवसर है। दूसरी ओर, भारत ने भी अपने घरेलू हितों और संवेदनशील क्षेत्रों की रक्षा करते हुए ब्रिटेन के 90 प्रतिशत उत्पादों पर सीमा शुल्क को धीरे-धीरे और चरणबद्ध तरीके से कम या समाप्त करने पर सहमति जताई है।

इस प्रकार, दोनों देशों ने घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने और आपसी व्यापारिक बाधाओं को न्यूनतम करने का एक आदर्श मार्ग खोज निकाला है। वाहन क्षेत्र में इस समझौते के तहत किए गए नीतिगत बदलाव बेहद क्रांतिकारी हैं। चूंकि भारत मूलत: एक सेवा-प्रधान अर्थव्यवस्था है और इस समझौते में सेवा क्षेत्र को विशेष महत्व दिया गया है। इसके तहत भारतीय पेशेवरों के हितों की दृढ़ता से रक्षा की गई है। अब सूचना प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ, वित्तीय विश्लेषक, डॉक्टर, नर्स, डेटा वैज्ञानिक और इंजीनियरों को ब्रिटेन में काम करने और अपनी सेवाएं देने के लिए बेहतर, सुव्यवस्थित और बाधामुक्त व्यावसायिक गतिशीलता मार्ग मिलेंगे। इसके साथ ही, समझौते के तहत एक ऐतिहासिक सामाजिक सुरक्षा समझौता हुआ है, जिसके तहत भारतीय पेशेवरों को ब्रिटेन में रहने के दौरान वहां राष्ट्रीय बीमा योगदान देने के बाद भारत में दोबारा सामाजिक सुरक्षा कर नहीं देना होगा। इससे पेशेवरों और कंपनियों की बड़ी वित्तीय बचत होगी। नि:संदेह भारत के उन क्षेत्रों को इससे सबसे बड़ा लाभ होने जा रहा है जहां बड़े पैमाने पर मानव श्रम की आवश्यकता होती है और जो ग्रामीण या अर्ध-शहरी अर्थव्यवस्था को गति देते हैं। वस्त्र, जूते-चप्पल, कालीन, प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ, मसाले और समुद्री उत्पादों पर ब्रिटेन में पहले 4 प्रतिशत से 16 प्रतिशत तक भारी कर लगता था, जो अब इस समझौते के तहत पूरी तरह से शून्य हो गया है। इस शुल्क मुक्त पहुंच से भारतीय कपड़ा और चमड़ा उद्योग के निर्यात में 30 से 40 प्रतिशत की वृद्धि की उम्मीद है, जिससे देश में लाखों नए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा होंगे, विशेषकर महिला कार्यबल के सशक्तिकरण को बल मिलेगा। विनिर्माण और घरेलू उत्पादन के मोर्चे पर भी यह समझौता भारतीय ऑटो घटकों, अभियांत्रिकी सामानों, इलेक्ट्रॉनिक्स और परिष्कृत धातु उत्पादों को ब्रिटिश बाजार में बेहतर हिस्सेदारी दिलाएगा। कम लागत पर उच्च गुणवत्ता वाले कच्चे माल और उन्नत ब्रिटिश तकनीक की उपलब्धता से भारत में विनिर्माण की गुणवत्ता वैश्विक मानकों के अनुरूप बेहतर होगी। इसके साथ ही, भारतीय उपभोक्ताओं और व्यवसायों के लिए भी नए विकल्प खुलेंगे। यद्यपि यह समझौता भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक स्वर्णिम और ऐतिहासिक अवसर है, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि भारतीय उद्योग और नीति निर्माता आने वाली चुनौतियों का सामना कितनी मुस्तैदी से करते हैं। शुल्क कम या शून्य होने का मतलब यह नहीं है कि ब्रिटिश बाजार में प्रवेश पूरी तरह से आसान हो जाएगा। भारतीय निर्यातकों को ब्रिटेन के सख्त तकनीकी व्यापारिक बाधा मानकों, स्वास्थ्य और स्वच्छता मानकों तथा पर्यावरणीय और सतत विकास नियमों का सामना करना पड़ेगा।

यदि भारतीय उत्पादों में गुणवत्ता की कमी पाई गई, तो वे अस्वीकार किए जा सकते हैं। इसलिए भारतीय कंपनियों को अपने उत्पादों की गुणवत्ता, परीक्षण प्रयोगशालाओं और पैकेजिंग में व्यापक सुधार करना होगा। इसके अलावा वाहन और प्रीमियम मदिरा क्षेत्र में ब्रिटिश आयात बढऩे से भारत के घरेलू उत्पादकों को कड़ी प्रतिस्पर्धा मिलेगी। भारतीय इलेक्ट्रिक वाहन निर्माताओं को जो 5 साल का सुरक्षा चक्र मिला है, उसका उन्हें आक्रामक रूप से अनुसंधान और विकास में उपयोग करना होगा ताकि वे भविष्य में वैश्विक प्रतिस्पर्धा का डटकर सामना कर सकें। उम्मीद करें कि 15 जुलाई से लागू हुआ भारत-ब्रिटेन मुक्त व्यापार समझौता दोनों देशों के बीच केवल एक व्यापारिक दस्तावेज नहीं रहेगा, बल्कि यह 21वीं सदी की आर्थिक प्राथमिकताओं और रणनीतिक आवश्यकताओं को दर्शाने वाली एक ऐतिहासिक साझेदारी सिद्ध होगा। उम्मीद करें कि यह समझौता भारत को अपनी वास्तविक निर्यात क्षमता को विस्तारित करने, घरेलू विनिर्माण को विश्वस्तरीय बनाने और रोजगार के अवसर देगा।-डा. जयंती लाल भंडारी

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