राजनीति, आंदोलन और ‘जेन-जी’: क्या युवा वर्ग अब परंपरागत राजनीतिक दलों की भाषा से दूर हो चुका है?

Sudhir Pachauri News: एक सूखी-सी खबर। शरद पवार की प्रधानमंत्री से मुलाकात…। दूसरी सूखी-सी खबर- अकाली नेता सुखबीर सिंह बादल की प्रधानमंत्री से मुलाकात। क्यों मिले? क्या बात हुई? सब रहस्य। फिर फुकेट से दिल्ली आते एअर इंडिया के एक यात्री विमान के अचानक तीन सौ फुट नीचे तक गुलाटी मारने और कई यात्रियों के घायल होने की खबर। इसके बाद दो-दो ‘डोप टेस्ट’ में पायलट के गांजा फूंकने की पुष्टि… जांच के आदेश। इसके बाद एक दिन तमिलनाडु ने केंद्र को एक झटका-सा दे दिया कि ‘तमिल एंथम’ पहले गाया जाए, फिर राष्ट्रगान और इसके बाद ‘वंदे मातरम्’ गाया जाए।
झारखंड में ‘परीक्षा सुधार’ पर आंदोलन के बीस दिन। इस दौरान छात्र अहिंसक रहे और रोज पिटे। छह सौ गिरफ्तार हुए, मामले भी बने। भाजपा ने समर्थन में बंद रखा, लेकिन बाकी से मिला सिर्फ सिद्धांत कथन कि हम किसी पर भी हिंसा का समर्थन नहीं करते। केंद्र ने मांगें मानीं, लेकिन झारखंड के छात्रों की सीबीआइ की जांच की मांग किसने मानी?
अपना-अपना आंदोलन, अपना-अपना समर्थन! एक कानूनी प्रवक्ता कहिन कि आप ‘जेन-जी’ से अपना ‘नेरेटिव’ चलवा कर भारत को नष्ट तो कर सकते हैं, लेकिन आप नहीं जानते कि जेन जी के पीछे कौन खड़ा है! वे किसका ‘नेरेटिव’ चला रहे हैं! यह ‘केरलम’ का ‘जनतंत्र’ है कि एक शिक्षक ने प्रश्नोत्तरी में पूछ लिया कि अंग्रेजों के शासन में जेल की सबसे ज्यादा लंबी सजा किसे मिली? इतने पर ही उस शिक्षक को निलंबित कर दिया गया।
एक चैनल पर चर्चा में ‘पोस्ट माडर्न जेन जी’ का एक विखंडन-सा आया। सवाल रहे कि 22 करोड़ से अधिक की ‘जेन जी जनता’ कौन है? उनका क्या एजंडा है? एक ज्ञानी कहिन कि युवा वोटर अब स्थिर हो चुका है। ये शिक्षित हैं, डिजिटल हैं, आकांक्षी हैं। एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं। दक्षिण एशिया में ये सत्ताएं बदल रहे हैं। राजनीतिक दल उनकी भाषा नहीं समझते।
दूसरी ज्ञानी कहिन- ये बेरोजगार हैं और सर्वत्र हैं। ये कह रहे हैं कि हमें शिक्षा का अधिकार दो। यह ‘मोहभंग’ की स्थिति में हैं। ये पिछड़ जाने से डरते हैं। भारत में वैसी विद्रोह की स्थिति तुरंत नहीं बन सकती। सबको रोजगार कोई नहीं दे सकता। तीसरा चुनावी ज्ञानी कहिन कि जेन जी में गहरा असंतोष है। चौथा ज्ञानी कहिन, सच है, 2024 में भाजपा को चार फीसद वोट कम मिला, उसे बहुमत नहीं मिला।
दूसरी ओर एक सवाल हुआ कि क्या ये हमेशा विरोधी रहने वाले हैं? जवाब में एक कहिन कि भारत की सबसे बड़ी युवा जनसंख्या का कथित ‘लाभ’ अब एक ‘चुनौती’ बनता जा रहा है। इनमें सत्तर फीसद बेरोजगार ‘एंग्री यंग मैन’ हैं। एक ज्ञानी कहिन कि 2014 में इनको मोदी ने सपने दिए, अब वही मोहभंग की स्थिति में है। ‘आइटी’ में गिरावट काफी नुकसानदेह है। फिर एक कहिन कि ये ‘इंस्टाग्रामी’ हैं। यह पीढ़ी एक-दूसरे की नकल करती है। लोग मुफ्त राशन ले रहे हैं, लेकिन वोट विरोध में दे रहे हैं… लेकिन इनको कोई पूरी तरह संतुष्ट नहीं कर सकता…।
मानसून सत्र विपक्ष के सतत विरोध में बहा… अंतिम दिन एक मिनट ‘वंदेमातरम्’ हुआ। फिर सदन अनिश्चित काल के लिए स्थगित हो गया। संसद में हर दिन विपक्ष का शोर हावी रहा। पोस्टर दिखते रहे, नारे लगते रहे। लोकसभा अध्यक्ष लाख कहें कि सरकार हर मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार है, आप चर्चा होने दें, लेकिन विपक्ष मानें तब न..! संसद की बहस भंग कर विपक्षी दल संसद के मकर द्वार के आगे हर रोज प्रदर्शन करते। एक-दो बार सत्ता दल ने भी विरोध में प्रदर्शन किया।
सत्ता पक्ष का आरोप रहा कि विपक्ष के नेता हर रोज मुद्दा बदलते रहे। गोल पोस्ट बदलते रहे। पहले कहा कि शिक्षामंत्री हटाए जाएं, जब वे हटा दिए गए, तो मांग करने लगे कि गृहमंत्री ने ‘पैलेट गन’ चलवाई, तो जिम्मेदार हुए और उनके अनजाने में चली तो ‘अक्षम’ हुए। दोनों ही स्थितियों में इस्तीफा बनता है, सो वे इस्तीफा दें। फिर संसदीय मंत्री ने बताया कि गृहमंत्री सदन में बयान देने पर सहमत हो गए हैं और चर्चा होगी।
अगले दिन संसदीय मंत्री ने कहा कि विपक्ष के नेता ने फिर गोल पोस्ट बदल दी है। वे हमेशा गोल पोस्ट बदल देते हैं। चर्चा नियमों से होती हैं, वे नहीं होने देते। बताइए सत्ता पक्ष क्या करे! अंत में मकर द्वार पर एक ‘नुक्कड़ नाटक’ छाप नारा लगा।
फिर शाम को विपक्ष के नेता ने एक मंच से कहा, पता नहीं इनके दिमाग में कहां से घुस गया कि विदेश नीति का यह मतलब है… फिर नेता, एक अन्य नेता की ओर दोनों हाथों को फैला कर बढ़ते हैं और झप्पी लेते हैं..। वे नेता तुरंत एक टिप्पणी करते दिखते हैं कि ‘कहीं आपने मेलोनी समझ कर तो नहीं पकड़ा!’ विपक्ष के नेता का बोलना जारी रहता है, सरकार लोगों को सुनना नहीं चाह रही…। हम इनको पागल कर देंगे। वह सो नहीं पाता होगा…। सत्ता पक्ष बिसूरता रहा कि ये कौन-सी भाषा है?
बहुस्तरीय गठबंधन अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को प्रभावित करने की क्षमता तो रखते हैं, लेकिन उनका प्रभाव तभी दीर्घकालीन होता है, जब उनके पीछे साझा रणनीतिक दृष्टि, पारदर्शिता, प्रतिबद्धता और स्थायी हित हों। केवल तात्कालिक स्वार्थों पर आधारित गठबंधन अक्सर बदलती परिस्थितियों के साथ कमजोर पड़ जाते हैं।-सुधीश पचौरी



