स्वतंत्रता की मशाल कविताओं और शायरी से प्रज्वलित हुई

स्वतंत्रता की मानवीय आकांक्षा ने दुनिया भर में अनेक आंदोलनों को जन्म दिया। भारत का स्वतंत्रता संग्राम भी साम्राज्यवादी औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध एक लंबे और असमान संघर्ष का परिणाम था। स्वतंत्रता का 80वां वर्ष हमारे लिए उन कवियों, लेखकों और रचनाकारों को श्रद्धापूर्वक याद करने का अवसर है, जिन्होंने एक पराधीन राष्ट्र की पीड़ा और उसकी स्वतंत्रता की आकांक्षा को ऐसे सशक्त प्रतिरोध गीतों में ढाला, जिन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव तक हिला दी। असंख्य सामाजिक विभाजनों से बंटे हुए समाज और अनेक रियासतों में विभाजित देश को स्वतंत्रता के लिए एकजुट करना आसान नहीं था। इसके लिए पराधीन जनता के आहत आत्मसम्मान को जगाना और उसे ऐसी भाषा में अभिव्यक्त करना आवश्यक था, जो लोगों की आत्मा को झकझोर दे और उनके हृदय में स्वतंत्रता की ज्योति प्रज्वलित कर दे।
स्वतंत्रता आंदोलन के कवियों और साहित्यकारों ने औपनिवेशिक शासन के अन्याय का अत्यंत प्रभावशाली चित्रण करके यह कार्य पूरा किया। इस कार्य में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित रबीन्द्रनाथ टैगोर, बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय, सरोजिनी नायडू, मोहम्मद इकबाल, फैज अहमद फैज, सरदार जाफरी, जोश मलीहाबादी, आगा शोरीश कश्मीरी, मजाज लखनवी, राम प्रसाद बिस्मिल, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, साहिर लुधियानवी, अमृता प्रीतम, कैफी आजमी, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, सुब्रमण्यम भारती, नानक सिंह और धनी राम चात्रिक जैसे अनेक महान रचनाकार शामिल थे। स्वतंत्रता आंदोलन की प्रेरणादायक शायरी ने केवल राजनीतिक आजादी की बात नहीं की, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय को भी उतना ही महत्व दिया। उसने हमें यह विश्वास दिलाया कि मनुष्य की स्वतंत्रता की इच्छा अंतत: हर अत्याचारी शक्ति पर विजय प्राप्त करती है। इस साहित्य की जड़ें हमारी उस सभ्यतागत चेतना में थीं, जिसने हर प्रकार की गुलामी और अन्याय को अस्वीकार किया।
श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के ‘जफरनामा’ में मुगल साम्राज्यवाद की तीखी आलोचना और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष का नैतिक संदेश आज भी हमारी राष्ट्रीय चेतना का स्थायी हिस्सा है। उनकी यह अमर पंक्तियां आज भी उतनी ही प्रेरक हैं-‘चुन कर अज हमह हीलते दर गुजश्त, हलाल अस्त बुर्दन बि-शमशीर दस्त।’ अर्थात, जब न्याय पाने के सभी उपाय समाप्त हो जाएं, तब तलवार उठाकर अन्यायका प्रतिरोध करना उचित है। स्वतंत्रता और न्याय की यही लौ पीढ़ी-दर-पीढ़ी जलती रही और आज के स्वतंत्रता प्रेमी साहित्य में भी उसकी स्पष्ट झलक दिखाई देती है। राम प्रसाद बिस्मिल की अमर पंक्तियां-‘सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है जोर कितना बाजु-ए-कातिल में है’ आज भी राष्ट्र के मन में प्रतिरोध और बलिदान के सर्वोच्च गीत के रूप में जीवित हैं। इसी प्रकार-‘मेरा रंग दे बसंती चोला… दम निकले इस देश की खातिर, बस इतना अरमान है, एक बार इस राह में मरना सौ जन्मों के समान है…’ यह गीत शहीद भगत सिंह के बलिदान से सदा के लिए जुड़ गया। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय का ‘वंदे मातरम्’ मातृभूमि के प्रति समर्पण का अनुपम काव्य है, जिसने स्वतंत्रता की अमर ज्योति को और प्रज्वलित किया। गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर की प्रसिद्ध कविता ‘चित्तो जेथा भयशून्यो’ ऐसे भारत की कल्पना करती है, जहां लोग निर्भय होकर, सिर ऊंचा उठाकर और आत्मसम्मान के साथ जीवन जी सकें।
रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की प्रसिद्ध पंक्तियां-‘समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध, जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध’ हमें यह याद दिलाती हैं कि अन्याय के प्रति मौन रहना भी अपराध है। अल्लामा इकबाल की पंक्तियां-‘उठो मेरी दुनिया के गरीबों को जगा दो… जिस खेत से दहकां को मयस्सर नहीं रोजी, उस खेत के हर खोशा-ए-गंदुम को जला दो’ अन्यायपूर्ण व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष का आह्वान करती हैं, जहां किसान और मजदूर भूखे रहने को मजबूर हों।
पंजाबी कवि और पत्रकार बांके दयाल की कविता ‘पगड़ी संभाल जट्टा’, जिसे उन्होंने अंग्रेजों के अन्यायपूर्ण कृषि कानूनों के विरोध में लिखा था, किसानों के आत्मसम्मान और अधिकारों का प्रतीक बन गई। इसी प्रकार सुब्रमण्यम भारती की ‘विदुथलाई’ ने एक स्वतंत्र और एकजुट भारत का स्वप्न प्रस्तुत करते हुए जन-जन में नई चेतना का संचार किया। जोश मलीहाबादी की प्रसिद्ध रचना ‘शिकस्त-ए-जिंदां का ख्वाब’ साम्राज्यवादी शासन द्वारा बनाई गई जेलों की दीवारों के ढहने और स्वतंत्रता के अवश्यंभावी आगमन का सशक्त प्रतीक बनकर उभरी।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी यह साहित्यिक परंपरा जारी रही। उदाहरण के लिए, साहिर लुधियानवी की कविताएं आज भी अपनी गहरी मानवीय संवेदना, अन्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था के प्रति उनकी पीड़ा और शोषितों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता के कारण पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोगों को प्रभावित करती रही हैं। उनकी अभिव्यक्ति की मार्मिकता इन पंक्तियों में स्पष्ट दिखाई देती है-
मजबूर हूं मैं, मजबूर हो तुम,
मजबूर ये दुनिया सारी है।
तन का दुख मन पर भारी है,
इस दौर में जीने की कीमत,
या दार-ओ-रसन या ख्वारी है।
औपनिवेशिक शासन और उसके अन्याय के विरुद्ध लिखी गई इन सशक्त कविताओं से यह संदेश मिलता है कि लोकतांत्रिक विरोध की शक्ति तब और प्रभावशाली बन जाती है, जब उसकी अभिव्यक्ति संयमित, गरिमापूर्ण और संस्कारित हो।-अश्वनी कुमार



