धीरूभाई अंबानी का सबसे बड़ा मलाल: L&T को बनाना चाहते थे अपनी सबसे बड़ी कंपनी, हाथ आकर भी रिलायंस के चंगुल से कैसे निकल गई?

नई दिल्ली| साल 1988 की तपती गर्मियों का मौसम था। देश की सबसे बड़ी इंजीनियरिंग कंपनी अंदरूनी कलह और बिखरे मालिकाना हक से जूझ रही थी। तब कॉरपोरेट जगत के सबसे बड़े बाजीगर धीरूभाई अंबानी की नजर उस पर पड़ी। फिर देखते ही देखते मुकेश अंबानी और अनिल अंबानी कंपनी के बोर्डरूम में दाखिल हुए। फिर एक दिन धीरूभाई अंबानी खुद चेयरमैन (Dhirubhai Ambani L&T Chairman) की कुर्सी पर जा बैठे। लेकिन जो सिर्फ शेयरों की साधारण खरीद लग रही थी, वह रातों-रात सत्ता के गलियारों, सुप्रीम कोर्ट और बोर्डरूम का सबसे खूनी सत्ता-संघर्ष बन गई।
अब सवाल है कि आखिर कौन थी वो कंपनी, जो देश के सबसे बड़े उद्योगपति के हाथ में आकर भी उसकी ना हो सकी? चलिए जानते हैं- एलएंडटी (Larsen and Toubro history) की वो कहानी, जिसका मलाल आज भी अंबानी फैमिली को होता होगा।
40 साल पहले कैसे शुरू हुई थी कहानी?
कहानी शुरू होती है आज से 4 दशक पहले। साल 1986, सर्दियों का मौसम था। तब देश की सबसे बड़ी इंजीनियरिंग लार्सन एंड टुब्रो यानी एलएंडटी (L&T) के टॉप लीडरशिप के बीच जबरदस्त पावर स्ट्रगल चल रहा था। कंपनी के ऐसे कई मामले सामने आने लगे, जिनसे उसकी छवि को नुकसान पहुंच रहा था। उसकी शिपिंग डिविजन में गड़बड़ियों के आरोप थे। कंपनी के फ्लैट को बेहद कम कीमत पर बेचने को लेकर सवाल उठे। वित्तीय मामलों पर भी विवाद होने लगा।
एलएंडटी का भारतीय वित्त मंत्रालय के साथ कर्मचारी स्टॉक ऑप्शन को लेकर विवाद चल रहा था। कंपनी के खातों को लेकर कंपनी लॉ बोर्ड से भी टकराव था। सबसे बड़ी कमजोरी थी- कंपनी अब अपने पुराने मालिकों के सीधे नियंत्रण में नहीं थी।
एलएंडटी के दो विदेशी प्रमोटर थे। पहला- एस टूब्रो और दूसरा- हेनिंग होल्क-लार्सन। ये दोनों ही कई साल पहले भारत छोड़ चुके थे। कंपनी की शेयरहोल्डिंग काफी बिखर चुकी थी। यानी मालिकाना नियंत्रण किसी एक हाथ में नहीं था।
फिर आया साल 1988… तब गर्मियों का मौसम था। तब तक लोग एलएंडटी को आसानी से निशाना बनाए जाने वाली कंपनी मानने लगे थे। उसके मैनेजमेंट और सरकार के बीच कंट्रोवर्सी ने स्थिति और कमजोर कर दी थी। ऐसे समय में जिसके पास सत्ता के गलियारों में समर्थन हो और जिसके पास शेयर खरीदने की ताकत हो, उसके लिए कंपनी पर प्रभाव बढ़ाना आसान हो सकता था।
और यहीं से एंट्री होती- अंबानी परिवार की…
उस समय धीरूभाई अंबानी यानी रिलायंस ग्रुप के लिए एलएंडटी का महत्व सिर्फ एक बड़ी कंपनी खरीदने तक सीमित नहीं था। एलएंडटी भारत की सबसे बड़ी कंस्ट्रक्शन कंपनियों में से एक थी। साल 1988 में उसकी बिक्री करीब 500 करोड़ रुपए थी, जो 1995 तक बढ़कर 3,300 करोड़ रुपए हो गई। कंपनी का ट्रैक रिकॉर्ड मजबूत था और रिलायंस के साथ उसके कारोबार में बड़ा तालमेल बनने की संभावना दिखाई देती थी।
इस बीच, मुकेश अंबानी और अनिल अंबानी ने काम शुरू किया। उन्हें वित्त मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय से समर्थन की मंजूरी मिली। उन्होंने मनु छाबड़िया को पीछे छोड़ा और एलएंडटी के चेयरमैन एनएम निक्की देसाई (NM Nikky Desai) को अपने पक्ष में कर लिया। इसके बाद अंबानी परिवार ने एलएंडटी के शेयरों का एक बड़ा ब्लॉक भी खरीद लिया।
लेकिन यह सिर्फ शुरुआत थी। सितंबर, 1988 में एलएंडटी की एक बोर्ड मीटिंग हुई। उस समय कंपनी करीब 800 करोड़ रुपए के कन्वर्टिबल डिबेंचर इश्यू के बीच थी। चेयरमैन देसाई ने मुकेश अंबानी और एमएल भक्ता (ML Bhakta) को बोर्ड में शामिल करने का प्रस्ताव रखा। दोनों ने निदेशक बनने के लिए जरूरी 100-100 शेयर खरीदे और देसाई का निमंत्रण स्वीकार कर लिया।
कुछ समय बाद मुकेश अंबानी और भक्ता औपचारिक रूप से बोर्ड में शामिल हो गए। 30 दिसंबर 1988 को अनिल अंबानी भी डायरेक्टर बनाए गए। इसके कुछ ही महीनों बाद, 28 अप्रैल 1989 को देसाई के इस्तीफे के बाद धीरूभाई अंबानी एलएंडटी के चेयरमैन बन गए।
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लेकिन करीब एक साल के अंदर कहानी पूरी तरह बदल गई…
अंबानी परिवार के साथ देसाई के रिस्ते बिगड़ने लगे। शुरुआत में उन्होंने सोचा था कि, अंबानी उन्हें एलएंडटी चलाने में मदद देंगे और उनका दखल सिर्फ लंबे समय की रणनीति तक सीमित रहेगा। लेकिन बाद में उन्हें महसूस हुआ कि तस्वीर कुछ और है।
इस बीच वित्त मंत्रालय और कंपनी लॉ बोर्ड ने देसाई और उनकी पत्नी के खिलाफ कारण बताओ नोटिस जारी किए। आरोपों में बाजार कीमत से कम दाम पर फ्लैट खरीदने की अनुमति देना, कुछ संस्थाओं को चंदा देना, पत्नी और बेटी से जुड़े संगठनों को फायदा पहुंचाना और गलत कारोबारी फैसलों से भारी नुकसान जैसे मुद्दे शामिल थे।
देसाई ने इन आरोपों का सामना किया, लेकिन उनके और अंबानियों के बीच दूरी बढ़ती गई।
एलएंडटी में आने के बाद अंबानियों ने यह भी महसूस किया कि कंपनी की मौजूदा मैनेजमेंट शैली रिलायंस के लिए पर्याप्त नहीं थी। सोर्स के मुताबिक, साल 1982 से 1989 के बीच एलएंडटी की रेवेन्यू ग्रोथ 8 फीसदी से घटकर 4 फीसदी रह गई थी। नेटवर्थ पर रिटर्न 22 फीसदी से गिरकर 10 फीसदी और एसेट्स पर रिटर्न 7 फीसदी से घटकर 3 फीसदी हो गया था।
यानी अंबानियों के सामने सवाल था- क्या पुराने मैनेजमेंट के साथ एलएंडटी को वैसे ही चलाया जा सकता है? देसाई को लगा कि अब एलएंडटी उनके हाथ से निकल रही है। उन्होंने अप्रैल 1989 की बोर्ड मीटिंग में इसका विरोध करने की कोशिश की, लेकिन आखिरकार उन्हें पद छोड़ना पड़ा।
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इसके बाद विवाद ने लिया नया मोड़…
साल 1989… अगस्त का महीना था। इंडियन एक्सप्रेस के एस गुरुमूर्ति ने एलएंडटी अधिग्रहण की जांच शुरू की। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या वित्तीय संस्थानों के जरिए एलएंडटी के शेयर खरीदने की व्यवस्था नियमों के मुताबिक थी।
मामला गंभीर था। वो भी इसलिए, क्योंकि एलएंडटी में वित्तीय संस्थानों की बड़ी हिस्सेदारी थी। 1988 में अंबानी परिवार की सैटेलाइट कंपनियों ने करीब 30 करोड़ रुपए एक निवेश कंपनी में जमा किए थे। उस निवेश के जरिए बाद में एलएंडटी के शेयरों की खरीद का रास्ता बना।
जुलाई 1988 में बॉब फिस्कल (BoB Fiscal) ने एलआईसी, जीआईसी (LIC and GIC) और दूसरी वित्तीय संस्थाओं से एलएंडटी के 3.30 लाख शेयर खरीदे। बाद में इन शेयरों की डिलीवरी त्रिशना इन्वेस्टमेंट्स (Trishna Investments L&T) को दी गई। जनवरी 1989 में BoB Fiscal ने एलएंडटी के करीब 3.90 लाख शेयर त्रिशना इन्वेस्टमेंट्स को ट्रांसफर किए।
गुरुमूर्ति ने इंडियन एक्सप्रेस में लगातार आर्टिकल लिखे। और आरोप लगाया कि रिलायंस को एलएंडटी की जरूरत इसलिए थी, क्योंकि उसे अपने पेट्रोकेमिकल प्रोजेक्ट को खड़ा करने के लिए पैसे चाहिए थे। उन्होंने यह भी दावा किया कि रिलायंस पेट्रोकेमिकल्स ने एलएंडटी के जरिए 6 अरब रुपए के डिबेंचर जुटाए और बाद में एलएंडटी ने रिलायंस पेट्रोकेमिकल्स को 6 अरब रुपए का सप्लायर क्रेडिट देने की घोषणा की।
इसके बाद मामला कोर्ट तक पहुंच गया…
सितंबर 1989 में बॉम्बे हाई कोर्ट में एलएंडटी के शेयर इश्यू और अंबानियों की भूमिका को लेकर याचिका दायर हुई। याचिकाकर्ताओं ने बॉब फिस्कल (BoB Fiscal) और त्रिशना से जुड़े लेनदेन में अनियमितताओं का आरोप लगाया। बॉम्बे हाई कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी, लेकिन मामला आगे सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया।
इसी बीच अंबानियों ने शेयर वापस बेचने का प्रस्ताव रखा। शुरुआत में यह नो-प्रॉफिट, नो-लॉस डील होनी थी। वित्त सचिव एस वेंकटरमणन की जगह गोपी अरोड़ा के आने के बाद स्थिति बदली और अंबानियों को करीब 12 करोड़ रुपए का नुकसान स्वीकार करना पड़ा। नवंबर तक लेनदेन वापस हो गया।
लेकिन विवाद खत्म नहीं हुआ। एलएंडटी द्वारा रिलायंस के शेयर खरीदने पर भी सवाल उठे। आरोप लगाया गया कि शेयरधारकों के पैसे से करीब 75 करोड़ रुपए रिलायंस के शेयर खरीदने में लगाए गए, जबकि वे शेयर मूल्य में गिरावट के बाद बेकार निवेश साबित हुए।
अब लड़ाई सिर्फ शेयरों की नहीं रही थी। यह एलएंडटी के बोर्ड पर नियंत्रण की लड़ाई बन चुकी थी।
वकील और पूर्व केंद्रीय मंत्री राम जेठमलानी ने शेयरधारकों को यह फैसला करने की मांग की कि अंबानी परिवार को एलएंडटी के बोर्ड में बने रहना चाहिए या नहीं। सरकार ने भी दखल दिया। दिसंबर 1989 के आम चुनाव में राजीव गांधी की हार और वीपी सिंह के प्रधानमंत्री बनने के बाद राजनीतिक माहौल बदल गया।
जब सरकार ने की अंबानियों को हटाने की तैयारी!
फिर आया साल 1990… मार्च का महीना था। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने का इंतजार न करने का फैसला किया। LIC से एलएंडटी के चार निदेशकों को हटाने के लिए ईजीएम बुलाने को कहा गया। धीरूभाई अंबानी, मुकेश अंबानी, अनिल अंबानी और भक्ता को हटाने की तैयारी हुई।
अंबानी परिवार ने इसका विरोध किया और सरकार पर गैर-लोकतांत्रिक रवैया अपनाने का आरोप लगाया।
आगे जाकर धीरूभाई अंबानी ने अप्रैल 1990 में इस्तीफा दिया और डी एन घोष एलएंडटी के चेयरमैन बने। घोष के बाद भी एलएंडटी पर नियंत्रण को लेकर विवाद खत्म नहीं हुआ। 1991 में एनएम राव चेयरमैन बने, लेकिन अंबानी परिवार के साथ उनका रिश्ता भी जल्द बिगड़ गया।
जब अंबानियों ने की L&T में वापसी की कोशिश…
फिर आया साल 1991…ये नया आर्थिक दौर था। चुनाव के बाद कांग्रेस सत्ता में आई। नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने और मनमोहन सिंह वित्त मंत्री। फिर नई आर्थिक नीति का दौर शुरू हुआ। एलएंडटी के शेयरों पर नियंत्रण की यह लड़ाई भी इसी बदलते भारत के बीच चल रही थी। अंबानी परिवार ने दोबारा एलएंडटी में वापसी की कोशिश की। 1991 में एलएंडटी के बोर्ड की कमान फिर बदलने की कोशिश हुई। देसाई के जाने के बाद, अंबानी बंधुओं ने राव से अपने मतभेद सुलझाए और अप्रैल 1989 में उन्हें मैनेजिंग डायरेक्टर (MD) पद की पेशकश की, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया।
हालांकि, साल 1991 में चेयरमैन बनने के बाद, राव भी सुब्रमण्यम के सुर में सुर मिलाते हुए अंबानी परिवार से दूरी बनाने लगे। राव ने साफ कहा कि,
“हमें न तो अंबानी चाहिए, न छाबड़िया और न ही हिंदुजा या स्वराज पॉल। हम एलएंडटी वाले खुद इस कंपनी को चलाने और इसे नई ऊंचाइयों तक ले जाने में पूरी तरह सक्षम हैं।”
सुब्रमण्यम ने भी इसी बात को दोहराया और कहा कि हमें कंपनी चलाने के लिए किसी बाहरी की जरूरत नहीं है।
मनमोहन सिंह के निष्पक्ष रुख अपनाने और राव व सुब्रमण्यम को हटाने की किसी भी कोशिश में जीत तय न दिखने के कारण, अंबानी परिवार ने समझदारी इसी में समझी कि फिलहाल सब्र से काम लिया जाए।
और अंत में…बेहतर वक्त के इंतजार में रह गया अंबानी परिवार
1994 तक स्थिति फिर बदलती दिखाई दी। अंबानी परिवार के दो प्रमुख विरोधियों के रिटायर होने के बाद बोर्ड में उनके पक्ष में माहौल बनने लगा। 19 सदस्यों वाला एलएंडटी बोर्ड अंबानी परिवार के पक्ष में झुकता हुआ नजर आने लगा। एक स्वतंत्र प्रोफेशनल डीवी कपूर को अंबानी समर्थक माना जाता था। बोर्ड में मुकेश, अनिल और भक्ता के पहले से मौजूद होने के कारण, नंबर गेम में अंबानी गुट के पास 10 सदस्यों की मजबूत ताकत हो गई थी।
अब बस वित्त मंत्रालय की हरी झंडी बाकी थी, जिसे मनमोहन सिंह ने रोक कर रखा। लेकिन यहां तक पहुंचने के बावजूद बात नहीं बन पाई और फिर अंबानी परिवार ने एक बार फिर सही और बेहतर वक्त का इंतजार करने का फैसला किया।
इस पूरे घटनाक्रम को देखें तो धीरूभाई अंबानी एलएंडटी को अपनी सबसे बड़ी कंपनी बनाना चाहते थे। लेकिन बोर्डरूम की लड़ाई और सरकार के दखल से एलएंडटी उनके हाथ से निकल गई।



