अंतरिक्ष में ‘विक्रम-1’

अंतरिक्ष में भारत के निजी क्षेत्र ने भी प्रवेश कर लिया है। ‘विक्रम-1’ और ‘मिशन आगमन’ ने सर्वप्रथम सफलता हासिल की है, जब एक निजी कंपनी के रॉकेट ने अंतरिक्ष तक सफल उड़ान भरी और पृथ्वी की निश्चित कक्षा में स्थापित किया। यह सफल प्रयोग और प्रक्षेपण ‘स्काईरूट एयरोस्पेस’ नामक निजी कंपनी ने किए हैं। यह पूर्णत: स्वदेशी तकनीक का रॉकेट था, जिसे पृथ्वी की कक्षा तक पहुंचा कर इस कंपनी के वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने इतिहास रचा है, अंतरिक्ष को एक बार फिर खंगाला है तथा अनुसंधान को वाकई एक नया आसमान दिया है। अभी तक अंतरिक्ष में प्रक्षेपण का काम ‘इसरो’ ही करता रहा था, जो एक सरकारी संस्थान है, लिहाजा उसे सरकार एक निश्चित बजट मुहैया कराती रही है। इसरो ने अंतरिक्ष में कई कीर्तिमान स्थापित किए हैं, लेकिन निजी क्षेत्र को अनुमति देना और फिर एक निजी कंपनी द्वारा रॉकेट भेजने के संकल्प को साकार करना वाकई अद्भुत, अप्रतिम, अनिर्वचनीय है। अंतरिक्ष कार्यक्रमों से जुड़े रहे विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरिक्ष में उपग्रह भेजने या अन्य लक्ष्य प्राप्त करने का बाजार 60,000 से 90,000 करोड़ रुपए का है। जाहिर है कि अवसरों के आसमान खुले हैं और इस क्षेत्र में भी रोजगार की संभावनाएं भरपूर हैं। ‘विक्रम-1’ की ऐतिहासिक सफलता तब हासिल की गई है, जब करीब 120 वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने इसरो से इस्तीफे दे दिए हैं अथवा वीआरएस ले लिया है। यह विदाई या अलगाव बेहद चिंताजनक माना गया, क्योंकि ये तकनीकी चेहरे भारत के ‘चद्रयान-4’ और ‘गगनयान’ जैसे विराट, दुस्साध्य अंतरिक्ष कार्यक्रमों से जुड़े थे। वे सभी कार्यक्रम अपने अंतिम और निर्णायक चरण में हैं। इस्तीफा देने वाले कई इसरो वैज्ञानिक और इंजीनियर अंतरिक्ष संबंधी स्टार्टअप्स से जुड़ गए। ‘विक्रम-1’ भेजने वाली ‘स्काईरूट एयरोस्पेस’ कंपनी की स्थापना भी 2018 में पवन कुमार चंदना और नागा भरत डाका ने की थी, जिन्होंने इसरो की नौकरी छोड़ी थी और यह स्टार्टअप शुरू किया था। इसरो से कुछ चेहरे विदाई लेते हैं, तो उसे ‘राष्ट्रीय क्षति’ नहीं मानना चाहिए।
वे किसी स्टार्टअप अथवा निजी कंपनी से जुडऩा चाहें, तो इसरो को उन्हें एक निश्चित अवधि तक अनुमति दे देनी चाहिए, ताकि वे अपनी पेशेवर क्षमताओं का विस्तार कर सकें और आर्थिक रूप से अधिक समृद्ध हो सकें। ‘विक्रम-1’ परोक्ष रूप से इसरो का ही सृजन है, लिहाजा निजी क्षेत्र को भी ‘राष्ट्रीय विस्तार’ मानना चाहिए, क्योंकि अंतरिक्ष में, अंतत:, भारतीय ‘तिरंगा’ ही जाता है। यह डा. विक्रम साराभाई की ही विरासत है, जिन्होंने इसरो की स्थापना की और अंतरिक्ष कार्यक्रम को शुरू किया। बहरहाल अब तो प्रधानमंत्री मोदी का ‘वंदे मातरम्’ लिखा कार्ड भी अंतरिक्ष तक पहुंच गया है। हमारा सभी का अंतिम लक्ष्य ‘भारत’ ही है। निजी क्षेत्र की यह अंतरिक्ष-सफलता अमरीका और चीन के बाद भारत ने ही हासिल की है। कितना गर्व और गौरव महसूस होना चाहिए? प्रधानमंत्री मोदी ने ऑडियो संदेश के जरिए ‘मिशन आगमन’ की टीम को बधाई दी है, राष्ट्र-निर्माण और आत्मनिर्भरता में उनकी भूमिका को सराहा है और प्रधानमंत्री आवास पर मुलाकात का न्यौता दिया है। यह बेहद महत्वपूर्ण शुरुआत है। भारत में भी अंतरिक्ष से जुड़ा एक बाजार खुलेगा और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हम अपनी सेवाएं दे सकेंगे। इस मिशन के तहत अंतरिक्ष में कुछ पेलोड भेजे गए हैं। मसलन-इन ऑर्बिट रोबोटिक आर्म, भविष्य के मिशनों के लिए उपग्रह प्रणालियों का टेस्ट करेगा क्यूबसैट, नई अंतरिक्ष तकनीकों के सत्यापन के लिए टेस्ट सैटेलाइट, पिन पुलर एवं रिलीज नट सैटेलाइट छोडऩे के मैकेनिज्म के प्रभाव जांचेगा और 32 हीरों से बना कमल। भारत के दो अंतरिक्ष यात्री अंतरिक्ष में कुछ दिन बिता कर अध्ययन कर चुके हैं। शुभांशु शुक्ला पहले भारतीय रहे, जो करीब 18 दिन तक अंतरिक्ष स्टेशन के भीतर रहे और ‘तिरंगा’ लहराते रहे। उन्होंने कई महत्वपूर्ण और जीवनोपयोगी प्रयोग भी किए हैं। उनके परिणाम सामने आएंगे, तो दुनिया चौंक सकती है। संभवत: वह ‘गगनयान’ में भी अपना योगदान देंगे। एक साथ
100 से अधिक उपग्रह अंतरिक्ष में प्रक्षेपित करने का कीर्तिमान भी भारत के नाम है। उम्मीद है कि एक दिन भारत ‘अंतरिक्ष महाशक्ति’ भी बन सकता है। इस तरह की गतिविधियों के लिए सरकार को बजट की व्यवस्था अनिवार्य रूप से करनी चाहिए। बजट को बढ़ाने पर सरकार को विचार करना चाहिए।



