मिडिल ईस्ट पर मतभेद के कारण ब्रिक्स की आम सहमति मुश्किल, भारत ने फलस्तीन के पक्ष का किया समर्थन

नई दिल्ली। पिछले हफ्ते मिडिल-ईस्ट पर हुई ब्रिक्स (BRICS) की बैठक में कोई आम सहमति वाला दस्तावेज तैयार नहीं हो सका, क्योंकि इस संघर्ष में शामिल सदस्य देशों के रुख में काफी मतभेद थे।
भारतीय अधिकारियों के अनुसार, बाकी सभी देशों द्वारा इन मतभेदों को दूर करने की कोशिशें कामयाब नहीं हो सकीं। इस साल ब्रिक्स की अध्यक्षता भारत के पास है और वह अगले महीने विदेश मंत्रियों की बैठक की मेजबानी करेगा। इसके बाद इसी साल के अंत में शिखर सम्मेलन होगा।
मिडिल-ईस्ट में संघर्ष को लेकर जताई चिंता
आम सहमति न बन पाने के कारण पिछले हफ्ते विदेश मंत्रियों और विशेष दूतों की बैठक में कोई संयुक्त बयान जारी नहीं हो सका। इसके बजाय ‘अध्यक्ष का बयान’ जारी किया गया, जिसमें कहा गया कि सदस्य देशों ने मिडिल-ईस्ट में हाल ही में हुए संघर्ष पर गहरी चिंता जताई और इस मामले पर अपने विचार और आकलन पेश किए।
चर्चाओं में फलस्तीन का मुद्दा और गाजा की स्थिति शामिल थी, जिसमें मानवीय सहायता पहुंचाना, UNRWA की भूमिका, आतंकवाद के प्रति ‘जीरो-टॉलरेंस’ का रवैया अपनाना और लेबनान में हुए संघर्ष-विराम का स्वागत करना शामिल था।
आम सहमति न बनने का क्या रहा कारण?
जहां एक ओर ईरान, अमेरिका और इजरायल के खिलाफ ब्रिक्स देशों की एकजुटता चाहता रहा है और भारत से आम सहमति बनाने की दिशा में काम करने का आग्रह करता रहा है। वहीं दूसरी ओर संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और सऊदी अरब की मौजूदगी के कारण कोई संयुक्त बयान जारी नहीं हो सका।



