जगतार सिंह हवारा : पंजाब को चुनावी फायदे से पहले सुरक्षा को प्राथमिकता देनी चाहिए

पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने जगतार सिंह हवारा के लिए 10 दिनों की पैरोल की सिफारिश की है, ताकि यह दोषी अपनी गंभीर रूप से बीमार 81 वर्षीय मां से मिल सके। उनकी स्थिति स्वाभाविक रूप से दया की भावना जगाती है। फिर भी, एक मानवीय मुलाकात का प्रबंध करना और एक सजायाफ्ता आतंकवादी को सामान्य पैरोल पर रिहा करना, दो पूरी तरह से अलग बातें हैं। हवारा कोई सामान्य उम्रकैद का दोषी नहीं है। उसके रिकॉर्ड में एक सावधानीपूर्वक नियोजित आत्मघाती बम विस्फोट साजिश में भागीदारी, बब्बर खालसा इंटरनैशनल के साथ नेतृत्वकारी संबंध, हिरासत से भागने के बार-बार प्रयास, एक सफल उच्च-सुरक्षा जेल ब्रेक और लगभग 18 महीने भूमिगत (फरार) रहना शामिल है। कोई भी निर्णय कानून और एक अद्यतन बहु-एजैंसी सुरक्षा मूल्यांकन पर आधारित होना चाहिए, न कि चुनावी गणनाओं, राजनीतिक दबाव या समर्थकों के आश्वासनों पर।
जगतार सिंह हवारा, जिसकी उम्र अब 55 वर्ष है, बब्बर खालसा इंटरनैशनल से जुड़ा एक वरिष्ठ सदस्य है। वह पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या में अपनी भूमिका के लिए आजीवन कारावास की सजा काट रहा है। 31 अगस्त, 1995 को, पंजाब पुलिस का सिपाही दिलावर सिंह विस्फोटक बैल्ट पहनकर पंजाब एवं हरियाणा नागरिक सचिवालय में दाखिल हुआ और खुद को उड़ा लिया। इस हमले में बेअंत सिंह और सुरक्षाकर्मियों व सरकारी कर्मचारियों सहित 16 अन्य लोगों की मौत हो गई, कई अन्य घायल हो गए।
हवारा को केवल किसी चरमपंथी संगठन की सदस्यता या अलगाववादी विचार व्यक्त करने के लिए दोषी नहीं ठहराया गया था। अदालतों ने उसे उस साजिश का हिस्सा पाया, जिसने विस्फोटक हासिल किए, आत्मघाती हमलावर को तैयार किया, लक्ष्य का सर्वेक्षण किया और इस ऑपरेशन का आयोजन किया। यह हत्या कोई जल्दबाजी में उठाया गया कदम नहीं था। साजिशकत्र्ताओं ने आर.डी.एक्स., बिजली के उपकरण और रिमोट-कंट्रोल डिवाइस हासिल किए। उन्होंने दिलावर सिंह द्वारा पहनी गई विस्फोटक बैल्ट तैयार की। एक एंबैसडर कार खरीदी गई और उसे आधिकारिक वाहन जैसा दिखने के लिए संशोधित किया गया, ताकि हमलावर बिना किसी संदेह के सचिवालय परिसर में प्रवेश कर सकें। समूह के सदस्यों ने बार-बार बेअंत सिंह की गतिविधियों और सुरक्षा व्यवस्था का जायजा (रेकी) लिया।
हवारा, तारा और परमजीत सिंह भियोरा मुकद्दमे का सामना करते समय चंडीगढ़ की उच्च-सुरक्षा वाली बुड़ैल जेल में बंद थे। 21-22 जनवरी, 2004 की रात को, हवारा, तारा, भियोरा और हत्या के आरोपी देवी सिंह अपनी बैरक से खोदी गई एक सुरंग के जरिए भाग निकले, यह सुरंग लगभग 94 से 104 फुट लंबी थी। इसे खोदने के लिए महीनों की तैयारी, औजारों, मिट्टी को छिपाने और सुरक्षा खामियों के व्यवस्थित इस्तेमाल की आवश्यकता थी। भागने के बाद हवारा ने आत्मसमर्पण नहीं किया। वह लगभग 18 महीने तक भूमिगत रहा, अलग-अलग जगहों पर गया, फर्जी पहचान का इस्तेमाल किया और अपने संपर्कों को फिर से स्थापित किया। जब दिल्ली पुलिस ने 2005 में उसे और उसके साथियों को गिरफ्तार किया, तो उन्होंने पिस्टल, 200 से अधिक कारतूस, एक हैंड ग्रेनेड, टाइमर, डेटोनेटर और लगभग 11 किलो आर.डी.एक्स. बरामद करने की बात कही। 31 जुलाई, 2007 को चंडीगढ़ की एक ट्रायल कोर्ट ने हवारा को दोषी ठहराया और मौत की सजा सुनाई। 12 अक्तूबर, 2010 को पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने दोषसिद्धि को बरकरार रखा लेकिन सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया। पंजाब के हालिया इतिहास के सबसे गंभीर आतंकवादी हमलों में से एक में भागीदारी के लिए हवारा आजीवन कारावास का दोषी बना हुआ है।
55 वर्ष की आयु में, हवारा (और लगभग 51 वर्ष की आयु में तारा) को दूसरों को प्रभावित करने, भर्ती करने या निर्देशित करने के लिए बहुत बूढ़ा मानकर खारिज नहीं किया जा सकता। एक अनुभवी उग्रवादी को खतरनाक बने रहने के लिए खुद बम लगाने की जरूरत नहीं होती। ऐसा व्यक्ति वैचारिक वैधता प्रदान कर सकता है, संवेदनशील रंगरूटों की पहचान कर सकता है, पुराने संपर्कों को पुनर्जीवित कर सकता है, गुटों में सामंजस्य स्थापित कर सकता है और स्थानीय समर्थकों को विदेशी आकाओं से जोड़ सकता है। अनुभव, प्रतिष्ठा और प्रतीकात्मक अधिकार उम्र के साथ एक पूर्व परिचालन नेता को और अधिक मूल्यवान बना सकते हैं।
हवारा का प्रतीकात्मक प्रभाव नवम्बर 2015 में तब और बढ़ गया, जब सरबत खालसा के बैनर तले एक विवादित सभा ने उसे अकाल तख्त का जत्थेदार घोषित कर दिया। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एस.जी.पी.सी.) ने इस नियुक्ति को खारिज कर दिया। उसकी रिहाई स्वागत समारोहों, जुलूसों, भाषणों और नए सिरे से लामबंदी का अवसर बन सकती है। सुरक्षा प्रश्न केवल इस बात तक सीमित नहीं है कि क्या हवारा 10 दिनों की पैरोल के दौरान व्यक्तिगत रूप से कोई अपराध करेगा, इसमें यह भी शामिल है कि उसकी रिहाई किसको वैध बना सकती है, सक्रिय कर सकती है और प्रेरित कर सकती है।
सरकार का बदलता रुख : मार्च 2026 में, पंजाब के अधिकारियों ने कथित तौर पर फतेहगढ़ साहिब पुलिस और ब्यूरो ऑफ इन्वैस्टिगेशन की प्रतिकूल रिपोर्ट के बाद पैरोल के खिलाफ सिफारिश की थी। अगस्त तक सरकार ने अपना रुख बदल दिया था और सक्रिय रूप से 10 दिनों की पैरोल की सिफारिश कर रही थी। यह समय (पंजाब विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले) यह अपरिहार्य सवाल उठाता है कि क्या राजनीतिक विचारों ने पहले के सुरक्षा मूल्यांकन को पीछे छोड़ दिया है?
बुद्धिमत्तापूर्ण मार्ग : सरकार को हवारा और उसकी मां के बीच एक सम्मानजनक, निगरानीयुक्त मुलाकात की तत्काल व्यवस्था करनी चाहिए। दिल्ली पुलिस, पंजाब पुलिस, चंडीगढ़ पुलिस, इंटैलीजैंस ब्यूरो और संबंधित जेल अधिकारियों से अद्यतन लिखित मूल्यांकन प्राप्त होने तक सामान्य पैरोल पर विचार नहीं किया जाना चाहिए। उन मूल्यांकनों में विशेष रूप से सफल जेल ब्रेक और भागने की पिछली तैयारियों, भूमिगत अवधि के दौरान आचरण और संपर्क, समर्थकों का वर्तमान नैटवर्क, विदेशी संगठनात्मक संबंध, प्रस्तावित आगंतुक और संभावित सार्वजनिक सभाएं, राजनीतिक या धार्मिक लामबंदी का खतरा और इस जोखिम की जांच की जानी चाहिए कि रिहाई का इस्तेमाल भर्ती या प्रचार के लिए किया जाएगा।
यदि अस्थायी रिहाई को अंतत: मंजूरी दी जाती है, तो यह सख्त शर्तों के अधीन होनी चाहिए-एक एकल अधिसूचित निवास, निरंतर सुरक्षा, एक स्वीकृत आगंतुक सूची, कोई जुलूस नहीं, कोई सार्वजनिक भाषण नहीं, कोई राजनीतिक या धार्मिक बैठकें नहीं, और कोई अनधिकृत इलैक्ट्रॉनिक संचार नहीं। एक कैदी के परिवार के साथ मानवीय व्यवहार के लिए राज्य को 1995 के आत्मघाती विस्फोट, सौ फुट की सुरंग, या जेल से भागने के बाद हवारा द्वारा भूमिगत बिताए गए 18 महीनों को भूलने की जरूरत नहीं है।-के. भनोट



