युवा शक्ति की हिंसा व पुलिस एवं प्रशासन की सक्रियता

देश को सशक्त व समृद्ध बनाने में युवाओं की भूमिका सबसे अधिक महत्वपूर्ण होती है। छात्र ही देश का भविष्य और उसकी रीढ़ होते हैं। विद्यार्थियों के लिए परीक्षा केवल 2 घंटे के लिए नहीं, बल्कि वर्षों की तैयारी तथा बेहतर जीवन बनाने के लिए सपनों से भरी होती है। ऐसे में जब कोई पेपर लीक हो जाता है, तब उनका विश्वास डगमगाने लगता है तथा व्यवस्था के स्वरूप उन्हें हिंसक गतिविधियां करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। छात्रों द्वारा विरोध करने के कई कारण होते हैं, जैसा कि बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, भ्रष्ट शिक्षा प्रणाली। भारत में 1974 का बिहार आंदोलन और गुजरात का नव निर्माण आंदोलन इसके बड़े उदाहरण हैं, जिन्होंने देश की राजनीति को बदल दिया था।
आमतौर पर पाया गया है कि सरकार के विभिन्न विभागों द्वारा जो इक्का-दुक्का नौकरियां निकलती रहती हैं, वहां पर राजनीतिज्ञ अपने रिश्तेदारों को चोर दरवाजे से ही तैनात कर लेते हैं तथा मैरिट को नजरअंदाज कर दिया जाता है। राजनीतिज्ञ अपने लोगों को नौकरी देने के लिए कई प्रकार के विकल्प, जैसा कि आऊटसोर्स व कॉन्ट्रैक्ट इत्यादि अपना कर योग्य विद्यार्थियों को अपने अधिकार से वंचित करते रहते हैं। ऐसे में युवाओं के पास आंदोलन के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं रहता। ऐसी परिस्थितियों में छात्रों को सहयोग के लिए असामाजिक तत्व व राजनीतिज्ञ आगे आ जाते हैं तथा देश में अस्थिरता की स्थिति उत्पन्न करने लग जाते हैं। हाल ही में जंतर-मंतर दिल्ली में हुए हिंसक आंदोलन की आरंभिक जांच में पाया गया कि पाकिस्तान की आई.एस.आई. द्वारा कुछ असामाजिक तत्वों को इस्तेमाल किया गया तथा अवांछित तत्वों को आर्थिक सहायता पहुंचाई गई और देश को नेपाल, श्रीलंका व बंगलादेश बना देंगे जैसे नारे लगवाए गए। इसके अतिरिक्त आगजनी की घटनाओं को अंजाम दिया गया तथा पुलिस वालों पर पत्थर फैंक कर उन्हें जख्मी किया गया।
अत: प्रश्न उठता है कि ऐसे ङ्क्षहसक उपद्रवों की स्थिति से निपटने के लिए पुलिस को मूकदर्शक बनकर तमाशा देखते रहना चाहिए या विभाग द्वारा दी गई शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए ऐसे लोगों के साथ सख्ती से निपटना चाहिए। यह सच है कि यदि इनसे सख्ती से नहीं निपटा गया तो ये लोग कश्मीर जैसे हालात पैदा करते हुए देश में शांति भंग कर देंगे। छात्र-छात्राओं की हिंसक भीड़ को नियंत्रण में रखने के लिए पुलिस व प्रशासन को निम्नलिखित सावधानियां बरतनी चाहिएं।
1. समय रहते ही संवेदनशील क्षेत्र में भारतीय सुरक्षा संहिता की धारा 163 को लागू कर देना चाहिए, ताकि उस क्षेत्र में अधिक लोग इकट्ठे न हो सकें। छात्र नेताओं से शांतिपूर्ण संवाद करना तथा उन्हें कानून के बारे में अवगत करवाना चाहिए।
2. पर्याप्त बल तैनात करना चाहिए तथा प्रत्येक पुलिस जवान पूर्ण रूप से सुसज्जित करना चाहिए।
3. पुलिस बल की ब्रीफिंग वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा की जानी चाहिए तथा बल प्रयोग करने के आदेश साफ शब्दों में देने चाहिएं।
4. मैजिस्ट्रेट साहिबानों को मौके पर साथ आना चाहिए तथा उनके आदेशों के अंतर्गत ही कार्रवाई होनी चाहिए।
5. प्रैस व सोशल मीडिया की ब्रीफिंग भी की जानी चाहिए, क्योंकि कई बार उन्हें पुलिस बल इस्तेमाल करने वाली शक्तियों के बारे में ज्ञान नहीं होता तथा वह एकतरफा भोंपू ही बजाते रहते हैं।
6. खुफिया एजैंसियों को सतर्कता के साथ काम करना चाहिए तथा असामाजिक तत्वों की निवारक गिरफ्तारी कर लेनी चाहिए।
7. उग्र भीड़ की वीडियोग्राफी की जानी चाहिए, जिसे सार्वजनिक तौर पर प्रकाशित करना चाहिए ताकि आम लोगों को भीड़ पर की गई कार्रवाई का सही-सही संदेश मिल सके।
8. पैलेट गन इत्यादि का इस्तेमाल बहुत ही संयम व सतर्कता के साथ करना चाहिए तथा इसके इस्तेमाल से पहले भीड़ तंत्र को अवगत करवा देना चाहिए।
9. छात्र/युवा वर्ग किन कारणों से असंतुष्ट है, उनका समय रहते विश्लेषण कर लेना चाहिए तथा सिस्टम को सुचारू रूप से चलाने के लिए दोषी अधिकारियों व कर्मचारियों के विरुद्ध तुरन्त कार्रवाई होनी चाहिए।
यह ठीक है कि मोदी सरकार ने तृतीय क्लास के कर्मचारियों की भर्ती के लिए किए जाने वाले इंटरव्यू/साक्षात्कार को समाप्त कर दिया है, क्योंकि राजनीतिज्ञ व अधिकारी इसी के माध्यम से अपने चहेतों के अंक बढ़ाकर उन्हें योग्य उम्मीदवारों से ऊपर रखकर नौकरियां दे दिया करते थे। मगर प्रथम व द्वितीय क्लास के अधिकारियों के लिए अब भी साक्षात्कार अनिवार्य है तथा इतने अधिक अंक रख दिए जाते हैं कि इसमें होने वाली हेराफेरी से इंकार नहीं किया जा सकता। उदाहरण के तौर पर यू.पी.एस.सी. द्वारा लिए जाने वाले साक्षात्कार के लिए 275 अंक रखे गए हैं, तो क्या मुमकिन नहीं है कि इसमें हेराफेरी न होती होगी। किसी उम्मीदवार को दिए जाने वाले अंकों का कोई डिजिटल पैमाना निर्धारित नहीं किया जा सकता तथा साक्षात्कार के लिए 100 अंकों से अधिक अंक नहीं रखने चाहिएं। इस पर सरकार को उचित ध्यान देना चाहिए।
युवाओं के दुख-दर्द को समझना अति आवश्यक है। अत्यधिक पढ़ाई करने के बाद भी उन्हें नौकरियां नहीं मिलतीं तथा परिणामस्वरूप उन्हें या तो विदेशों में जाने के लिए मजबूर होना पड़ता है या फिर कई बार वे नशे इत्यादि के शिकार होकर अपना जीवन नष्ट कर लेते हैं। यह भी सच है कि जिस विद्यार्थी ने अपनी स्नातक तक की पढ़ाई आर्ट्स विषयों में ही की हो, उसे नौकरी कहां मिलेगी। इस सम्बंध में शिक्षा प्रणाली में सुधार लाया जाना अति आवश्यक है ताकि सभी छात्रों को रोजगार प्राप्ति के उचित अवसर मिल सकें।-राजेन्द्र मोहन शर्मा
डी.आई.जी. (रिटायर्ड)



