राजनीति

up में कांग्रेस को समाजवादी पार्टी की जरूरत

उत्तर प्रदेश में अगले विधानसभा चुनाव की तैयारी चल रही है, ऐसे में कांग्रेस के रणनीतिकारों को एक असहज सच्चाई का सामना करना पड़ रहा है-मौजूदा गठबंधन में समाजवादी पार्टी (एस.पी.) की स्थिति कहीं अधिक मजबूत है। ‘इंडिया गठबंधन की एकता’ के दिखावे से परे, गणितीय समीकरण और संगठनात्मक क्षमता भी यही संकेत देती है-कांग्रेस को समाजवादी पार्टी की जरूरत समाजवादी पार्टी को कांग्रेस की जरूरत से कहीं अधिक है।

पहला अंतर संरचनात्मक है। समाजवादी पार्टी कोई व्यक्ति-प्रधान संगठन नहीं है, जो कुछ समय के लिए जनसमर्थन बटोरकर सत्ता के पलटने पर गायब हो जाता है। इसके पास एक सक्रिय कार्यकत्र्ता दल और बूथ स्तर के कार्यकत्र्ता हैं, तीन दशकों में निर्मित यादव-मुस्लिम सामाजिक पूंजी है, गैर-यादव अन्य पिछड़ा वर्ग (ओ.बी.सी.) और दलितों का बढ़ता हुआ समर्थन है तथा एक जिला-से-गांव स्तर का ढांचा है जो खराब चुनावी दौर में भी टिका रहता है। इसकी तुलना तृणमूल कांग्रेस या आम आदमी पार्टी से करें जो ‘नेता-समर्थक’ की संरचना पर आधारित हैं, नेता की लोकप्रियता के समय ये दल शक्तिशाली होते हैं लेकिन लोकप्रियता कम होने पर इनकी संरचनात्मक मजबूती खत्म हो जाती है। 

कांग्रेस की राज्य इकाई उसी खामी से ग्रस्त है, जिसका समाधान सपा ने कर लिया है। यह समर्थकों पर आधारित एक खोखली इकाई है, जो मीडिया कवरेज, राहुल गांधी की छिटपुट यात्राओं और क्षणिक ऑनलाइन समर्थन पर निर्भर है तथा इसमें जमीनी स्तर पर ऐसी बुनियादी संरचना का अभाव है, जो मतदान के दिन भावनाओं को वोटों में बदल सके। इसके विपरीत, सपा का कार्यकत्र्ता एक स्थायी संपत्ति है, जो 2027 में चाहे कोई भी जीते, कहीं नहीं जाने वाला, यही स्थायित्व उसकी ताकत है। दूसरा तर्क, जो शायद अधिक निर्णायक है, वह है वोटों का गणित। उत्तर प्रदेश का मुकाबला अब चार-पक्षीय संघर्ष नहीं रह गया, यह भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और सपा के नेतृत्व वाले विपक्ष के बीच एक द्विध्रुवीय संघर्ष में तबदील हो गया है। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का वोट शेयर लगातार घट रहा है और जो थोड़ा-बहुत वोट बचा है, साथ ही जाति आधारित और क्षेत्रीय दलों में बिखरी भाजपा विरोधी भावना, उसका कोई निश्चित ठिकाना नहीं है। यह उस गैर-भाजपा गठबंधन की ओर आकर्षित होता है, जिसके जीतने की सबसे अधिक संभावना होती है। 

दो ध्रुवों वाली चुनावी दौड़ में, ‘भाजपा को छोड़कर कोई भी’ का बचा हुआ वोट समान रूप से नहीं बंटता, यह उस पार्टी के पीछे एकजुट हो जाता है, जिसे असली चुनौती देने वाली पार्टी के रूप में देखा जाता है और उत्तर प्रदेश में यह स्पष्ट रूप से सपा है, कांग्रेस नहीं। कांग्रेस, जो एक दशक से अधिक समय से उत्तर प्रदेश के अधिकांश विधानसभा क्षेत्रों में एकल अंकों में बनी हुई है, औसत विपक्षी मतदाता के लिए इस गणना का हिस्सा नहीं है। वोट बढ़ाने में इसकी क्षमता सीमित है, जबकि सपा की छवि सत्ता-विरोधी वोटों को आकॢषत करती है, जो सीटों का फैसला करती है। तीसरा तर्क कथात्मक स्वामित्व का है। 2027 के उत्तर प्रदेश चुनाव अखिलेश यादव को विपक्ष के चेहरे के रूप में और पी.डी.ए. (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) को संगठनात्मक सामाजिक गठबंधन के रूप में उभार रहे हैं । कांग्रेस के पास उत्तर प्रदेश में पी.डी.ए. की तरह कोई प्रतिस्पर्धी कथा नहीं है, उसका राष्ट्रीय न्याय का ढांचा और भारत जोड़ो से जुड़ा संदेश पी.डी.ए. की तरह उत्तर प्रदेश की विशिष्ट कहानी के रूप में स्थानीयकृत नहीं हो पाया है।

जब एक सांझेदार का दबदबा हो और दूसरा उसमें अपनी जगह बना रहा हो, तो यह सवाल अपने आप हल हो जाता है कि ‘नेतृत्व किसके हाथ में है’। कांग्रेस के लिए एक व्यावहारिक रास्ता यह है कि वह अनुशासित सहायक सांझेदार बनकर पी.डी.ए. गठबंधन को उन सीटों पर मजबूत करे, जहां वह लाभ पहुंचा सकती है, जैसे कि ब्राह्मण बहुल और शहरी क्षेत्र, न कि सीटों के बंटवारे में समानता पर जोर दे। अतिवादी रवैया पहले से ही नाजुक भाजपा विरोधी गठबंधन को और भी कमजोर कर सकता है। 

ऐसा नहीं कि कांग्रेस का कोई योगदान नहीं है, एक राष्ट्रीय पार्टी का प्रतीकात्मक महत्व तो होता ही है। लेकिन उत्तर प्रदेश जैसे विविधतापूर्ण राज्य में यह महत्व बराबर का प्रभाव नहीं होता। सपा के पास कार्यकत्र्ताओं की स्थिरता है, द्विध्रुवीय समीकरण है, जो भाजपा विरोधी बचे हुए वोटों को अपनी ओर खींचता है और यादव और सार्वजनिक वितरण विभाग के माध्यम से राजनीतिक परिदृश्य पर उसका नियंत्रण है। निष्पक्ष विश्लेषण में, यह एक ऐसा गठबंधन है, जिसमें एक सहयोगी अकेले टिक सकता है और दूसरा नहीं तथा यही असंतुलन कांग्रेस के लिए सीटों और गठबंधन में उसकी स्थिति को तय करेगा।

कांग्रेस के लिए सबसे अच्छा विकल्प यही है कि वह समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में चुनाव लड़े और सीटों की मांग बढ़ा-चढ़ाकर न करे, बल्कि यथार्थवादी रखे, यानी सीमित सीटों पर ही संसाधन केंद्रित करे। कम सीटों पर अच्छा प्रदर्शन करने से दो फायदे होंगे-एक तो 2029 के लिए सीट बंटवारे की बातचीत में कांग्रेस की स्थिति मजबूत होगी और दूसरा, पार्टी को मौजूदा विधायकों का एक मजबूत समूह मिलेगा। इस तरह की जमीनी उपस्थिति केंद्रीय नेतृत्व की दृश्यता से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।-सैयद कामरान

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