स्वास्थ्य

आपरेशन से ट्रांसफर आर्डर

सरकारी अस्पताल के आपरेशन थियेटर में बेहोश होना सबसे कठिन प्रक्रिया है, फिर भी वह पूरी व्यवस्था देखकर बेहोश हो चुका था। इससे पहले कि सर्जन आपरेशन शुरू करता, उसके ट्रांसफर आर्डर आ गए। गंतव्य मनपसंद था, इसलिए मरीज को छोड़ वह वहां पहुंच कर खुद को दर्ज करने की कार्रवाई में मशगूल हो गया। पहली बार सर्जरी विभाग का सहयोगी स्टाफ इस कोशिश में लग गया कि बिना आपरेशन मरीज होश में आ जाए। मरीज कहां मर्जी से बेहोश होते हैं, इसलिए होश में आना उससे भी कठिन हो रहा था। अब यह अस्पताल की साख का सवाल था, इसलिए नाक बचाने के लिए प्रार्थना तक हो रही थी। इधर अस्पताल के एसएमओ को दोहरी चिंता थी। वह पल में मरीज को होश में लाने की सोचते, तो दूसरे ही पल यह साबित भी कर रहे थे कि आपरेशन का आंकड़ा कहीं हाथ से फिसल न जाए। जाने वाला सर्जन जा चुका था, आने वाले का कोई पता नहीं था, बल्कि यह पता नहीं था कि अब सीनियर मेडिकल आफिसर भी रुक पाएगा या नहीं। सरकारी संस्थानों में कब कौन स्थायी हुआ, इसलिए ट्रांसफर के बावजूद रुके रहना या मनपसंद जगह पर चले जाना, एक आर्ट है। जो लोग ट्रांसफर के खेल में चल जाते, वही सफल कर्मचारी या अधिकारी माने जाते हैं। अस्पताल में जो भी व्यवस्था थी, ट्रांसफर के भय से आतंकित थी। ट्रांसफर न हो, इसलिए कुछ लोग काम कर रहे थे।

जो जानते थे कि ट्रांसफर उनकी मुट्ठी में बंद है, वे सर्जन की ट्रांसफर पर बहस कर रहे थे। किसी ने कहा, ‘मरीज को बेहोश करना काम आता, सर्जन आपरेशन के बाद चला जाता, तो कौनसा अपमान हो जाता।’ इस सबके बीच कई रिकार्ड बन रहे थे, ‘आपरेशन टेबल से सर्जन ट्रांसफर। बिना आपरेशन मरीज बेहोश क्यों। मरीज की बेहोशी।’ वैसे देश में सबसे बड़ा रिकार्ड होश में बनता ही कहां। बेहोशी में लोगों ने ऐसे प्रतिनिधि चुन लिए जो काबिलीयत से तो चपरासी नहीं बन सकते थे। जो शराबी बेहोश रहते हैं, उनका योगदान देखिए, सरकारों का खजाना पी-पी कर भरते रहते हैं। अब तो बेहोश रहने के कई योगदान हैं। बेहोशी में आदमी भक्त और राष्ट्रभक्त हो जाता है। बेहोशी के बिना कौन प्रेमी बन सका। अब तो अखबारें पढ़ कर लोग बेहोश होने लगे हैं। इम्तिहान में न सही, पेपर लीक से परेशान रहने लगे हैं। नीट परीक्षा ने कितने बच्चों को बेहोश किया, यह अनुमान लगाने की जरूरत भी अब देश महसूस नहीं करता। दरअसल अब पेपर लीक टेस्ट चल रहा है। हर साल राज्य तथा केंद्रीय सरकारें पेपर लीक करके यह पता लगा लेती हैं कि युवा कहीं छोटे से सवालों पर बेहोश तो नहीं हो जाएंगे। बहरहाल मरीज को होश नहीं आ रहा था, तो प्रशासन की मदद ली गई। पता चला था कि मरीज शिक्षा विभाग में कार्यरत था। थक-हार कर जानवरों के डाक्टर को बुलाया गया था। अनुभवी डंगर डाक्टर ने मरीज के आसपास आपरेशन थियेटर के कर्मचारी खड़े करके उन्हें सर्जन के ट्रांसफर आर्डर पढऩे को कहा। अंतर यह रखा कि आर्डर पर मरीज का नाम व पद लिख दिया था। फर्जी ट्रांसफर आर्डर सुनते ही बेहोश हुआ मरीज यानी शिक्षा विभाग में कार्यरत शिक्षक होश में आ गया, ‘ये मेरे आर्डर नहीं हो सकते, मैं तो मेडिकल लीव पर सिर्फ आपरेशन का नाटक कर रहा था।’ उस दिन पहली बार पता चला कि आपरेशन थियेटर भी रंगमंच हो सकता है।

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