चाबहार पोर्ट में चीन की एंट्री का डर, ईरान में भारत के दांव पर लगे हैं 1130 करोड़ रुपये, क्या है प्लान-बी

नई दिल्ली: ईरान स्थित रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण चाबहार बंदरगाह ( Chabahar Port ) पर भारत का भविष्य एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। इस पोर्ट में भारत अपने हितों की रक्षा के लिए ईरान के साथ तेजी से बातचीत कर रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि अमेरिका द्वारा दी गई प्रतिबंध छूट रविवार 26 अप्रैल को खत्म होने वाली है। माना जा रहा है कि अमेरिका इस छूट को आगे नहीं बढ़ाएगा।
क्या है भारत का प्लान-बी?
अमेरिकी प्रतिबंधों के जोखिम से बचने के लिए भारत सरकार अपनी कंपनी इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (IPGL) की हिस्सेदारी को अस्थायी रूप से एक स्थानीय ईरानी संस्था को स्थानांतरित करने पर विचार कर रही है। इकनॉमिक टाइम्स के अनुसार बातचीत के तहत एक ऐसा तंत्र बनाने की कोशिश की जा रही है जिसमें पोर्ट का प्रबंधन स्थानीय ईरानी अधिकारियों के पास रहेगा, लेकिन इस गारंटी के साथ कि प्रतिबंध हटने पर परिचालन अधिकार वापस भारत को मिल जाएंगे।
भारत की चिंता का कारण
- मई 2024 में भारत ने इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (IPGL) के जरिए चाबहार पोर्ट के संचालन के लिए ईरान के साथ 10 साल का समझौता किया था। यह भारत का पहला विदेशी पोर्ट प्रबंधन सौदा था।
- भारत अब तक इस परियोजना में लगभग 120 मिलियन डॉलर (करीब 1130 करोड़ रुपये) निवेश कर चुका है। साथ ही संबंधित इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के लिए 250 मिलियन डॉलर की क्रेडिट सुविधा भी दी है।
चीन की एंट्री का खतरा
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर भारत चाबहार से पीछे हटता है, तो चीन इस अवसर का फायदा उठाकर वहां अपनी पकड़ मजबूत कर सकता है। यानी भारत की मौजूदगी कमजोर पड़ने पर चीन चाबहार पोर्ट में भूमिका लेने की कोशिश कर सकता है। अगर ऐसा होता है तो यह भारत के लिए रणनीतिक रूप से नुकसानदेह होगा।
भारत के लिए क्यों अहम है चाबहार?
- अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक भारत की सीधी पहुंच।
- पाकिस्तान को बायपास कर व्यापार मार्ग।
- रूस तक इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) के जरिए कनेक्टिविटी।
- उज्बेकिस्तान, कजाखस्तान और ताजिकिस्तान जैसे देशों के लिए भारतीय बाजार तक पहुंच।
भारत चाहता है अपनी पकड़
भारत अब ईरान से कानूनी गारंटी चाहता है ताकि कोई भी अंतरिम व्यवस्था भविष्य में भारत के अधिकारों को सुरक्षित रख सके। क्षेत्रीय तनाव के कारण बातचीत धीमी जरूर है, लेकिन भारत चाबहार पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए हर संभव विकल्प तलाश रहा है।



