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अंकित शर्मा हत्याकांड : अदालत के लिए आसान नहीं था फैसला, सबूतों की पड़ताल के लिए घटनास्थल तक पहुंची थी कोर्ट

 नई दिल्ली। उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगे के दौरान आइबी कर्मी अंकित शर्मा हत्याकांड में गवाहों और सुबूतों के बीच उलझी गुत्थी को सुलझाना अदालत के लिए आसान नहीं था। वकीलों की जिरह के बीच पेच फंसा तो न्याय की कसौटी पर सुबूतों और गवाहों को कसने के लिए अदालत ने खुद उस स्थान पर पहुंची, जहां आइबी कर्मी की हत्या की गई थी।

यहां अदालत के सामने ही दोनों पक्षों की मौजूदगी में सीन-रीक्रिएशन किया गया, ताकि बचाव पक्ष और अभियोजन पक्ष के दावों की हकीकत को धरातल पर जांचा जा सके। कानून के जानकारों की मानें तो न्याय प्रक्रिया के इतिहास में शायद यह पहली घटना है, जिसमें सुबूतों और गवाहों की सच्चाई जानने के लिए कोर्ट खुद घटनास्थल पर पहुंची।

सुनवाई के दौरान आए कई मोड़

विशेष लोक अभियोजक मधुकर पांडेय ने दैनिक जागरण के साथ विशेष बातचीत में बताया कि केस की सुनवाई के दौरान कई मोड़ आए। पहला मोड़ तब आया जब अंकित के पिता रविंदर शर्मा ने कोर्ट में कहा कि एफआइआर पर किए गए हस्ताक्षर उनके नहीं हैं।

वह हिंदी में हस्ताक्षर करते हैं, जबकि एफआइआर में अंग्रेजी में हस्ताक्षर हैं। अंकित के पिता के बयान को बचाव पक्ष ने उनके खिलाफ ही प्रयोग किया। हालांकि, उन्हें इसका ज्यादा लाभ नहीं मिला।

उन्होंने बताया कि अदालत के सामने असमंजस की स्थिति तब पैदा हुई, जब गवाही के दौरान बचाव पक्ष ने संदेह पैदा करने का काम किया। बचाव पक्ष ने कहा कि चांदबाग पुलिया सड़क से काफी ऊंची है, ऐसे में गवाह जहां खड़े थे।

वहां से ताहिर व अन्य आरोपितों को देख ही नहीं सकते। इसके साथ ही कई अन्य तीखे सवाल दागे, ताकि बचाव पक्ष को संदेह का लाभ मिल सके।

सीन रिक्रिएशन और फोटोग्राफी कर फैसले पर पहुंची अदालत

इसके बाद अभियोजन पक्ष ने अदालत से संदेह का मिटाने के लिए घटनास्थल का निरीक्षण करने का आग्रह किया। इस पर करीब तीन माह पहले न्यायाधीश, लोक अभियोजकों की टीम, बचाव पक्ष के वकील, सभी आरोपित अन्य घटनास्थल पर पहुंचे।

अदालत के सामने गवाहों और सुबूतों के आधार पर सीन रिक्रिशन कर वीडियो और फोटोग्राफी की गई। जिसका बारीकी से अध्ययन करने के बाद अदालत इस फैसले तक पहुंची।

लोक अभियोजक मधुकर पांडेय व वरिष्ठ अधिवक्ता मनीष भदौरिया ने बताया की केस की सुनवाई के दौरान अदालत कोई भी कदम उठा सकती गई। अदालत घटनास्थल का निरीक्षण भी करवाती है। लेकिन, दिल्ली दंगा के मामले में इस तरह का कदम अपने आप में ऐतिहासिक है।

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