राजनीति

‘जब तक विपक्षी दल किसी एक परिवार की जायदाद रहेंगे, तब तक मोदी को चुनौती देने वाला कोई नहीं’

तवलीन सिंह

पिछले सप्ताह यों ही सोशल मीडिया पर खबरें देख-सुन रही थी कि राहुल गांधी दिखे कोटा में छात्रों को संबोधित करते हुए। अंग्रेजी में उन्होंने अपने उस खास अंदाज में कहा कि वह न राजनीति की बातें करने आए हैं और न ही किसी और चीज की, उनकी इस सभा का मकसद सिर्फ छात्रों की समस्याओं पर बात करने का है। मुझे थोड़ा अजीब लगा कि राजस्थान के इस कोचिंग सेंटर वाले शहर में वह अंग्रेजी में भाषण कर रहे हैं, सो मैंने इस बात को ‘एक्स’ पर कहा, बिना सोचे कि ऐसा करने से एक बवंडर खड़ा होने वाला है।

मेरी इस पोस्ट को कोई पांच लाख लोगों ने पढ़ा, जिसमें से कोई पांच सौ लोगों ने उसे फिर से साझा किया और 700 से अधिक लोगों ने उसको ‘लाइक’ किया, लेकिन साथ में इतने लोगों से गालियां सुननी पड़ीं कि मैं हैरान रह गई। कांग्रेस के समर्थक थे यह सब, जिन्होंने मुझे हर तरह से परेशान करने की कोशिश की और इनमें कई ऐसे थे, जो अक्सर मुझे गालियां देते हैं, जब मैं राहुल गांधी के बारे में कुछ भी कहती हूं।

आलोचकों की भीड़ में कांग्रेस पार्टी के कई पुराने समर्थक थे, जिनकी राजनीति वामपंथी सोच पर आधारित है और इस वामपंथी आर्थिक सोच में घुला हुआ है धर्मनिरपेक्षता पर विश्वास। सच यह है कि मैं वामपंथी आर्थिक सोच का दिल से विरोध करती हूं, लेकिन साथ में मुझे पूरा विश्वास यह भी है कि धर्मनिरपेक्षता के बिना भारत टूट सकता है, एक बार फिर। इस बात को इसलिए कह रही हूं आज कि मेरे जैसे कई लोग हैं, जो कांग्रेस को वोट देते, अगर कांग्रेस का नेतृत्व गांधी परिवार के अलावा कोई और कर रहा होता।

सोनिया गांधी ने अपने बच्चों की खातिर एक ऐसे राजनीतिक दल को बर्बाद किया है, जिसकी इस देश को सख्त जरूरत है। शायद उनके कानों तक यह बात अभी तक पहुंची नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सलाहकार मानते हैं कि जब तक कांग्रेस का नेतृत्व राहुल गांधी करते रहेंगे, तब तक मोदी को कोई नहीं हरा सकेगा। राहुल गांधी ने जब से कांग्रेस की कमान संभाली है, उन्होंने सिर्फ अपनी छवि को चमकाने पर ध्यान दिया है, पार्टी की जड़ों को नए तरीकों से सींचकर मजबूत करने पर नहीं। ऐसा इंदिरा गांधी ने भी नहीं किया था, बावजूद इसके कि उनके दौर में परिवारवाद की नींव रखी गई थी। आपातकाल में भी उनके आसपास कई ताकतवर मुख्यमंत्री थे, जिनकी जिम्मेदारी थी पार्टी को राज्यों में ताकतवर बनाने की।

इस परंपरा को तोड़ा सोनिया गांधी ने, इसलिए कि उनकी एक ही इच्छा थी और वह यह कि उनके बच्चों से ऊंचे कद का कोई नेता सिर उठाने की हिम्मत न दिखाए। ऐसा अक्सर होता है उन राजनीतिक दलों में, जो असली राजनीतिक पार्टी न रहकर किसी परिवार की निजी जायदाद बन जाते हैं। ऐसे राजनीतिक दलों की समस्या यह है कि जब तक सत्ता उनके हाथ में रहती है, तब तक उनका पूरा काबू रहता है पार्टी के नेतृत्व पर, लेकिन जैसे ही सत्ता जाती है, बिखरने लगते हैं सब बारी-बारी।

पिछले दिनों हमने देखा है कि कैसे तृणमूल कांग्रेस बिखरकर टूट गई है ममता बनर्जी के चुनाव हारने के बाद और उससे पहले महाराष्ट्र में शरद पवार जैसे महारथी भी अपनी पार्टी को टूटने से नहीं रोक सके, जब सत्ता उनके हाथों से खिसक गई।

उद्धव ठाकरे की शिवसेना भी इस समय टूटने के कगार पर पहुंच गई है। इस दल के सांसद भी बागी हो गए हैं। उद्धव ठाकरे के प्रवक्ताओं ने दोष साजिशों पर डालने की बहुत कोशिश की, ऐसा कहकर कि सांसदों को 15 करोड़ रुपए में खरीदा जा रहा है, लेकिन अपने गिरेबान में झांककर देखते तो उनको दिखता कि पार्टी को बनाने के लिए कड़ी मेहनत की जो जरूरत है, उनके नेता शहजादे कर नहीं पाते हैं। ऐसे में पार्टी कमजोर होती जाती है।

इन विपक्षी दलों के सामने है नरेंद्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी, जिसकी जड़ें काबिल नेतृत्व के कारण देशभर में फैल गई हैं।

वहीं, कांग्रेस पार्टी में 2014 के बाद बड़े नेता छोड़कर जाते रहे हैं। गांधी परिवार के दरबारी भी छोड़ते गए हैं। अब रह गए हैं सिर्फ ऐसे लोग, जो गांधी परिवार के नाम पर ही चुनाव जीत सकते हैं, अपने नाम पर नहीं। या वे लोग, जिनकी राजनीति चुनाव जीतने पर नहीं, दरबार में खुशामद करने से आगे बढ़ने पर टिकी हुई है। ये लोग कहीं जा नहीं सकते हैं, इसलिए कि किसी दूसरे दल में जाने के रास्ते उनके लिए बंद हैं और लोकसभा चुनाव जीतने की कोई उम्मीद नहीं है।

कड़वा सच यह है कि जब तक विपक्षी दल किसी एक परिवार की जायदाद रहेंगे, तब तक नरेंद्र मोदी को चुनौती देने वाला कोई नहीं है, बावजूद इसके कि देश के युवाओं में अब बेचैनी और मायूसी दिखने लगी है। न सिर्फ प्रश्नपत्र लीक होने की वजह से, बल्कि इस वजह से भी कि अगर परीक्षाओं में पास भी हो जाते हैं खूब मेहनत करने के बाद, तो उनकी मायूसी तब बढ़ती है, जब वे रोजगार ढूंढने निकलते हैं।

इस मायूसी का लाभ फिलहाल मिला है ‘काकरोच जनता पार्टी’ को और कांग्रेस को कम। इसका कारण यह है कि न राहुल गांधी अभी तक अपने 24 घंटे राजनीति को देने के लिए तैयार हैं और न ही उनकी बहन। प्रियंका अच्छे भाषण जरूर दे लेती हैं हिंदी में, लेकिन अभी तक उनमें वह शक्ति नहीं दिखती है, जिसको देखकर कोई कह सके कि आने वाले दिनों में नरेंद्र मोदी को चुनौती दे सकती हैं। सो इन दिनों जब भी मोदी भक्त मिलते हैं मुझे, वे यकीन के साथ कहते हैं कि वर्ष 2029 में भी ‘आएंगे तो मोदी ही।’

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