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30 साल पुराने राष्ट्रपति भवन फर्जीवाड़ा केस के सभी आरोपी बरी, कोर्ट ने कहा- सबूत नहीं

दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने देश के सबसे पुराने लंबित आपराधिक मामलों में से एक में बड़ा फैसला सुनाते हुए सभी जीवित आरोपियों को बरी कर दिया. यह मामला राष्ट्रपति भवन के दस्तावेजों में कथित हेरफेर और फर्जी एंट्री से जुड़ा था. जिसकी जांच करीब तीन दशक पहले शुरू हुई थी. एडिशनल ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ज्योति महेश्वरी ने मोहन लाल जाटिया, अशोक जाटिया और अशोक जैन को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया.

इन पर आपराधिक साजिश, फर्जी दस्तावेज बनाने और सबूतों में हेरफेर जैसे गंभीर आरोप लगे थे. इस मामले में दो अन्य आरोपी मिलाप चंद जगोत्रा और गुरचरण सिंह की सुनवाई के दौरान ही मौत हो चुकी थी. इसलिए उनके खिलाफ कार्यवाही पहले ही खत्म कर दी गई थी.

यह था पूरा मामला

यह मामला साल 1986 से जुड़ा है, जब मोहन लाल जाटिया को COFEPOSA कानून के तहत हिरासत में लिया गया था. जाटिया ने अपनी गिरफ्तारी को चुनौती देते हुए कोर्ट में कहा था कि उन्होंने राष्ट्रपति को एक आवेदन भेजा था लेकिन उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई. यहीं से पूरे मामले में शक पैदा हुआ. आरोप लगा कि राष्ट्रपति सचिवालय के रिकॉर्ड में फर्जी तरीके से एंट्री डालकर यह दिखाने की कोशिश की गई कि आवेदन पहुंचा था. इस पर मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और साल 1994 में सुप्रीम कोर्ट ने CBI को इस पूरे मामले की जांच का आदेश दिया.

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क्या थे जांच और आरोप

CBI और अभियोजन पक्ष का कहना था कि राष्ट्रपति सचिवालय के डाक रजिस्टर में जो एंट्री दिखाई गई, वह बाद में डाली गई थी और असली नहीं थी. कुछ गवाहों ने भी कहा कि एंट्री संदिग्ध लगती है और फर्जी हो सकती है. फॉरेंसिक रिपोर्ट भी पेश की गई थी.

कोर्ट ने क्यों किया बरी

कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि पूरा मामला सिर्फ शक और अनुमान पर आधारित था, पुख्ता सबूत नहीं थे. कोर्ट ने कहा कि अभियोजन यह साबित नहीं कर पाया कि आरोपियों ने सच में कोई फर्जीवाड़ा किया या साजिश रची. कोर्ट ने यह भी कहा कि यह साबित ही नहीं हो पाया कि राष्ट्रपति को आवेदन भेजा गया था या नहीं. ऐसे में यह आरोप भी साबित नहीं होता कि आरोपियों ने गलत जानकारी दी.

लंबी सुनवाई पर भी हुई टिप्पणी

कोर्ट ने इस बात पर भी चिंता जताई कि मामला बहुत ज्यादा लंबा चला. जज ने कहा कि अगर ट्रायल जल्दी पूरा हो जाता तो शायद और सबूत सामने आते और सच्चाई साफ हो पाती. कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों के आधार पर आरोपियों के खिलाफ अपराध साबित नहीं होता. इसलिए उन्हें संदेह का लाभ देते हुए बरी किया जाता है.

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