संसद चलेगी या पटाक्षेप

संसद के मानसून सत्र के सिर्फ चार दिन शेष हैं। इनमें सोमवार भी शामिल है। हम यह संपादकीय संसद की कार्यवाही शुरू होने से पहले लिख रहे हैं, लिहाजा सोमवार को सदन में क्या हुआ, उसका विश्लेषण बाद में ही कर सकते हैं। सरकार ने एफसीआरए (विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम) संशोधन बिल पेश और पारित करना तय किया था, लेकिन विपक्ष का विरोध था। परिसीमन बिल इस सत्र में लटकता दिख रहा है। यदि परिसीमन बिल पारित नहीं होगा, तो महिला आरक्षण (नारी शक्ति वंदन कानून) 2034 के लोकसभा चुनाव से पहले लागू नहीं हो पाएगा। संशोधन बिल पारित कराने के लिए ही तृणमूल कांग्रेस के 20, शिवसेना (उद्धव) के 6 लोकसभा सांसद और ‘आप’ के 7 राज्यसभा सांसद तोड़े गए थे। एनसीपी (शरद) के 8 लोकसभा सांसदों पर भी सरकार की निगाहें हैं। इन सांसदों ने सोमवार, 10 अगस्त, को प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात की और स्वादिष्ट व्यंजन भी चखे। शिरोमणि अकाली दल (बादल) ने भी परिसीमन बिल को समर्थन का बयान दिया है, लिहाजा उसकी एकमात्र लोकसभा सांसद हरसिमरत कौर बादल के वोट का भी जुगाड़ हो गया है। द्रमुक के 22 सांसद भी सरकार के पाले में आ सकते हैं, फिलहाल कुछ शर्तों पर ‘सौदेबाजी’ जारी है। यदि इन सभी पालाबदलू सांसदों का भी समर्थन मिल जाता है, तो भी सरकार 360 के आंकड़े तक नहीं पहुंचती। लोकसभा में यह दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा है। सरकार और आंध्रप्रदेश की वाईएसआर कांग्रेस के दरमियान भी पालाबदल या घोषित समर्थन की बातचीत जारी है। यदि लोकसभा सीटों के नए परिसीमन के बाद ही महिला आरक्षण लागू करना था, तो 2023 में लगभग सर्वसम्मति से यह बिल पारित क्यों किया गया? कानून बनने के बावजूद करीब 3 साल तक उसकी सरकारी अधिसूचना जारी क्यों नहीं की गई? मौजूदा संदर्भ में अभी तो जनगणना जारी है, जो 2027 में संपन्न होगी। 2011 अथवा 1971 की जनगणना के आधार पर परिसीमन करना बेमानी है, क्योंकि जनसंख्या काफी बढ़ चुकी है और लोकसभा सीटें बेहद असंतुलित हैं। बहरहाल हमारा सवाल है कि शेष चार दिनों में भी संसद चलेगी या यूं ही उसका पटाक्षेप करना पड़ेगा।
अभी तक संसद की कार्यवाही विपक्ष के हंगामे और नारेबाजी की ‘बलि’ चढ़ती रही है। देश के करदाताओं के 100 करोड़ रुपए से अधिक पर पानी फिर चुका है, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह अपनी जिद पर अड़े हैं और कमोबेश कांग्रेस भी अड़ी है कि गृहमंत्री सदन में आएं और छात्रों, युवाओं पर बर्बर प्रहारों का जवाब दें। बीते 13-14 दिनों से प्रधानमंत्री और गृहमंत्री सदन में दिखाई नहीं दिए। यह दुर्लभ और अप्रत्याशित हकीकत है। वे संसद के प्रति जवाबदेह हैं। अच्छा होता कि गृहमंत्री कमोबेश लोकसभा में आते और विपक्ष के शोर-शराबे में ही ऐसा जवाब देते कि विपक्ष कांप उठता! वैसे हमने किसी भी गृहमंत्री के जवाब पर किसी भी विपक्ष को कांपते हुए, कभी भी, नहीं देखा। गृहमंत्री प्रधानमंत्री से प्रेरणा ले सकते थे, जिन्होंने राष्ट्रपति अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान उठाए गए तमाम सवालों के जवाब कांग्रेस सांसदों के हंगामे और नारेबाजी के बीच दिए थे। प्रधानमंत्री मोदी लगातार बोलते रहे। संसद के भीतर का वह भी दुर्लभ और असंसदीय अवसर था, क्योंकि व्यवस्था और परंपरा यह रही है कि जब प्रधानमंत्री एवं सदन के नेता बोलने के लिए खड़े होते हैं, तो हंगामा मौन हो जाता है। सभी सदन के नेता की बात सुनते हैं। यह संसदीय परंपरा भी ढह गई है। बहरहाल मानसून सत्र में एंटी पेपरलीक बिल का उदाहरण दिया जा सकता है, जिस पर दो दिनों में घंटों चर्चा हुई और बिल ध्वनि-मत से पारित किया गया। विपक्ष के एक भी सांसद ने शिक्षा-सुधार, परीक्षा-सुधार और समग्रत: शिक्षा-व्यवस्था पर कोई भी सुझाव नहीं दिया। बस, सत्ता-पक्ष को कोसते रहे और शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा मांगते रहे। शेष बिल ऐसे थे, जो कभी भी पारित किए जा सकते थे। वे भी सदन में ‘हां’ या ‘ना’ के शोर के साथ पारित किए गए। कोई बहस नहीं। यह कोई आश्चर्य नहीं है कि हमारी संसद की कार्यवाही बाधित रहती है, सिर्फ विधायी पेपर और रपटें सदन के पटल पर रखी जाती हैं और फिर कार्यवाही स्थगित करनी पड़ती है। यदि यही लोकतंत्र है, तो देश में इस पर बहस छिडऩी चाहिए।



