संपादकीय

जम्मू में आतंकी हमले

कश्मीर के जम्मू क्षेत्र में अचानक बढ़े आतंकी हमलों को मोदी सरकार के शपथ-ग्रहण से जोडऩा बेमानी है, लेकिन रियासी इलाके में तीर्थयात्रियों पर हमला किया गया, जिसमें 9 लोग मारे गए और कई घायल हुए। उसके बाद कठुआ और डोडा में आतंकी हमले किए गए। बेशक कठुआ वाले आतंकी ढेर कर दिए गए, लेकिन सीआरपीएफ का एक जवान भी ‘शहीद’ हुआ। डोडा में मंगलवार, 11 जून की रात्रि में असम राइफल्स और स्पेशल पुलिस ऑफिसर की साझा चौकी पर भी हमला किया गया, जिसमें 6 जवान घायल हो गए। जम्मू क्षेत्र के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक आनंद जैन के मुताबिक, पाकिस्तान जम्मू के माहौल को बिगाड़ कर धार्मिक यात्राओं में बाधा डालना चाहता है। अगले महीनों में जम्मू-कश्मीर विधानसभा के चुनाव होने हैं, लिहाजा आतंकी घुसपैठ कर रहे हैं। पाकिस्तान की ओर जाने वाला कोई अनधिकृत रास्ता है, जिसका इस्तेमाल आतंकी कर रहे हैं और हमारे सैन्य बल की गिरफ्त से बचे हुए हैं। अब भी 3-4 आतंकी डोडा के पास, एक समूह में, घूम रहे हैं। उन्हें जल्द ही ढेर कर दिया जाएगा। अचानक आतंकी हमले बढऩे के मद्देनजर कुछ सवाल सटीक और गंभीर हैं। क्या पाकपरस्त आतंकवाद कश्मीर घाटी से जम्मू के राजौरी, पुंछ, डोडा आदि क्षेत्रों में शिफ्ट हो गया है? क्या वहां के घने जंगल आतंकियों की पनाहगाह हैं और वहां की पर्याप्त खुफिया सूचनाएं नहीं मिल पा रही हैं? क्या भारत में तीसरी बार मोदी सरकार बनने से पाकिस्तान, खुफिया एजेंसी आईएसआई और आतंकवादी गुट बौखलाहट में हैं?

क्या पाकिस्तान को भारत की ओर से किसी मारक, प्रहारक हमले का डर, खौफ है? क्या मोदी सरकार आतंकी अड्डों को नेस्तनाबूद करने के लिए भी कोई सैन्य हमला करवा सकती है? क्या लोकसभा चुनावों में 50 फीसदी से अधिक मतदान इसलिए किया गया, क्योंकि औसत कश्मीरी का लोकतंत्र में विश्वास है? क्या पर्यटन और कारोबार बढऩे से भी पाकपरस्त आतंकवादी नाराज हंै, लिहाजा बदले के तौर पर हमले कर रहे हैं? बहरहाल इन सवालों के जवाब खुद-ब-खुद सामने आते रहेंगे। यह ठोस हकीकत है कि बीते एक साल के दौरान राजौरी-पुंछ क्षेत्र में करीब एक दर्जन मुठभेड़ें हुई हैं, जिनमें 25 से अधिक आतंकी मारे गए, लेकिन सुरक्षा बलों के 20 से ज्यादा जवान भी ‘शहीद’ हुए हैं। शहादत का यह सिलसिला अभी जारी रहेगा, क्योंकि आतंकी गतिविधियों की जानकारी देने वाला मजबूत खुफिया नेटवर्क अभी तैयार किया जा रहा है। राजौरी-पुंछ में घुसपैठिया आतंकियों को ‘स्थानीय मदद’ है, जिसे चिह्नित कर लिया गया है। हालांकि जम्मू में कोई ‘स्थानीय आतंकवादी’ नहीं है। यहां पाकिस्तान से आए आतंकी ही हमले कर रहे हैं। कठुआ का उदाहरण है कि आतंकियों को स्थानीय लोगों ने पीने को पानी तक नहीं दिया और पुलिस को सूचना दे दी। नतीजतन आतंकी पकड़े और ढेर कर दिए गए। दरअसल अब आतंकी हमले उन इलाकों में हुए हैं, जहां कुछ साल पहले तक मान लिया गया था कि आतंकवाद का लगभग सफाया हो चुका है। यहां बीते 15-20 सालों के दौरान कोई बड़ा आतंकी हमला नहीं किया गया था, लेकिन बीते कुछ अंतराल में आतंकवादी दिखने लगे थे। वे ही हमले कर रहे हैं। बेशक 2019 में जम्मू-कश्मीर को लेकर संविधान में सुधार किए गए थे, उनसे स्थिति बेहतर हुई, आतंकवाद से जुड़ी आर्थिक गतिविधियों पर लगाम लगाई गई, लेकिन समस्याएं आज भी मौजूद हैं।कश्मीर में अलगाववाद और विभाजनकारी सोच आज भी बरकरार है। यह मानसिकता इसलिए खत्म नहीं हो सकी है, क्योंकि अनिवार्य राजनीतिक विकल्प देने में हमारी व्यवस्था नाकाम रही है। बहरहाल जम्मू-कश्मीर में आज वह आतंकवाद नहीं है, जो 12-15 साल पहले होता था। साल में सैकड़ों आतंकवादी घटनाएं होती थीं। आज कश्मीर में तो आतंकवाद नगण्य ही है, पत्थरबाज गायब हैं, अलगाववादी नेताओं के आह्वान अब कोई नहीं मानता। जम्मू और कश्मीर के खूबसूरत इलाके 24 घंटे खुले हैं। पाकिस्तान से घुसपैठ बेहद सीमित है। उसके लिए भी सेना-सुरक्षा बलों को रणनीति में बदल करना पड़ेगा। बेशक हालात कैसे भी हों, लेकिन विधानसभा चुनाव स्थगित नहीं किए जाने चाहिए। यदि चुनाव हो भी जाते हैं, तो सियासी विकल्पहीनता की स्थिति में पुराने नेता ही सत्ता में नहीं लौटने चाहिए। यह जनता को तय करना होगा। बहरहाल केंद्र में नई सरकार आई है, उसने आतंकवाद को खत्म करने का संकल्प दोहराया है।

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