‘कॉकरोच’ जीते, ‘प्रधान’ हारे

आंदोलनकारी ‘कॉकरोच’ जीत गए और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। ‘कॉकरोच’ अभी इसे टे्रलर मान रहे हैं और शेष फिल्म का इंतजार करने का दावा कर रहे हैं। अब यह आंदोलन राष्ट्रीय होगा, क्योंकि युवा जाग गए हैं। यह दावा ‘कॉकरोचों’ के प्रवक्ता सौरव दास का है, जो खुद एक युवा, स्वतंत्र पत्रकार हैं। इस आंदोलन के साथ यह धारणा भी खंडित हो गई कि मोदी सरकार में इस्तीफे नहीं हुआ करते। प्रधान भी पहले कैबिनेट मंत्री हैं, जिन्हें इस्तीफा देना पड़ा। यह दावा रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का था कि इस्तीफे नहीं हुआ करते। ताकतवर मोदी सरकार के 12-साला कालखंड की यह सबसे अहम राजनीतिक, नैतिक, मानसिक पराजय है। पराजय भी उस आंदोलन के संदर्भ में हुई है, जिसके आयोजक ‘कॉकरोचों’ का कोई आंदोलनकारी इतिहास नहीं है। कोई मजबूत राजनीतिक संगठन नहीं है। भाजपा-संघ की तुलना में ‘चींटी’ समान है। डिजिटल समर्थन से आंदोलन की जमीनी मशीनरी कैसे तैयार की, इसके मद्देनजर भी सरकार अंधेरे और मुगालते में रही, लेकिन वे उस युवा वर्ग के चेहरे बन गए, जो भाजपा और मोदी सरकार का कोर, जनाधारी वोट बैंक रहा है। 2024 के लोकसभा चुनाव में करीब 40 फीसदी युवाओं ने भाजपा को वोट दिए थे, जबकि कांग्रेस के पक्ष में यह समर्थन करीब 21 फीसदी रहा। देश में 15-29 साल के आयु-वर्ग की आबादी 56 करोड़ के करीब है। ऐसे वोट बैंक को नाराज करने का जोखिम बहुत बड़ा था। चूंकि युवाओं का आंदोलन, आक्रोश, गुस्सा देश के 15 से अधिक राज्यों तक फैल चुका था, सभी का नेतृत्व ‘कॉकरोच’ नहीं कर रहे थे, वामपंथी छात्र संगठन भी सडक़ों पर उतर आए थे, लेकिन एक साझा मकसद ने युवाओं को लामबंद किया, लिहाजा सरकार के शीर्ष स्तर पर यह सोच बनी कि आंदोलन को यथाशीघ्र शांत, समाप्त किया जाए। वांगचुक का अनशन खुलवाना पहला, महत्वपूर्ण प्रयास था, क्योंकि वह ‘नैतिक कमांडर’ बनकर उभरे थे। बीते शुक्रवार की रात को शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान को इस्तीफा देने को कहा गया। शनिवार सुबह 9 बजे के करीब प्रधान ने प्रधानमंत्री मोदी को इस्तीफा भेज दिया। पेपर लीक का संयोग धर्मेन्द्र प्रधान के साथ गहरे जुड़ा है। वह संघ परिवार के ‘प्रवेश, परीक्षा, परिणाम’ अभियान का हिस्सा रहे हैं। 1997 में उन्होंने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के बैनर तले पेपर लीक और शिक्षा-व्यवस्था को लेकर आंदोलन में भाग लिया था।
उन्हें भी पुलिसिया लाठियां खानी पड़ीं और फ्रेक्चर भी हुए, लेकिन ओडिशा में वह ‘युवाओं के नायक’ बनकर उभरे। अब पेपरलीक के बहाने पर ही उन्हें शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा। दरअसल पेपर लीक कोई नई समस्या नहीं है, बल्कि 19 राज्यों में फैले माफिया की निरंतर हरकतों का ही नतीजा है। मोदी सरकार के 12 साल में 116 पेपर लीक कराए गए हैं। इनसे करीब 7.5 करोड़ युवा अभ्यर्थी प्रभावित हुए। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी 152 पेपर लीक मान रहे हैं। एक स्वतंत्र पड़ताल का यह आंकड़ा भी सामने आया है कि 220 पेपर लीक कराए गए हैं, जिनसे करीब 10 करोड़ युवा और छात्र प्रभावित हुए। सबसे अधिक 11 मामले उप्र में, जबकि मध्यप्रदेश और राजस्थान में 9-9, महाराष्ट्र में 6 और गुजरात में 5 मामले दर्ज कराए गए हैं। सिर्फ नीट ही नहीं, संघ लोक सेवा आयोग, कर्मचारी चयन आयोग, सेना, ओएनजीसी, केंद्रीय विद्यालय संगठन और कृषि वैज्ञानिक भर्ती बोर्ड आदि के भी पेपर लीक हुए हैं, लिहाजा परीक्षाएं रद्द करनी पड़ीं। कांग्रेस नेतृत्व की यूपीए सरकार के दौरान भी पेपर लीक की कई घटनाएं हुईं। आज भी उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, तेलंगाना, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु आदि राज्यों में पेपर लीक की घटनाएं सामने आ रही हैं। न तो किसी ‘कॉकरोच’ ने उनके शिक्षा मंत्रियों के इस्तीफे मांगे और न ही नैतिक आधार पर ऐसे इस्तीफे दिए गए। बहरहाल अब मौजू सवाल यह है कि क्या संसद की कार्यवाही चलेगी? और पेपर लीक से जुड़ा नया विधेयक आसानी से पारित होगा? अग्नि-परीक्षा मोदी सरकार को भी बार-बार देनी पड़ेगी, क्योंकि युवा आंदोलन की बहती गंगा में सभी राजनीतिक दल अपने हाथ धोना चाहेंगे। प्रधानमंत्री मोदी को ‘समझौतापरस्त’ बनाने का रास्ता भी मिल गया है। बेशक प्रधानमंत्री पेपरलीक और शिक्षा-सुधारों को लेकर गंभीर हैं, लेकिन 2027 में कई अहम चुनाव भी हैं। देखते हैं, ऊंट किस करवट बैठता है?



